वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में आयोजित संस्कृति संसद 2026 में संतों और धर्माचार्यों ने सनातन धर्म, मंदिरों की व्यवस्था और भारतीय संस्कृति के संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार रखे। इसी दौरान शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने राम मंदिर के कोष का इस्तेमाल गुरुकुल और संस्कारशालाएं बनाने में करने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि मंदिरों में आने वाले धन का उपयोग धार्मिक शिक्षा, संस्कारों के प्रसार और नई पीढ़ी को भारतीय परंपराओं से जोड़ने के लिए किया जाना चाहिए। उनके अनुसार मंदिर केवल पूजा-पाठ और दर्शन का केंद्र नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें समाज में शिक्षा और संस्कारों के प्रसार का माध्यम भी बनना चाहिए।
नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि देश में गुरुकुल व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है। प्राचीन समय में गुरुकुलों के माध्यम से बच्चों को शिक्षा के साथ जीवन के नैतिक मूल्य, अनुशासन और धर्म-संस्कृति की जानकारी दी जाती थी। उनका मानना है कि वर्तमान समय में भी ऐसी शिक्षण संस्थाओं की आवश्यकता है, जहां नई पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कारों से परिचित कराया जा सके। उन्होंने राम मंदिर के कोष से गुरुकुल और संस्कारशालाएं स्थापित करने का सुझाव देते हुए कहा कि इससे धर्म और संस्कृति के संरक्षण को मजबूती मिल सकती है।
उन्होंने मंदिरों के सरकारी नियंत्रण का मुद्दा भी उठाया। नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि धर्म की रक्षा और धार्मिक परंपराओं के स्वतंत्र संचालन के लिए मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक मंदिरों का संचालन धार्मिक संस्थाओं और समाज की भागीदारी से होना चाहिए, ताकि धार्मिक गतिविधियों और परंपराओं से जुड़े फैसले संबंधित धार्मिक व्यवस्थाओं के अनुसार लिए जा सकें। उन्होंने इस विषय को सनातन धर्म की व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा।
संस्कृति संसद में मंदिरों की संपत्ति, दान और प्रबंधन व्यवस्था पर चर्चा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि देश के अलग-अलग राज्यों में बड़े मंदिरों का संचालन अलग-अलग व्यवस्थाओं के तहत होता है। कई मंदिर सरकारी विभागों या सरकार की ओर से गठित बोर्डों की निगरानी में हैं, जबकि अनेक धार्मिक स्थल ट्रस्ट, मठ या स्थानीय परंपरागत व्यवस्थाओं के माध्यम से संचालित होते हैं। संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता के साथ धार्मिक गतिविधियों से जुड़ी आर्थिक और प्रशासनिक गतिविधियों के नियमन का भी प्रावधान करता है। ऐसे में मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग लंबे समय से धार्मिक संगठनों और संतों के बीच चर्चा का विषय रही है।
वाराणसी में तीन से पांच नवंबर तक आयोजित संस्कृति संसद 2026 का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और नई पीढ़ी के बीच संवाद को बढ़ावा देना है। आयोजन में देशभर से संतों, विद्वानों, युवाओं और विभिन्न धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की जानकारी दी गई है। कार्यक्रम में जेन जी के साथ संवाद और धर्म-संस्कृति से जुड़े समकालीन सवालों पर चर्चा भी रखी गई है।
नरेंद्रानंद सरस्वती के बयान के बाद राम मंदिर के कोष के उपयोग और देशभर के मंदिरों की प्रबंधन व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज होने की संभावना है। हालांकि राम मंदिर के कोष से गुरुकुल और संस्कारशालाएं बनाने का उनका सुझाव एक मांग और विचार के रूप में सामने आया है। इस संबंध में राम मंदिर ट्रस्ट की ओर से कोई निर्णय या आधिकारिक घोषणा सामने आने की पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है









