सीतामढ़ी: करीब 12 साल पुराने रिश्वतखोरी के मामले में मुजफ्फरपुर की विशेष निगरानी अदालत ने सीतामढ़ी के तत्कालीन जिला राष्ट्रीय बचत अधिकारी प्रदीप कुमार को 5 साल की जेल की सजा सुनाई है। अधिकारी को वर्ष 2014 में एक महिला बचत अभिकर्ता का बंद कमीशन दोबारा शुरू कराने के नाम पर 20 हजार रुपए रिश्वत लेते रंगेहाथ गिरफ्तार किया गया था। मामले में कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से पेश किए गए गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर उन्हें दोषी माना।
मामला वर्ष 2014 का है। सीतामढ़ी के परिहार थाना क्षेत्र के मनपौर बेला गांव निवासी सुनील कुमार ने 1 दिसंबर 2014 को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में उन्होंने बताया था कि उनकी बेटी प्रियंका कुमारी डाकघर में आवर्ती जमा यानी आरडी खाता खोलने वाली महिला प्रधान अभिकर्ता के तौर पर काम करती थीं।
शिकायत के मुताबिक जिला राष्ट्रीय बचत अधिकारी हर महीने अभिकर्ताओं की बैठक बुलाते थे। एक बैठक में प्रियंका कुमारी के अनुपस्थित रहने के बाद उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया था। इसके बाद उनका कमीशन बंद कर दिया गया। परिवार का आरोप था कि कमीशन को दोबारा चालू कराने के बदले अधिकारी की ओर से 20 हजार रुपए की मांग की जा रही थी।
शिकायत मिलने के बाद निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने मामले का सत्यापन कराया। सत्यापन में रिश्वत मांगने की बात सामने आने के बाद निगरानी टीम ने अधिकारी को पकड़ने के लिए ट्रैप की योजना बनाई। इसके बाद 9 दिसंबर 2014 को निगरानी की टीम ने सीतामढ़ी के कैलाशपुरी मोहल्ले स्थित अधिकारी के आवास पर कार्रवाई की।
कार्रवाई के दौरान प्रदीप कुमार को 20 हजार रुपए रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय वह सीतामढ़ी में जिला राष्ट्रीय बचत अधिकारी के पद पर तैनात थे। गिरफ्तारी के बाद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मामला दर्ज किया गया और न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायत में रिश्वत की मांग सीधे सरकारी प्रक्रिया से जुड़े काम को कराने के बदले किए जाने का आरोप था। आरडी यानी आवर्ती जमा योजना से जुड़े अभिकर्ताओं को ग्राहकों के खाते और बचत योजनाओं से जोड़ने के एवज में कमीशन मिलता है। किसी अभिकर्ता का कमीशन बंद होने के बाद उसे दोबारा शुरू कराने के लिए रिश्वत मांगे जाने का आरोप सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार से जुड़ा गंभीर मामला था।
मामले की सुनवाई मुजफ्फरपुर स्थित विशेष न्यायालय निगरानी में हुई। सेशन ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक कृष्णदेव साह ने अदालत के सामने 12 गवाह पेश किए। अभियोजन की ओर से मामले से जुड़े दस्तावेज और अन्य साक्ष्य भी अदालत के सामने रखे गए। इन साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने प्रदीप कुमार को रिश्वत लेने के मामले में दोषी माना।
अदालत में दोषसिद्धि के बाद सजा के बिंदु पर सुनवाई हुई। इसके बाद आरोपी अधिकारी को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई गई। इस फैसले के साथ वर्ष 2014 में दर्ज हुआ यह रिश्वतखोरी का मामला करीब एक दशक से अधिक समय बाद महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव पर पहुंचा है।
गौर करने वाली बात यह है कि गिरफ्तारी के समय भी निगरानी विभाग ने कार्रवाई से पहले शिकायत का सत्यापन कराया था। शिकायत सही पाए जाने के बाद ट्रैप टीम तैयार की गई और रिश्वत की रकम लेते समय अधिकारी को गिरफ्तार किया गया। वर्ष 2014 में गिरफ्तारी की जानकारी उस समय भी सामने आई थी।
उस समय सामने आई जानकारी के अनुसार निगरानी विभाग को शिकायत मिली थी कि अधिकारी कमीशन के भुगतान से संबंधित काम के एवज में 20 हजार रुपए की मांग कर रहे हैं। शिकायत के सत्यापन के बाद निगरानी की टीम सीतामढ़ी पहुंची थी और रकम स्वीकार करते ही अधिकारी को पकड़ लिया गया था।
मामले में दोषी ठहराए गए प्रदीप कुमार नालंदा जिले के बिहारशरीफ के रहने वाले बताए गए हैं। वर्ष 2014 में उनकी पोस्टिंग सीतामढ़ी में जिला राष्ट्रीय बचत अधिकारी के पद पर थी। शिकायतकर्ता के अनुसार उनकी बेटी के कमीशन को बंद किए जाने के बाद उसे दोबारा शुरू कराने के लिए रिश्वत की मांग की गई थी।
लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले ने एक बार फिर यह दिखाया है कि रिश्वतखोरी के मामलों में जांच और मुकदमे की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन ट्रैप कार्रवाई के बाद मामला अदालत तक पहुंचने पर साक्ष्यों के आधार पर दोष तय किया जा सकता है। इस मामले में निगरानी विभाग की कार्रवाई वर्ष 2014 में हुई थी और अब आरोपी अधिकारी को पांच साल की सजा मिली है।
सीतामढ़ी में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ निगरानी विभाग की कार्रवाई पहले भी होती रही है। जिले में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में निगरानी की कार्रवाई का लंबा रिकॉर्ड रहा है। ऐसे मामलों में रिश्वत की मांग की शिकायत मिलने के बाद सत्यापन और ट्रैप कार्रवाई की जाती है।
इस केस में भी शिकायतकर्ता ने सीधे निगरानी अन्वेषण ब्यूरो से संपर्क किया था। इसके बाद शिकायत की जांच हुई और अधिकारी को उसके आवास से रिश्वत की रकम लेते गिरफ्तार किया गया। करीब 12 साल बाद अदालत का फैसला आने से इस मामले का कानूनी निष्कर्ष सामने आया है।
फैसले के बाद सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। किसी सरकारी योजना या सेवा से जुड़े वैध लाभ को रिश्वत से जोड़ना आम लोगों के लिए गंभीर परेशानी पैदा करता है। ऐसे में निगरानी एजेंसियों की कार्रवाई और अदालतों में दोषसिद्धि को भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
वर्ष 2014 में 20 हजार रुपए रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े गए सीतामढ़ी के तत्कालीन जिला राष्ट्रीय बचत अधिकारी प्रदीप कुमार को अब पांच साल की जेल की सजा मिली है। मामला एक महिला बचत अभिकर्ता का आरडी कमीशन दोबारा शुरू कराने के नाम पर रिश्वत मांगने से जुड़ा था।










