रात का पहरेदार ओजस: चुपचाप गाँव की रक्षा करने वाले उल्लू की कहानी

रात का पहरेदार ओजस: चुपचाप गाँव की रक्षा करने वाले उल्लू की कहानी

'चंदनपुर' नाम का एक छोटा और सुंदर गाँव था, जो घने जंगल के किनारे बसा था। गाँव के लोग बहुत मेहनती थे। वे दिन भर खेतों में काम करते और शाम होते ही थककर गहरी नींद में सो जाते। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं होती थी कि रात में उनकी फसलों या जानवरों की रखवाली कौन करेगा। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनके पास एक अनोखा और गुप्त पहरेदार था, जो तब जागता था जब बाकी दुनिया सो जाती थी।

कहानी

गाँव के बीचों-बीच एक बहुत पुराना और विशाल बरगद का पेड़ था। उसी पेड़ के एक अँधेरे कोटर (खोल) में 'ओजस' नाम का एक बड़ा, भूरा उल्लू रहता था। ओजस देखने में बहुत गंभीर लगता था। उसकी बड़ी-बड़ी गोल पीली आँखें थीं, जो अंधेरे में टॉर्च की तरह चमकती थीं।

दिन के समय, जब बच्चे पेड़ के नीचे खेलते और औरतें बातें करतीं, ओजस अपनी कोटर में छिपकर आराम से सोता रहता। लोग उसे 'दिन का आलसी' कहते थे। लेकिन वे नहीं जानते थे कि असली काम तो रात में शुरू होता है।

जैसे ही सूरज ढलता और गाँव में अंधेरा छा जाता, ओजस की नींद खुल जाती। वह अपनी गर्दन को लगभग पूरा घुमाकर चारों तरफ देखता, अपने मखमली पंखों को फैलाता और बिना कोई आवाज़ किए पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर जाकर बैठ जाता। वहाँ से उसे पूरा गाँव साफ़ दिखाई देता था। उसकी तेज़ नज़रें अंधेरे के पार भी देख सकती थीं।

एक बार सर्दियों की रात थी। चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ था और घना अंधेरा था। जंगल की तरफ से 'चतुरो' नाम की एक बेहद चालाक और लालची लोमड़ी गाँव की तरफ बढ़ रही थी। चतुरो की नज़र गाँव के सरपंच के घर के पीछे बने अनाज के गोदाम और मुर्गियों के दड़बे पर थी।

पूरा गाँव सन्नाटे में डूबा था। कुत्ते भी ठंड के मारे अपने घरों में दुबके हुए थे।

चतुरो दबे पाँव बाड़ के नीचे से रेंगकर गाँव में घुस आई। उसे लगा कि आज की दावत तो पक्की है।

लेकिन बरगद की ऊँची डाल पर बैठा ओजस सब देख रहा था। उसकी तेज़ नज़रों ने झाड़ियों में हिलती हुई उस लाल पूँछ को पहचान लिया। ओजस समझ गया कि गाँव खतरे में है।

उल्लुओं की एक खासियत होती है कि जब वे उड़ते हैं, तो उनके पंखों से बिल्कुल भी आवाज़ नहीं होती। ओजस ने एक 'साइलेंट फ्लाइट' (खामोश उड़ान) भरी। वह हवा में तैरता हुआ सीधा उस जगह पहुँचा जहाँ चतुरो लोमड़ी गोदाम का दरवाज़ा खोलने की कोशिश कर रही थी।

चतुरो अपने काम में मग्न थी कि तभी अचानक उसे अपने सिर के ठीक ऊपर दो अंगारे जैसी चमकती हुई पीली आँखें दिखाई दीं। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, ओजस ने अपनी सबसे डरावनी और भारी आवाज़ निकाली।

'हू-हू-हू! घू-घू-घू!'

अंधेरे और सन्नाटे में ओजस की वह भयानक गूंजती हुई आवाज़ सुनकर चतुरो लोमड़ी की जान ही निकल गई। उसने सोचा कि यह ज़रूर कोई जंगल का भूत है जो रात में शिकार पर निकला है।

चतुरो इतना डर गई कि वह उल्टे पैर भागी। वह इतनी तेज़ दौड़ी कि रास्ते में रखे मटकों से टकरा गई। 'धड़ाम!'

बर्तनों के गिरने की और ओजस की 'हू-हू' की आवाज़ सुनकर गाँव के कुत्ते जाग गए और भौंकने लगे। सरपंच जी और बाकी गाँव वाले लाठियां लेकर बाहर आ गए।

उन्होंने देखा कि अनाज का गोदाम सुरक्षित है, लेकिन वहाँ लोमड़ी के पंजों के निशान थे। तभी किसी की नज़र ऊपर बरगद के पेड़ पर गई। ओजस वहाँ शान से बैठा था और उसकी आँखें चमक रही थीं।

सरपंच जी ने हाथ जोड़कर कहा, 'हम जिसे दिन का आलसी समझते थे, वही हमारा असली रक्षक है। यह रात का पहरेदार है।'

उस रात के बाद से गाँव वालों ने ओजस का मज़ाक उड़ाना बंद कर दिया। वे समझ गए कि जब वे सोते हैं, तो ओजस की पीली आँखें उनके गाँव की सुरक्षा के लिए हमेशा जागती रहती हैं।

सीख 

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'हर किसी की अपनी अहमियत होती है। जो लोग शांत रहते हैं या दूसरों से अलग दिखते हैं, ज़रूरी नहीं कि वे किसी काम के न हों। कुछ लोग ओजस की तरह होते हैं, जो बिना शोर मचाए, चुपचाप अपना कर्तव्य निभाते हैं और दूसरों की भलाई करते हैं।'

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