उत्तराखंड में बारिश से रुका पिरुल एकत्रीकरण, वनाग्नि रोकने और ब्रिकेट निर्माण अभियान पर पड़ा असर

उत्तराखंड में बारिश के कारण पिरुल एकत्रीकरण प्रभावित हुआ है। इससे वनाग्नि रोकथाम और पिरुल से ब्रिकेट निर्माण अभियान की रफ्तार धीमी पड़ गई है।

उत्तराखंड में मौसम बदलने और बारिश होने से चीड़ की पत्तियों यानी पिरुल का एकत्रीकरण प्रभावित हुआ है। इससे वनाग्नि रोकथाम और पिरुल से ब्रिकेट बनाने की सरकारी मुहिम की रफ्तार धीमी पड़ गई है।

 Dehradun: उत्तराखंड में लगातार बदलते मौसम और बारिश के कारण पिरुल एकत्रीकरण का कार्य प्रभावित हो गया है। चीड़ के जंगलों में बिछी पत्तियां गीली होने से उन्हें इकट्ठा करना मुश्किल हो रहा है। वन विभाग के अनुसार इससे वनाग्नि नियंत्रण और पिरुल आधारित ब्रिकेट निर्माण अभियान की गति पर असर पड़ा है। विभाग अब मौसम साफ होने और पिरुल के सूखने का इंतजार कर रहा है।

बारिश से थमा पिरुल एकत्रीकरण अभियान

उत्तराखंड में हालिया बारिश के बाद चीड़ के जंगलों में फैली पिरुल की परत गीली हो गई है। इसकी वजह से पिरुल को इकट्ठा करने का काम फिलहाल रुक गया है। वन विभाग के मुताबिक सूखी पिरुल जंगलों में आग फैलने का बड़ा कारण बनती है, इसलिए इसे समय पर हटाना जरूरी माना जाता है।

उत्तराखंड में बारिश से रुका पिरुल एकत्रीकरण, वनाग्नि रोकने और ब्रिकेट निर्माण अभियान पर पड़ा असर

अधिकारियों का कहना है कि मौसम साफ होने और पिरुल के सूखने के बाद ही दोबारा एकत्रीकरण शुरू किया जा सकेगा।

वनाग्नि रोकने के साथ संसाधन के रूप में हो रहा उपयोग

राज्य सरकार पिरुल को केवल वनाग्नि का कारण मानने के बजाय संसाधन के रूप में उपयोग करने की दिशा में भी काम कर रही है। पिरुल से ब्रिकेट कोयला बनाने के लिए कई वन प्रभागों में इकाइयां स्थापित की गई हैं, जबकि कुछ स्थानों पर नई इकाइयों की तैयारी चल रही है।

वन विभाग महिला समूहों के माध्यम से पिरुल एकत्र करवा रहा है और उन्हें प्रति किलोग्राम तय दर पर भुगतान भी किया जाता है। इसके बाद यह सामग्री ब्रिकेट निर्माण इकाइयों को भेजी जाती है।

संवेदनशील वन क्षेत्रों पर विशेष नजर

वन विभाग के अनुसार राज्य के लगभग 15 प्रतिशत वन क्षेत्र में चीड़ के जंगल हैं, जहां हर साल बड़ी मात्रा में पिरुल निकलता है। अल्मोड़ा, टिहरी, गढ़वाल, उत्तरकाशी, नैनीताल और बागेश्वर जैसे वन प्रभाग वनाग्नि के लिहाज से संवेदनशील माने जाते हैं।

मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन सुशांत पटनायक ने बताया कि सभी वन प्रभागों को हर महीने पिरुल एकत्रीकरण की रिपोर्ट वन मुख्यालय को भेजने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि अभियान की निगरानी की जा सके।

Leave a comment