भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) में फैसले लेने की प्रक्रिया तीन सदस्यीय पैनल के जरिए होती है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी शामिल हैं। ये तीनों अधिकारी आयोग के महत्वपूर्ण चुनावी फैसलों में भूमिका निभाते हैं।
SIR Controversy: भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर चल रही बहस के बीच निर्वाचन आयोग ने अपने स्तर पर सफाई दी है। आयोग के अनुसार, SIR समेत उसके सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सहमति से लिए गए हैं। आयोग ने उन रिपोर्टों से असहमति जताई है, जिनमें शीर्ष चुनाव अधिकारियों के बीच गंभीर आंतरिक मतभेद होने का दावा किया गया था।
वर्तमान में भारतीय निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी शामिल हैं। आयोग की आधिकारिक जानकारी में भी इन तीनों अधिकारियों को मौजूदा चुनाव आयुक्तों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
SIR को लेकर कैसे शुरू हुआ विवाद?
SIR प्रक्रिया को लेकर पहले से ही राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है। इस बीच एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और निर्देशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, कुछ नाम हटाने या बहाल करने, चुनावी डेटाबेस तक पहुंच और SIR से जुड़े प्रशासनिक फैसलों से था। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि एक दिन में चार बार तक आपत्तियां दर्ज की गईं।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन घटनाओं की अलग व्याख्या की है। आयोग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, कुछ मुद्दों पर चुनाव आयुक्तों ने टिप्पणियां या चिंताएं जरूर रखीं, लेकिन अंतिम फैसले सभी तीनों सदस्यों की मंजूरी से लिए गए। आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित फैसलों में किसी तरह की अलग-अलग राय के आधार पर निर्णय नहीं लिया गया।
Form 6 में बदलाव पर भी उठे सवाल

विवाद का एक हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म में SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी, जिसमें नए आवेदकों से उनके या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी मांगी गई।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की थी। उनके अनुसार, इस तरह का बदलाव करने की प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल थे। वहीं चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि जिन मुद्दों पर चर्चा हुई, वे संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा थे और अंतिम निर्णय आयोग की स्वीकृति के साथ लिए गए।
मतदाता डेटाबेस को लेकर भी चिंता
SIR विवाद में चुनावी डेटाबेस और उसके डिजिटल प्रबंधन का मुद्दा भी सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम तक पहुंच और उसके प्रबंधन में केंद्रीय स्तर पर बढ़ती भूमिका को लेकर सवाल उठाए थे। ऐसे सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मतदाता सूची का रखरखाव सीधे चुनाव प्रक्रिया और नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ा हुआ है। किसी मतदाता का नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और उचित सत्यापन महत्वपूर्ण माना जाता है।
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों के कई नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए। विपक्षी नेताओं ने आयोग से आंतरिक आपत्तियों, निर्णय लेने की प्रक्रिया और SIR से जुड़े फैसलों पर अधिक पारदर्शिता की मांग की। हालांकि, इन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच यह अंतर करना जरूरी है कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज कथित आपत्तियों को लेकर एक रिपोर्ट में जो दावे किए गए हैं और आयोग की ओर से जारी सफाई, दोनों अलग-अलग पक्ष हैं। आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।











