Fast Track Court: रेप और POCSO मामलों में जल्द मिलेगा न्याय, कैबिनेट ने 71 नई अदालतों को दी मंजूरी

Fast Track Court: रेप और POCSO मामलों की जल्द सुनवाई के लिए कैबिनेट ने 71 नई फास्ट ट्रैक अदालतों को मंजूरी दी है। जानें इस फैसले से पीड़ितों को कैसे मिलेगा

केंद्र सरकार ने रेप और पॉक्सो मामलों की जल्द सुनवाई के लिए 71 अतिरिक्त फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का लक्ष्य तय किया है। इनकी संख्या 850 होगी। कैबिनेट ने योजना को मार्च 2031 तक बढ़ाते हुए 3,788 करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट मंजूर किया है।

नई दिल्ली: महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में जल्द न्याय दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार, 4 नवंबर 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना को पांच साल और जारी रखने की मंजूरी दी गई। सरकार ने देश में ऐसी अदालतों की संख्या 779 से बढ़ाकर 850 करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 3,788.04 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

देश में खुलेंगी 71 और फास्ट ट्रैक अदालतें

रेप और बच्चों के साथ यौन शोषण के मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरने वाले पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने के लिए सरकार ने फास्ट ट्रैक अदालतों का दायरा बढ़ाने का फैसला किया है। अभी देश में 779 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट काम कर रही हैं। नई योजना के तहत इनकी संख्या बढ़ाकर 850 की जाएगी। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट बैठक के बाद इस फैसले की जानकारी दी। 

उन्होंने बताया कि सरकार महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों से सख्ती से निपटने के लिए लगातार कदम उठा रही है। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना को वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक जारी रखने की मंजूरी मिली है। यानी यह व्यवस्था अब 31 मार्च 2031 तक चलेगी। जिन जिलों में रेप और पॉक्सो कानून के ज्यादा मामले लंबित हैं, वहां अदालतों की संख्या बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

3,788 करोड़ रुपये का खर्च कौन उठाएगा?

केंद्र सरकार ने इस योजना के लिए 3,788.04 करोड़ रुपये रखे हैं। इसमें से 2,353.15 करोड़ रुपये केंद्र सरकार देगी। यह पैसा निर्भया फंड से आएगा। वहीं, बाकी 1,434.89 करोड़ रुपये राज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेश मिलकर देंगे। इस पैसे से फास्ट ट्रैक अदालतों का खर्च उठाया जाएगा। अदालतों में जज, सरकारी वकील और बाकी कर्मचारियों की व्यवस्था की जाएगी। 

साथ ही सुनवाई के लिए जरूरी सुविधाएं भी बढ़ाई जाएंगी। सरकार चाहती है कि नई अदालतें खुलने के साथ पहले से चल रही अदालतों में भी काम ठीक से हो, ताकि लोगों को अपने मुकदमों के लिए ज्यादा इंतजार न करना पड़े।

हर अदालत में होंगे जज, सरकारी वकील और छह कर्मचारी

Fast Track Court: रेप और POCSO मामलों में जल्द मिलेगा न्याय, कैबिनेट ने 71 नई अदालतों को दी मंजूरी

सरकार ने फास्ट ट्रैक अदालतों में स्टाफ रखने की भी व्यवस्था की है। योजना के मुताबिक, हर अदालत में एक जज, एक विशेष सरकारी वकील और छह दूसरे कर्मचारी होंगे। सरकारी वकील अदालत में मुकदमों की पैरवी करेंगे। वहीं, बाकी कर्मचारी कागजी काम और सुनवाई से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालेंगे। इससे अदालत का रोज का काम आसानी से चल सकेगा और मामलों की सुनवाई में देरी कम होने की उम्मीद है।

इसके अलावा बच्चों और यौन अपराधों के पीड़ितों के लिए अदालतों में बेहतर इंतजाम किए जाएंगे। कोशिश रहेगी कि पीड़ित बच्चे और गवाह बिना डरे अपनी बात बता सकें। सुनवाई के दौरान उन्हें किसी तरह की परेशानी या बेवजह दबाव का सामना न करना पड़े।

छह साल में चार लाख से ज्यादा मुकदमे निपटे

देश में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट की शुरुआत 2 अक्टूबर 2019 को हुई थी। इन अदालतों को बनाने का मकसद रेप और बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों के मामलों की जल्दी सुनवाई करना था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 779 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट चल रही हैं। इनमें से 399 अदालतें खास तौर पर पॉक्सो कानून से जुड़े मामलों की सुनवाई करती हैं।

योजना शुरू होने के बाद से इन अदालतों में 4,02,457 मामलों का फैसला हो चुका है। हालांकि, अभी भी बड़ी संख्या में मुकदमे बाकी हैं। दिसंबर 2023 के आखिर में 2,02,175 मामले लंबित थे। दिसंबर 2025 तक इनकी संख्या बढ़कर 2,45,579 हो गई। यानी अदालतों में पुराने मुकदमे निपटाए जा रहे हैं, लेकिन नए मामले आने से काम का बोझ कम नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से सरकार ने अदालतों की व्यवस्था को और मजबूत करने पर जोर दिया है।

नई अदालतें खुलने से लोगों को क्या राहत मिलेगी?

फास्ट ट्रैक अदालतों में रेप और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों जैसे गंभीर मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दी जाती है। इन अदालतों में ऐसे मामलों पर अलग से ध्यान दिया जाता है, ताकि पीड़ितों को फैसले के लिए ज्यादा लंबा इंतजार न करना पड़े। पॉक्सो कानून 18 साल से कम उम्र के बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों से जुड़ा है। 

ऐसे मामलों में बच्चे की पहचान छिपाकर रखना और उसकी सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी होता है। अदालत में सुनवाई के दौरान भी इस बात का ख्याल रखा जाता है कि बच्चे को किसी तरह की परेशानी न हो। जिन जिलों में पहले से हजारों मुकदमे अटके हुए हैं, वहां नई अदालतें खुलने से कुछ राहत मिल सकती है। इससे पीड़ित परिवारों को बार-बार कोर्ट जाने की परेशानी भी कम होने की उम्मीद है। 

हालांकि, केवल अदालतें खोल देने से सभी मुकदमे जल्दी खत्म नहीं होंगे। समय पर जज और सरकारी वकील मिलने के साथ पुलिस की जांच भी पूरी होनी चाहिए। गवाहों के बयान और जरूरी कागजात समय पर अदालत पहुंचेंगे, तभी सुनवाई तेजी से आगे बढ़ पाएगी।

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