सबरीमाला केस: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने कहा- 'अदालतों के लिए सामाजिक या धार्मिक सुधार लाना कठिन'

सबरीमाला मामले में Supreme Court of India की 9 जजों की बेंच ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालतों के लिए सामाजिक या धार्मिक सुधार लाना आसान नहीं होता।

भारत के संवैधानिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण मामले में, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने Sabarimala Temple Entry Case की सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी की है। 

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की 9 जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका के लिए सामाजिक सुधार लाना अपेक्षाकृत कठिन कार्य है और इस दिशा में सरकारें अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, क्योंकि वे जनता की वास्तविक मांगों के अनुसार कानून बनाने में सक्षम होती हैं।

इस टिप्पणी के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने पीठ के समक्ष दलील दी कि किसी भक्त की व्यक्तिगत आस्था और विश्वास को केवल तर्क के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भी सामाजिक सुधार के नाम पर किसी संप्रदाय या समुदाय के धार्मिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकती।

संविधान पीठ की सुनवाई में क्या हुआ?

इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की पीठ कर रही है, जिसमें जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, एम. एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ए. जी. मसीह, पी. बी. वराले, आर. महादेवन और जे. बागची शामिल हैं। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने दलील दी कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक विश्वास को केवल कानूनी दृष्टि से सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता को व्यापक संरक्षण देता है।

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सामाजिक और धार्मिक सुधार अक्सर जनता की भावना और सामाजिक मांगों से उत्पन्न होते हैं, जिनके आधार पर सरकारें कानून बनाती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की भूमिका सीमित होती है और वह सामाजिक सुधारक की भूमिका नहीं निभा सकती। कोर्ट ने कहा, सामाजिक और धार्मिक सुधारों के मामलों में अदालतों के लिए हस्तक्षेप करना अत्यंत जटिल होता है, क्योंकि यह सीधे आस्था और विश्वास से जुड़ा विषय है।

धार्मिक स्वतंत्रता पर गहरी चर्चा

इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर भी विस्तार से चर्चा हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25 केवल धार्मिक स्वतंत्रता नहीं देता, बल्कि इसमें आस्था, पूजा, परंपरा और व्यक्तिगत अंतरात्मा का अधिकार भी शामिल है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की सीमित शक्ति दी गई है और इसे व्यापक हस्तक्षेप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि क्या अदालतें किसी धार्मिक परंपरा या प्रथा के विवाद को तय करने के लिए उपयुक्त मंच हैं। उन्होंने पूछा कि किसी संवैधानिक अदालत के लिए यह तय करना किस आधार पर संभव है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा अधिक उचित या स्वीकार्य है।इसी तरह, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश ने कहा कि संविधान केवल सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करने की अनुमति देता है, और अन्य आधारों पर हस्तक्षेप करना संवैधानिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर बहस

वरिष्ठ अधिवक्ता सी. ए. सुंदरम ने अदालत में कहा कि भक्तों की धार्मिक आस्था और परंपराएं उनके लिए वास्तविक और गहरी मान्यताएं हैं, जिन्हें केवल कानूनी दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। उन्होंने Sabarimala Verdict 2018 की आलोचना करते हुए कहा कि समानता के सिद्धांत को धार्मिक परंपराओं पर लागू करना हमेशा उचित नहीं हो सकता, विशेषकर जब वे आस्था से गहराई से जुड़ी हों।

वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने भी कहा कि अदालतों को धार्मिक मामलों में सीमित हस्तक्षेप का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। बहस का केंद्र संविधान का अनुच्छेद 25 रहा, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह मामला इस बात पर केंद्रित है कि राज्य और न्यायपालिका धार्मिक प्रथाओं में कितनी और किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकते हैं।

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