Rafale-M Jets: INS विक्रांत पर पहली कोशिश में उतरा राफेल, भारत-पाक तनाव में निभाई थी अहम भूमिका

Rafale-M Jets: फ्रांसीसी राफेल-एम फाइटर जेट ने INS विक्रांत पर पहली कोशिश में सफल लैंडिंग की। जानें भारतीय नौसेना के लिए इसकी अहमियत और भारत-पाक तनाव से जुड़ा

भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोत INS विक्रांत पर फ्रांस के राफेल-M लड़ाकू विमान ने पहली कोशिश में सफल लैंडिंग की है। इस उपलब्धि के साथ 2002 की वह घटना भी चर्चा में है, जब भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान फ्रांसीसी राफेल ने अरब सागर में गश्त की थी।

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना के लिए 29 अक्टूबर 2026 का दिन खास रहा। फ्रांसीसी नौसेना का राफेल-M लड़ाकू विमान पहली बार भारत के स्वदेशी विमानवाहक पोत INS विक्रांत पर उतरा और पहले ही प्रयास में लैंडिंग सफल रही। इसके बाद विमान ने स्की-जंप तकनीक से उड़ान भी भरी। इस परीक्षण ने भारत के लिए खरीदे जा रहे राफेल मरीन विमानों की तैनाती की दिशा में एक अहम कदम पूरा किया है। इसी विमान का एक पुराना इतिहास भारत-पाकिस्तान के बीच 2002 में पैदा हुए सैन्य तनाव से भी जुड़ा है।

INS विक्रांत पर राफेल-M की सफल लैंडिंग क्यों है खास?

भारतीय नौसेना ने 30 अक्टूबर को राफेल-M की लैंडिंग का वीडियो जारी किया। करीब 45 हजार टन वजनी INS विक्रांत पर इस विमान की पहली लैंडिंग सफल रही। नौसेना के मुताबिक, यह परीक्षण राफेल मरीन को भारतीय विमानवाहक पोतों से संचालित करने की तैयारियों का हिस्सा है। इससे पहले विमान का परीक्षण गोवा स्थित INS हंसा की शोर-बेस्ड टेस्ट फैसिलिटी में किया गया था। 

यहां विमानवाहक पोत जैसी स्की-जंप व्यवस्था तैयार की गई है। इससे पता लगाया जाता है कि लड़ाकू विमान समुद्र में मौजूद पोत से सुरक्षित उड़ान भर सकता है या नहीं। भारत के विमानवाहक पोतों पर STOBAR तकनीक इस्तेमाल होती है। इसमें विमान कम दूरी में दौड़कर आगे बने ढलान से उड़ान भरता है। लैंडिंग के दौरान विमान के पिछले हिस्से में लगा हुक डेक पर मौजूद तार को पकड़ता है और विमान रुक जाता है। 

फ्रांस के चार्ल्स डी गॉल विमानवाहक पोत पर विमान को उड़ाने के लिए कैटापुल्ट सिस्टम है। ऐसे में राफेल-M को भारतीय व्यवस्था के अनुकूल बनाना जरूरी है। इसके पंख नहीं मुड़ते, इसलिए विमान को पोत के अंदर ले जाने वाले लिफ्ट प्लेटफॉर्म में भी बदलाव किए जा रहे हैं।

2002 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान क्या हुआ था?

राफेल मरीन का भारत-पाकिस्तान से जुड़ा इतिहास करीब 24 साल पुराना है। जून 2002 में दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव काफी बढ़ गया था। उस समय फ्रांस का विमानवाहक पोत चार्ल्स डी गॉल अरब सागर में तैनात था। फ्रांसीसी नौसेना का यह अभियान अफगानिस्तान में चल रहे सैन्य ऑपरेशन के समर्थन से जुड़ा था। इसे मिशन हेराक्लेस नाम दिया गया था। इसी दौरान फ्रांसीसी राफेल-M विमानों ने भारत और पाकिस्तान के समुद्री इलाकों के पास कई बार गश्त की।

फ्रांसीसी अखबार लिबरेशन की पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, इन लड़ाकू विमानों ने लगभग दस दिनों तक दोनों देशों के बीच समुद्री क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका कम करने की कोशिश की थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों की मौजूदगी से समुद्री रास्ते का इस्तेमाल करके संभावित हवाई घुसपैठ का खतरा कम करने में मदद मिली। हालांकि, इससे पाकिस्तान के पीछे हटने या दोनों देशों के बीच तनाव खत्म होने का सीधा दावा करना सही नहीं होगा।

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अमेरिकी लड़ाकू विमानों के साथ भी उड़ान भरता था राफेल

साल 2002 में फ्रांस के राफेल-M विमान अमेरिकी नौसेना के F-14 टॉमकैट और F/A-18 हॉर्नेट लड़ाकू विमानों के साथ गश्त कर रहे थे। ये विमान हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लैस थे। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान रोजाना करीब दो घंटे की कई गश्ती उड़ानें भरी जाती थीं। अमेरिकी E-2C हॉकआई विमान भी निगरानी के लिए मौजूद थे। इनका काम दूर से आने वाले विमानों की पहचान करना और खतरे की शुरुआती जानकारी देना था।

उस समय राफेल-M का F1 संस्करण इस्तेमाल होता था। यह मुख्य रूप से हवाई सुरक्षा और दुश्मन के लड़ाकू विमानों से मुकाबले के लिए तैयार किया गया था। बाद में आए F2 और F3 संस्करणों में जमीन पर मौजूद ठिकानों पर हमला करने की क्षमताएं भी जोड़ी गईं।

भारतीय नौसेना को कब मिलेंगे 26 राफेल मरीन विमान?

भारत ने 28 अप्रैल 2025 को फ्रांस के साथ करीब 63 हजार करोड़ रुपये का समझौता किया था। इसके तहत भारतीय नौसेना को कुल 26 राफेल विमान मिलेंगे। इनमें 22 सिंगल-सीट राफेल-M लड़ाकू विमान और चार दो सीट वाले ट्रेनर विमान शामिल हैं। नए विमानों की डिलीवरी 2028-29 के आसपास शुरू होने की उम्मीद है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सभी 26 विमानों की डिलीवरी 2030 तक पूरी करने का लक्ष्य है।

राफेल-M विमानों को INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य से संचालित करने की योजना है। चार दो सीट वाले ट्रेनर विमान विमानवाहक पोत से उड़ान भरने के लिए नहीं बने हैं। नए लड़ाकू विमान नौसेना के पुराने हो रहे मिग-29K बेड़े की जगह लेने में मदद करेंगे। भारतीय वायुसेना पहले से 36 राफेल लड़ाकू विमान इस्तेमाल कर रही है। नौसेना में राफेल मरीन आने से प्रशिक्षण, रखरखाव और उपकरणों के इस्तेमाल में दोनों सेनाओं को फायदा मिल सकता है।

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