SEBI का बड़ा प्रस्ताव: मार्केट इंटरमीडिएटरीज के लिए नियमों में बदलाव

SEBI ने मार्केट इंटरमीडिएटरीज के ‘फिट एंड प्रॉपर पर्सन’ फ्रेमवर्क में संशोधन का प्रस्ताव रखा। निवेशकों और उद्योग के लिए पारदर्शिता व नियम स्पष्ट होंगे।

SEBI ने मार्केट इंटरमीडिएटरीज के नियमों में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव रखा। इसमें अयोग्यता, सुनवाई के अधिकार और नोटिस अवधि में संशोधन शामिल हैं। इससे निवेशकों के लिए पारदर्शिता बढ़ेगी और नियामक प्रक्रिया सरल होगी।

SEBI Rule: भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने बुधवार को मार्केट इंटरमीडिएटरीज के लिए लागू ‘फिट एंड प्रॉपर पर्सन’ फ्रेमवर्क में व्यापक बदलावों का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य रेगुलेटरी प्रोसेस में अधिक स्पष्टता, पारदर्शिता और निष्पक्षता लाना है। यह कदम शेयर ब्रोकर, म्युचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर्स और निवेश सलाहकार जैसी संस्थाओं के लिए नियमों को और मजबूत बनाने की दिशा में है।

मार्केट इंटरमीडिएटरीज के लिए यह फ्रेमवर्क SEBI के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसके तहत मध्यस्थों, उनके प्रमुख प्रबंधन कार्मिकों (KMP) और नियंत्रण रखने वाले व्यक्तियों की पात्रता और उपयुक्तता का आकलन किया जाता है। नियमों में संशोधन से न केवल प्रोसेस को आसान बनाया जाएगा, बल्कि अयोग्यता और अनुपालन मामलों में निवेशकों और उद्योग के लिए भी स्पष्ट दिशा निर्देश मिलेंगे।

SEBI ने नियमों में किए बदलाव का प्रस्ताव

SEBI ने अपने कंसल्टेशन पेपर में मार्केट इंटरमीडिएटरीज रेगुलेशन्स, 2008 की अनुसूची-2 में संशोधन सुझाए हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य केवल नियमों का पालन सुनिश्चित करना ही नहीं बल्कि मध्यस्थों की जिम्मेदारियों और उनके कार्यों में पारदर्शिता बढ़ाना भी है।

संशोधन में विशेष रूप से सुनवाई के अधिकार को नियमों में स्पष्ट रूप से शामिल करने, अयोग्यता के मामलों के दायरे को परिभाषित करने और आवेदकों के लिए नियामकीय अनिश्चितता को कम करने पर जोर दिया गया है। SEBI का मानना है कि इससे मध्यस्थों के लिए नियमों की व्याख्या में भ्रम नहीं रहेगा और नियामक निर्णयों में अधिक भरोसा पैदा होगा।

अयोग्यता का आकलन

प्रस्तावित बदलावों में सेबी ने परिसमापन कार्यवाही शुरू होने मात्र को अयोग्यता मानने का प्रावधान हटाने का सुझाव दिया है। इसके बजाय केवल अंतिम परिसमापन आदेश को ही 'उपयुक्त और सक्षम व्यक्ति' के आकलन के लिए मान्य माना जाएगा।

इसके साथ ही नियमों में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को अयोग्य ठहराने से पहले उचित सुनवाई का अवसर प्रदान करना अनिवार्य होगा। इससे किसी भी तरह की प्रक्रियात्मक अस्पष्टता समाप्त होगी और सभी पक्षों के लिए नियमों की स्पष्टता सुनिश्चित होगी।

एक नया प्रावधान भी प्रस्तावित किया गया है जिसमें कहा गया है कि किसी भी अयोग्यता से जुड़ी घटना की जानकारी सात दिन के भीतर SEBI को देना अनिवार्य होगा। इससे नियामक को समय पर सूचना मिल सकेगी और नियामक निर्णय तेजी से लिए जा सकेंगे।

कारण बताओ नोटिस की अवधि घटाने का प्रस्ताव

SEBI ने कंसल्टेशन पेपर में 'कारण बताओ नोटिस' की अवधि घटाने का भी प्रस्ताव रखा है। वर्तमान में किसी नोटिस के बाद आवेदन पर विचार करने की अवधि एक साल रखी गई है। SEBI ने इसे घटाकर छह महीने करने का सुझाव दिया है।

इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि नोटिस जारी होने के बाद लंबी प्रतीक्षा अवधि से आवेदन प्रक्रिया धीमी हो जाती है और नियामक निर्णय में देरी होती है। प्रस्तावित बदलाव से यह प्रोसेस तेज होगी और मध्यस्थों को समय पर प्रतिक्रिया मिल सकेगी।

ग्रुप कंपनियों और सहयोगी इकाइयों के लिए स्पष्टता

सेबी ने अपने प्रस्ताव में ग्रुप संस्थाओं और सहयोगी इकाइयों से जुड़े प्रावधानों में भी सुधार का सुझाव दिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी कंपनी के प्रमुख प्रबंधन या सहयोगी इकाई के अयोग्य होने पर मध्यस्थ की पात्रता पर स्पष्ट प्रभाव पड़े और नियामकीय प्रक्रिया में कोई अस्पष्टता न रहे।

सार्वजनिक टिप्पणी आमंत्रित

SEBI ने इस कंसल्टेशन पेपर पर 25 फरवरी तक सार्वजनिक रूप से टिप्पणियां आमंत्रित की हैं। उद्योग और निवेशक इस पर अपनी राय दे सकते हैं। इससे न केवल नियमों में सुधार होगा, बल्कि नियामक प्रक्रिया में निवेशकों की भागीदारी भी सुनिश्चित होगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि SEBI के इस कदम से मार्केट इंटरमीडिएटरीज के लिए नियम अधिक स्पष्ट और पारदर्शी होंगे। यह प्रस्ताव निवेशकों के भरोसे को बढ़ाएगा और वित्तीय बाजारों में विश्वास कायम करेगा।

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