Reserve Bank of India (RBI) ने 24 जून को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के लिए नया नियामकीय ढांचा जारी किया है, जिसके बाद एक बार फिर टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी Tata Sons चर्चा में आ गई है।
बिजनेस न्यूज़: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के लिए नया नियामकीय ढांचा जारी किया है, जिसका उद्देश्य वित्तीय प्रणाली को अधिक पारदर्शी और स्थिर बनाना है। इस नए नियम के तहत अब 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक संपत्ति (Assets) वाली NBFCs को स्वतः “अपर-लेयर NBFC” के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।
इस बदलाव के बाद एक बार फिर देश की सबसे बड़ी होल्डिंग कंपनियों में से एक Tata Sons को लेकर बाजार में चर्चा तेज हो गई है कि क्या अब कंपनी की स्टॉक मार्केट में लिस्टिंग की दिशा में कोई नया दबाव बनेगा।
RBI के नए नियम क्या कहते हैं?
आरबीआई द्वारा 24 जून को जारी संशोधित ढांचे के अनुसार, 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक एसेट वाली NBFCs को सीधे अपर-लेयर में रखा जाएगा। यह वर्गीकरण अब नवीनतम ऑडिटेड बैलेंस शीट के आधार पर होगा। एसेट सीमा की समीक्षा हर तीन साल में की जाएगी (पहले प्रस्तावित अवधि 5 वर्ष थी) पहले आरबीआई एक स्कोरिंग सिस्टम के आधार पर NBFCs की श्रेणी तय करता था, जिसमें कंपनी का आकार, वित्तीय नेटवर्क और कारोबार की जटिलता जैसे कई मानक शामिल होते थे। अब इस प्रक्रिया को सरल बनाते हुए “एसेट साइज” को मुख्य आधार बनाया गया है।
टाटा संस पर फिर क्यों बढ़ी चर्चा?
Tata Sons एक कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में RBI के साथ पंजीकृत है। कंपनी की परिसंपत्तियां पहले से ही 1 लाख करोड़ रुपये की सीमा से काफी अधिक हैं। इस कारण नए नियमों के बाद यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या टाटा संस को अब सूचीबद्ध (Listed) होना अनिवार्य हो सकता है। गौरतलब है कि वर्ष 2022 में RBI ने टाटा संस को अपर-लेयर NBFC के रूप में वर्गीकृत किया था। उस समय यह संकेत दिया गया था कि निर्धारित समयसीमा के भीतर कंपनी को लिस्टिंग से जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ सकता है।
लिस्टिंग को लेकर क्या है स्थिति?

सूत्रों और नियामकीय जानकारी के अनुसार, अभी तक लिस्टिंग को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। स्थिति कई कारकों पर निर्भर करेगी, जिनमें शामिल हैं:
- टाटा संस का CIC लाइसेंस से जुड़ा आवेदन
- RBI के साथ जारी नियामकीय चर्चा
- कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के नियमों में संभावित छूट या बदलाव
- समूह की संरचना और वित्तीय पुनर्गठन रणनीति
टाटा संस ने पहले अपने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) ढांचे में बदलाव या लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया पर विचार किया था, जिससे लिस्टिंग की अनिवार्यता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
NBFC सेक्टर के लिए बड़ा बदलाव
आरबीआई का यह कदम केवल बड़े कॉरपोरेट समूहों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे NBFC सेक्टर को प्रभावित करेगा। नए ढांचे का उद्देश्य जोखिम-आधारित निगरानी को मजबूत करना और वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखना है। विशेषज्ञों का मानना है कि एसेट-आधारित वर्गीकरण से नियामकीय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी और बड़े NBFCs पर निगरानी और मजबूत हो सकेगी।
नए फ्रेमवर्क के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनियों (IFCs) को भी कुछ राहत दी गई है। बड़े एक्सपोजर की सीमा 35% से बढ़ाकर 45% कर दी गई है. इससे कंपनियों को बड़े प्रोजेक्ट्स में अधिक निवेश की अनुमति मिलेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग क्षमता में वृद्धि होने की संभावना है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को गति देने में मदद कर सकता है, खासकर उन परियोजनाओं में जिनमें भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।











