सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल सरकार को I-PAC और ईडी छापे में हस्तक्षेप पर फटकार लगाई। न्यायालय ने कहा कि अधिकारी अपने ड्यूटी के दौरान स्वतंत्र रहेंगे और राजनीतिक दबाव कानून पर असर नहीं डाल सकता।
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार को I-PAC और ईडी (Enforcement Directorate) छापे मामले में एक बार फिर कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एन वी अंजारी की पीठ ने सवाल उठाया कि क्या ड्यूटी पर रहते हुए ईडी अधिकारियों के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि ईडी अधिकारी सिर्फ इसलिए भारत के नागरिक नहीं रह जाते कि वे किसी संस्थान के अधिकारी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह भी पूछा कि अगर केंद्र में आपकी सरकार सत्ता में होती और कोई दूसरी राजनीतिक पार्टी राज्य स्तर पर इसी तरह हस्तक्षेप करती, तो क्या होता। कोर्ट का तर्क था कि लोकतंत्र में कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है और राजनीतिक स्थिति का कानून पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
I-PAC और ED रेड मामले का संदर्भ
मामला इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के कार्यालयों में किए गए छापों से जुड़ा है। ईडी ने जनवरी की शुरुआत में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के तहत I-PAC और इसके संबंधित लोगों के कार्यालयों में तलाशी ली थी। ईडी का आरोप है कि ममता बनर्जी और राज्य सरकार के कुछ अधिकारी इस छापे में हस्तक्षेप कर रहे थे।
ईडी ने कहा कि यह हस्तक्षेप जांच को बाधित कर रहा था। इसके अलावा, ईडी ने कोर्ट में याचिका दायर कर यह सुनिश्चित करने की मांग की कि अधिकारियों को बिना बाधा अपने अधिकारों का उपयोग करने दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर आपत्तियों और ममता सरकार के बचाव को गंभीरता से सुना और कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या मुख्यमंत्री द्वारा ईडी के छापे में बाधा डालने पर ईडी राज्य पुलिस के पास जा सकती है। कोर्ट का मानना है कि अधिकारियों को अपने ड्यूटी के दौरान कानून के तहत स्वतंत्र रहना चाहिए और राजनीतिक दबाव से प्रभावित नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून से ऊपर नहीं है, चाहे वह मुख्यमंत्री या किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य क्यों न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को यह चेतावनी दी कि जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना लोकतंत्र और कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ईडी अधिकारी अपने अधिकारों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं और उन्हें राजनीतिक दबाव से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
अगर केंद्र में आपकी सरकार होती तो क्या होता?
सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को यह उदाहरण देते हुए सवाल किया कि अगर केंद्र में उनकी पार्टी सत्ता में होती और कोई राज्य सरकार इसी तरह हस्तक्षेप करती, तो क्या होता। कोर्ट का तर्क था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून और प्रक्रिया सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। यह सवाल ममता सरकार के संभावित राजनीतिक लाभ और राज्य के स्तर पर हस्तक्षेप के दावों को चुनौती देता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायपालिका सभी नागरिकों और अधिकारियों के अधिकारों की रक्षा करेगी। राजनीतिक हस्तक्षेप से कानून की प्रक्रिया बाधित नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के अधिकारी किसी भी स्तर पर कानून को बाधित नहीं कर सकते।
इस मामले का राजनीतिक महत्व भी बहुत बड़ा है। I-PAC राजनीतिक परामर्श फर्म है जो तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करती है। ईडी द्वारा छापे और ममता सरकार द्वारा कथित हस्तक्षेप ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार यह संकेत देती है कि कानून और न्यायपालिका राजनीतिक दबावों से प्रभावित नहीं हो सकती।









