Tethered Drone: ऑपरेशन सिंदूर के बाद सीमा निगरानी में बढ़ेगी ड्रोन तकनीक की भूमिका, UPITS में दिखी नई क्षमता

Tethered Drone: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना सीमा निगरानी में टेथर्ड ड्रोन की भूमिका बढ़ाने पर जोर दे रही है। UPITS 2026 में प्रदर्शित इस तकनीक की लगातार

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के लिए उपयोगी साबित हुआ टेथर्ड ड्रोन अब देश की सीमाओं की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने की तैयारी में है। निगरानी और सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने वाले इस ड्रोन की मदद से सीमा क्षेत्रों में लगातार नजर रखने और महत्वपूर्ण गतिविधियों की निगरानी करने की क्षमता बढ़ सकती है।

नई दिल्ली: भारत में सैन्य निगरानी और सुरक्षा जरूरतों के लिए ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इसी कड़ी में टेथर्ड ड्रोन ने भी रक्षा क्षेत्र में खास ध्यान खींचा है। उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो (UPITS) में प्रदर्शित इस ड्रोन को लंबे समय तक हवा में रहकर निगरानी करने की क्षमता के लिए पेश किया गया। कंपनी के प्रतिनिधियों के अनुसार, सेना की ओर से इस तरह की प्रणाली की मांग में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, किसी खास सीमा क्षेत्र में इसकी मौजूदा तैनाती की आधिकारिक पुष्टि अलग से उपलब्ध नहीं है।

हाल के सैन्य अभियानों और आधुनिक युद्धक्षेत्रों में ड्रोन की बढ़ती भूमिका ने रक्षा बलों का ध्यान मानवरहित प्रणालियों की ओर बढ़ाया है। भारत में भी ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन, काउंटर-ड्रोन और अन्य मानवरहित प्रणालियों की उपयोगिता पर ज्यादा जोर दिया गया है। सितंबर 2026 में भारतीय वायुसेना के ड्रोनेथॉन कार्यक्रम में भी कई स्वदेशी UAV और काउंटर-यूएएस प्रणालियों का प्रदर्शन और परीक्षण किया गया था।

क्या है टेथर्ड ड्रोन?

टेथर्ड ड्रोन सामान्य ड्रोन से अलग होता है, क्योंकि उड़ान के दौरान यह एक केबल के जरिए जमीन पर मौजूद ग्राउंड सिस्टम से जुड़ा रहता है। इस केबल के माध्यम से ड्रोन को लगातार बिजली मिलती रहती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि बैटरी की सीमित क्षमता के कारण होने वाली कम उड़ान अवधि की समस्या काफी हद तक कम हो जाती है।

UPITS में प्रदर्शित सिस्टम के बारे में कंपनी प्रतिनिधियों ने बताया कि टेथर्ड मोड में यह ड्रोन करीब आठ घंटे तक लगातार हवा में रह सकता है। इसके अलावा इसे समुद्र तल से लगभग 5,500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने के लिए तैयार किया गया है। ड्रोन करीब 110 मीटर की ऊंचाई तक जाकर निगरानी कर सकता है।

तेज हवा में भी निगरानी की क्षमता

कंपनी के मुताबिक, ड्रोन लगभग 35 किलोमीटर प्रति घंटे की हवा की गति में भी स्थिर रह सकता है। यह क्षमता खास तौर पर पहाड़ी और संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है, जहां तेज हवाएं सामान्य ड्रोन संचालन को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं, टेथर हटाकर बैटरी मोड में ड्रोन की उड़ान अवधि करीब 45 मिनट बताई गई है। इसका मतलब है कि ऐसे मिशनों में जहां लंबे समय तक एक निश्चित इलाके पर निगरानी बनाए रखना जरूरी हो, टेथर्ड मोड ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे और सेंसर का विकल्प

यह इलेक्ट्रिक क्वाडकॉप्टर ग्राउंड-बेस्ड पावर सिस्टम और बैटरी दोनों के साथ काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें ब्रशलेस डीसी इलेक्ट्रिक मोटर्स का इस्तेमाल किया गया है। कंपनी के अनुसार इसका डिजाइन स्थिर उड़ान और अपेक्षाकृत कम शोर वाले संचालन को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।ड्रोन की लंबाई और चौड़ाई करीब 1.5 मीटर तथा ऊंचाई करीब 0.5 मीटर बताई गई है। 

इसका अधिकतम टेकऑफ वजन लगभग 15 किलोग्राम है। इस क्षमता के कारण इसमें हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे और अलग-अलग निगरानी सेंसर लगाए जा सकते हैं।

सीमा और आपदा प्रबंधन में इस्तेमाल

टेथर्ड ड्रोन का संभावित इस्तेमाल केवल सैन्य निगरानी तक सीमित नहीं है। कंपनी के अनुसार, इसे सीमा क्षेत्रों, जंगलों और संवेदनशील इलाकों की निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। भीड़ प्रबंधन, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की निगरानी और बड़े आयोजनों में भी इसकी भूमिका हो सकती है। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में इसकी उपयोगिता और भी महत्वपूर्ण हो सकती है। 

बाढ़, जंगल की आग या अन्य आपात स्थितियों में ड्रोन लंबे समय तक एक क्षेत्र के ऊपर रहकर ग्राउंड कंट्रोल सेंटर तक रियल-टाइम तस्वीरें और वीडियो पहुंचा सकता है। इससे राहत और बचाव एजेंसियों को घटनास्थल की स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।

भारतीय रक्षा क्षेत्र में क्यों बढ़ रही रुचि?

रूस-यूक्रेन युद्ध और हाल के अन्य संघर्षों में UAV और काउंटर-UAS तकनीक के व्यापक इस्तेमाल ने आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका को और प्रमुख बनाया है। भारत ने भी मानवरहित प्रणालियों और काउंटर-ड्रोन क्षमताओं पर अपना फोकस बढ़ाया है। रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 2026 में भी कई ड्रोन और एंटी-ड्रोन प्रणालियों से जुड़े प्रस्तावों को मंजूरी दी थी।

ऐसे माहौल में टेथर्ड ड्रोन जैसी प्रणालियां खास तौर पर लगातार निगरानी, ऊंचाई से निगरानी और वास्तविक समय की सूचना उपलब्ध कराने में उपयोगी साबित हो सकती हैं। हालांकि किसी भी सिस्टम की वास्तविक सैन्य प्रभावशीलता उसकी तैनाती, सेंसर क्षमता, मौसम, संचार व्यवस्था और परिचालन परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

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