कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम के सभी छह छंद गाने को अनिवार्य बनाने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि लंबा संस्करण हर कार्यक्रम में गाना व्यावहारिक नहीं है और इस मुद्दे का समाधान आपसी सहमति से निकाला जाना चाहिए।
तिरवंतपुरम: कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को अनिवार्य रूप से गाने या बजाने के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह व्यवस्था आम लोगों के लिए बोझिल साबित हो सकती है। उनके बयान के बाद राष्ट्रगीत की परंपरा, उसके स्वरूप और सरकारी आयोजनों में उसके उपयोग को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
केरल की राजधानी Thiruvananthapuram में मीडिया से बातचीत के दौरान थरूर ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ भारत का राष्ट्रगीत है और इसका सम्मान सभी नागरिक करते हैं, लेकिन प्रत्येक कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर इसके पूरे संस्करण का गायन व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है।
क्या कहा शशि थरूर ने?
थरूर ने कहा कि अधिकांश भारतीयों को ‘वंदे मातरम’ के पहले एक या दो छंद याद हैं, जिन्हें लंबे समय से सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाया जाता रहा है। उनके अनुसार, पारंपरिक व्यवस्था यह रही है कि किसी कार्यक्रम की शुरुआत में राष्ट्रगीत गाया जाता है और अंत में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया जाता है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी कार्यक्रम की शुरुआत और समापन दोनों समय ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह छंद बजाए जाएं, तो लोगों को बार-बार लंबे समय तक खड़े रहना पड़ सकता है, जो कई परिस्थितियों में असुविधाजनक हो सकता है।
थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उनका सवाल इसके अनिवार्य और विस्तारित उपयोग को लेकर है। उनका मानना है कि इस विषय पर व्यापक सहमति और संवाद के आधार पर समाधान निकाला जाना चाहिए।
दिल्ली के कार्यक्रम का दिया उदाहरण
कांग्रेस सांसद ने इसी वर्ष फरवरी में New Delhi में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कार्यक्रम की शुरुआत और समापन दोनों अवसरों पर ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण बजाया गया था।
उनके अनुसार, राष्ट्रगीत का विस्तृत संस्करण अपेक्षाकृत लंबा है और उसे दो बार सुनने या उसके दौरान खड़े रहने से कुछ लोगों को असुविधा हो सकती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है ताकि सम्मान और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाया जा सके।
नए दिशानिर्देशों से बढ़ी चर्चा
हाल के दिनों में केंद्र सरकार द्वारा ‘वंदे मातरम’ के उपयोग को लेकर जारी दिशानिर्देशों के बाद यह मुद्दा चर्चा में आया है। नए नियमों के तहत कई सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के सभी छह छंदों के गायन या वादन की बात कही गई है।
इन दिशानिर्देशों के अनुसार राष्ट्रगीत का पूर्ण संस्करण लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का है। इससे पहले अधिकांश सार्वजनिक आयोजनों में केवल पहले दो छंद ही गाए या बजाए जाते थे, जो अपेक्षाकृत छोटे हैं और व्यापक रूप से प्रचलित भी रहे हैं।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को अधिक व्यापक रूप से सामने लाना है। हालांकि आलोचकों का मानना है कि किसी भी सांस्कृतिक प्रतीक के उपयोग में व्यावहारिक पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
केरल में अलग-अलग राय
इस मुद्दे पर Kerala में भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। राज्य सरकार का कहना है कि राष्ट्रगीत का पूरा संस्करण गाना या बजाना वैकल्पिक माना जा सकता है, जबकि कुछ संवैधानिक पदाधिकारियों और सांस्कृतिक संगठनों का मत है कि राष्ट्रगीत का संपूर्ण स्वरूप अधिक सम्मानजनक ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक गीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सार्वजनिक जीवन में उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए।
‘वंदे मातरम’ का ऐतिहासिक महत्व
‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक रहा है। इसे प्रसिद्ध साहित्यकार Bankim Chandra Chattopadhyay ने वर्ष 1875 में रचा था।
बाद में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास Anandamath में प्रकाशित हुआ और धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया। ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के दौरान ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता सेनानियों का प्रेरणास्रोत और आंदोलन का प्रमुख नारा बना।
वर्ष 1896 में Rabindranath Tagore ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार सार्वजनिक मंच से इसे प्रस्तुत किया था। इसके बाद यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में आ गया।
राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान में अंतर
भारत में ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। दोनों का सांस्कृतिक और संवैधानिक महत्व अलग-अलग है।
राष्ट्रगान आधिकारिक राष्ट्रीय समारोहों का अभिन्न हिस्सा है और उसके लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल निर्धारित हैं। वहीं राष्ट्रगीत का प्रयोग परंपरागत रूप से विभिन्न सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सार्वजनिक आयोजनों में किया जाता रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों प्रतीक भारतीय इतिहास, स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
थरूर के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों ने उनके विचारों को व्यावहारिक और संतुलित बताया है, जबकि अन्य का मानना है कि राष्ट्रगीत के पूर्ण संस्करण के गायन से उसकी गरिमा और ऐतिहासिक महत्व को और अधिक सम्मान मिलता है।
सोशल मीडिया पर भी इस विषय को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। कई लोग राष्ट्रगीत के सांस्कृतिक महत्व पर जोर दे रहे हैं, जबकि कुछ उपयोगकर्ताओं ने सार्वजनिक कार्यक्रमों की अवधि और स्वरूप को ध्यान में रखने की बात कही है।
आगे क्या?
फिलहाल ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण संस्करण को लेकर कोई अंतिम राष्ट्रीय सहमति नहीं बनी है। हालांकि शशि थरूर का मानना है कि इस विषय पर टकराव के बजाय संवाद और सहमति का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान और सार्वजनिक कार्यक्रमों की व्यावहारिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे उपयुक्त समाधान हो सकता है। आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के स्तर पर इस विषय पर और स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने आ सकते हैं।











