स्मार्ट सिटी के दावों के बीच जलापूर्ति का कड़वा सच

स्मार्ट सिटी के दावों के बीच जलापूर्ति का कड़वा सच

 हालात ऐसे हैं कि लोग मजबूरी में सप्लाई का पानी पी रहे हैं और बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। स्मार्ट सुविधाओं और आधुनिक व्यवस्था के बड़े-बड़े दावों के बावजूद शुद्ध पेयजल आज भी आम नागरिकों के लिए एक गंभीर समस्या बना हुआ है।

शहर के कई इलाकों में नलों से आने वाले पानी की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार पानी में बदबू आती है, रंग पीला या मटमैला होता है और उसमें गंदगी साफ नजर आती है। इसके बावजूद लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होने के कारण उसी पानी का इस्तेमाल पीने और खाना बनाने में करना पड़ रहा है। इसका नतीजा यह है कि पेट से जुड़ी बीमारियां, उल्टी-दस्त, टाइफाइड और त्वचा रोग के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

निवासियों के अनुसार, जलापूर्ति की पाइपलाइन कई इलाकों में बेहद पुरानी और जर्जर हालत में है। कई जगह सीवरेज लाइन और पानी की सप्लाई लाइन पास-पास बिछी होने के कारण गंदा पानी सप्लाई में मिलने की आशंका बनी रहती है। बरसात के मौसम में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है, जब नालियों का पानी पाइपलाइन में घुसने की शिकायतें आम हो जाती हैं। लोगों का आरोप है कि शिकायत करने के बावजूद केवल अस्थायी मरम्मत की जाती है, जिससे समस्या कुछ दिनों बाद फिर जस की तस हो जाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अशुद्ध पानी लंबे समय तक शरीर के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर इसका असर जल्दी और गंभीर रूप से पड़ता है। सरकारी अस्पतालों और निजी क्लीनिकों में जलजनित बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ने की बात भी सामने आ रही है, लेकिन इसके बावजूद जलापूर्ति व्यवस्था सुधारने को लेकर ठोस कदम उठते नजर नहीं आ रहे।

विडंबना यह है कि शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। Smart Cities Mission के तहत आधुनिक सड़कें, लाइटें और डिजिटल सुविधाएं गिनाई जाती हैं, लेकिन बुनियादी जरूरत—साफ और सुरक्षित पेयजल—अब भी लोगों को नसीब नहीं हो पा रहा। ऐसे में स्मार्ट सिटी के दावे केवल कागजों और प्रचार तक सीमित नजर आते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो स्मार्ट सिटी का सपना खोखला साबित होगा। नागरिकों का सीधा सवाल है कि जब पीने का पानी ही सुरक्षित नहीं है, तो बाकी स्मार्ट सुविधाओं का क्या मतलब है। लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि जलापूर्ति व्यवस्था की व्यापक जांच कराई जाए, पुरानी पाइपलाइनों को बदला जाए और नियमित रूप से पानी की गुणवत्ता की जांच सुनिश्चित की जाए।

कुल मिलाकर, स्मार्ट सिटी की चमक-दमक के पीछे जलापूर्ति की यह पिछड़ी तस्वीर गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। अगर समय रहते ठोस और स्थायी सुधार नहीं किए गए, तो सप्लाई का दूषित पानी लोगों की सेहत पर कहर बनकर टूटता रहेगा और अस्पताल ही उनकी मजबूरी बनते रहेंगे।

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