नोएल टाटा से बिगड़ता रहा रिश्ता, रतन टाटा के निधन के बाद कैसे अकेले पड़े चंद्रशेखरन

रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह में एन चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच मतभेद बढ़ते गए। छह महीने के गतिरोध के बाद चंद्रशेखरन ने इस्तीफा दिया।
नोएल टाटा से बिगड़ता रहा रिश्ता, रतन टाटा के निधन के बाद कैसे अकेले पड़े चंद्रशेखरन
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रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह में एन चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच मतभेद बढ़ते गए। छह महीने के गतिरोध के बाद चंद्रशेखरन ने इस्तीफा दिया।

टाटा समूह में लंबे समय से पर्दे के पीछे चल रही खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने बुधवार को घोषणा की कि वह फरवरी 2027 में अपना मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद दोबारा चेयरमैन पद के लिए खुद को पेश नहीं करेंगे। यह फैसला ऐसे समय आया है जब टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच कई महीनों से मतभेद चल रहे थे। इन मतभेदों में सबसे प्रमुख भूमिका टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की रही।

चंद्रशेखरन ने 2017 में टाटा संस की कमान संभाली थी। इससे पहले वह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी TCS के CEO और MD रह चुके थे। रतन टाटा के नेतृत्व के बाद उन्हें समूह को आगे ले जाने की जिम्मेदारी मिली थी। शुरुआती वर्षों में उनका नेतृत्व मजबूत माना गया और टाटा समूह ने डिजिटल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और अन्य नए क्षेत्रों में विस्तार की रणनीति पर काम किया।

लेकिन 9 अक्टूबर 2024 को रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व को लेकर तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी। रतन टाटा के रहते चंद्रशेखरन को समूह के शीर्ष नेतृत्व का मजबूत समर्थन प्राप्त था। रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और नोएल टाटा के प्रभाव का महत्व बढ़ गया। नोएल टाटा अक्टूबर 2024 में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन बने थे।

नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच मतभेद अचानक पैदा हुए हों, ऐसा नहीं है। 2025 के अंत तक दोनों के बीच कामकाजी संबंधों में तनाव की चर्चा शुरू हो चुकी थी। 2026 की शुरुआत में यह मतभेद टाटा संस के चेयरमैन के रूप में चंद्रशेखरन के अगले कार्यकाल के सवाल तक पहुंच गया।

फरवरी 2026 में चंद्रशेखरन के तीसरे पांच साल के कार्यकाल को लेकर फैसला होने की उम्मीद थी, लेकिन टाटा संस के बोर्ड ने उनकी पुनर्नियुक्ति का मामला टाल दिया। इसके पीछे समूह के नए कारोबारों के प्रदर्शन, पूंजी आवंटन, कर्ज और एयर इंडिया से जुड़े वित्तीय सवालों को लेकर चिंताएं बताई गईं। नोएल टाटा की ओर से भी चंद्रशेखरन के प्रदर्शन और रणनीति को लेकर आपत्तियां सामने आईं।

इसके बाद करीब छह महीने तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। चंद्रशेखरन के पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ। इसी गतिरोध ने उनकी स्थिति को कमजोर किया। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स टाटा संस में करीब 66% हिस्सेदारी रखते हैं और चंद्रशेखरन तथा ट्रस्ट्स के बीच बोर्ड प्रतिनिधित्व, रणनीति, एयर इंडिया के घाटे और एक अल्पांश शेयरधारक की हिस्सेदारी से जुड़े मुद्दों पर मतभेद थे।

टाटा समूह के लिए यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि टाटा संस पूरे समूह की होल्डिंग कंपनी है। टाटा संस के जरिए TCS, टाटा मोटर्स, एयर इंडिया समेत समूह की कई बड़ी कंपनियों पर नियंत्रण रहता है। इसलिए टाटा संस के चेयरमैन पद पर अस्थिरता का असर पूरे समूह के रणनीतिक फैसलों पर पड़ सकता है।

एक बड़ा विवाद टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर भी रहा है। नियामकीय दबाव के कारण टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने की संभावना पर चर्चा होती रही है, जबकि नोएल टाटा इस दिशा में आगे बढ़ने के पक्ष में नहीं बताए जाते। Reuters ने भी चंद्रशेखरन और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेदों में इस मुद्दे को प्रमुख कारणों में शामिल किया है।

इसके अलावा एयर इंडिया को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच सोच में अंतर सामने आया। टाटा समूह ने एयर इंडिया को दोबारा खड़ा करने के लिए बड़े निवेश और विस्तार की रणनीति अपनाई है, लेकिन कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन और घाटे को लेकर टाटा ट्रस्ट्स की ओर से सवाल उठाए गए। इसी तरह नए कारोबारों में बड़े निवेश और उनके रिटर्न को लेकर भी मतभेद सामने आए।

चंद्रशेखरन के सामने एक और चुनौती यह थी कि उनके कार्यकाल के आखिरी दौर में समूह को कई मोर्चों पर दबाव का सामना करना पड़ा। TCS को AI के दौर में कीमत और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियां मिलीं। एयर इंडिया को लेकर नियामकीय और परिचालन दबाव बढ़ा। वहीं Jaguar Land Rover पर हुए साइबर हमले ने भी समूह के कारोबार को प्रभावित किया।

ऐसे माहौल में चंद्रशेखरन का दोबारा चेयरमैन बनना पहले जितना आसान नहीं रह गया था। रिपोर्टों के मुताबिक, अगस्त में होने वाली AGM से पहले उनके सामने बोर्ड और शेयरधारकों के स्तर पर समर्थन का सवाल भी खड़ा हो गया था। संभावित विश्वास मत की स्थिति से बचने के लिए उन्होंने खुद ही अगले कार्यकाल के लिए आगे नहीं बढ़ने का फैसला किया।

यह घटनाक्रम रतन टाटा के बाद टाटा समूह में नेतृत्व परिवर्तन की जटिलता को भी सामने लाता है। रतन टाटा केवल चेयरमैन नहीं थे, बल्कि टाटा समूह के भीतर एक बेहद प्रभावशाली संरक्षक की भूमिका में थे। उनके निधन के बाद समूह को एक ऐसे दौर में प्रवेश करना पड़ा जिसमें परिवार, ट्रस्ट्स, बोर्ड और पेशेवर प्रबंधन के बीच संतुलन बनाना पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया।

नोएल टाटा का प्रभाव भी इसी दौर में बढ़ा। वह रतन टाटा के सौतेले भाई हैं और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन के रूप में समूह के सबसे प्रभावशाली हितधारकों में शामिल हैं। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66% हिस्सेदारी होने के कारण उनका रुख कंपनी के शीर्ष नेतृत्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के रिश्ते में आई दूरी को केवल व्यक्तिगत विवाद के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे कॉरपोरेट गवर्नेंस, रणनीति, निवेश, बोर्ड संरचना और टाटा संस के भविष्य से जुड़े बड़े सवाल हैं। इसलिए दोनों के मतभेद का असर व्यक्तिगत रिश्ते से कहीं ज्यादा व्यापक है।

टाटा समूह पहले भी नेतृत्व को लेकर बड़े बोर्डरूम विवाद से गुजर चुका है। 2016 में साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद रतन टाटा और मिस्त्री के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली थी। इसके बाद 2017 में चंद्रशेखरन टाटा संस के चेयरमैन बने।

अब करीब एक दशक बाद टाटा समूह फिर नेतृत्व संकट के दौर में खड़ा है। फर्क यह है कि इस बार विवाद रतन टाटा और उनके उत्तराधिकारी के बीच नहीं, बल्कि रतन टाटा के निधन के बाद पेशेवर चेयरमैन चंद्रशेखरन और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के बीच रणनीतिक मतभेदों से जुड़ा है।

चंद्रशेखरन ने साफ किया है कि वह तुरंत समूह से अलग नहीं हो रहे हैं। उनका कार्यकाल फरवरी 2027 तक जारी रहेगा। उन्होंने कहा है कि टाटा समूह के कई महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रोजेक्ट अभी निर्णायक चरण में हैं और वह उनके क्रियान्वयन में सहयोग जारी रखेंगे।

हालांकि उनके इस्तीफे की घोषणा ने टाटा समूह के अगले चेयरमैन को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। फिलहाल समूह के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा नेतृत्व चुनना होगी, जो टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस के बोर्ड और समूह की कंपनियों के बीच संतुलन बनाए रख सके।

यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब टाटा समूह को एयर इंडिया के पुनर्गठन, TCS की बदलती तकनीकी चुनौतियों, JLR के साइबर हमले और कई नए कारोबारों में भारी निवेश जैसे मुद्दों से एक साथ निपटना है। ऐसे में नेतृत्व में अनिश्चितता समूह के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।

कुल मिलाकर, रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह में चंद्रशेखरन का मजबूत समर्थन आधार धीरे-धीरे कमजोर होता गया और नोएल टाटा के साथ रणनीतिक मतभेद बढ़ते गए। फरवरी 2026 में पुनर्नियुक्ति पर फैसला टलने के बाद छह महीने तक गतिरोध बना रहा। आखिरकार चंद्रशेखरन ने फरवरी 2027 में कार्यकाल पूरा होने के बाद दोबारा चेयरमैन नहीं बनने का फैसला किया। अब टाटा समूह के सामने अगला बड़ा सवाल नए नेतृत्व और परिवार-ट्रस्ट-बोर्ड के बीच संतुलन कायम करने का है।

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