वाराणसी में भारी बारिश के बाद शहर में हुए जलभराव को लेकर जल निगम के अधिशासी अभियंता पवन कुमार गुप्ता के निलंबन के बाद अब उनका पक्ष भी सामने आया है। शासन की कार्रवाई में जहां पंपिंग स्टेशनों के संचालन में लापरवाही और जरूरी तैयारियां नहीं किए जाने को निलंबन का आधार बताया गया है, वहीं अधिशासी अभियंता का कहना है कि उन्होंने पंप बंद किए जाने की जानकारी पहले ही संबंधित अधिकारियों को दे दी थी। उनका दावा है कि 20 अगस्त को ही प्रधानमंत्री कार्यालय और नगर निगम को पंप बंद करने की सूचना भेज दी गई थी। ऐसे में उन्होंने अपने निलंबन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जब संबंधित स्तर पर पहले से जानकारी उपलब्ध थी, तो पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर कैसे तय की गई।
वाराणसी में जलभराव की समस्या को लेकर उत्तर प्रदेश जल निगम नगरीय के निर्माण खंड में तैनात अधिशासी अभियंता पवन कुमार गुप्ता को निलंबित किया गया है। शासन की ओर से उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक अनुशासन एवं अपील नियमावली-1999 के नियम-7 के तहत विभागीय जांच भी शुरू की गई है। उन्हें निलंबन अवधि में मुख्य अभियंता कानपुर क्षेत्र के कार्यालय से संबद्ध किया गया है। सरकार की प्रारंभिक जांच में चौकाघाट सीवेज पंपिंग स्टेशन और गोइठहां एसटीपी के पंपों के संचालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
सरकारी जांच के मुताबिक 3 और 4 सितंबर को चौकाघाट सीवेज पंपिंग स्टेशन तथा गोइठहां सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में पंप बंद पाए गए। भारी बारिश के दौरान पंपों का समय पर संचालन नहीं होने से सीवर लाइनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने और शहर के निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति बनने की बात कही गई है। इसके अलावा चौकाघाट सीवेज पंपिंग स्टेशन पर नदी के बैकफ्लो को रोकने के लिए जरूरी गेट या बैरियर लगाने को लेकर पर्याप्त आकलन और कार्ययोजना तैयार नहीं करने का भी आरोप है।
इसी कार्रवाई को लेकर अब अधिशासी अभियंता पवन कुमार गुप्ता ने अपने स्तर से सफाई दी है। उनका कहना है कि पंपों को बंद रखने की स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई थी और इसकी सूचना पहले ही संबंधित अधिकारियों को दी गई थी। उनके अनुसार 20 अगस्त को प्रधानमंत्री कार्यालय और नगर निगम को इस संबंध में जानकारी भेजी गई थी। उनका सवाल है कि यदि पंपों के संचालन से संबंधित स्थिति और उससे जुड़े विषयों की जानकारी पहले ही दे दी गई थी, तो बाद में हुई जलभराव की समस्या के लिए अकेले जल निगम के अधिशासी अभियंता को जिम्मेदार ठहराना कितना उचित है। यह उनका पक्ष है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि अलग से नहीं हुई है।
मामले में सरकार और विभाग की ओर से सामने आए तथ्यों में यह कहा गया है कि पंपों के संचालन में लापरवाही से जल निकासी प्रभावित हुई। वहीं अधिशासी अभियंता का दावा है कि विभागीय स्तर पर जरूरी सूचना समय रहते भेजी गई थी। अब विभागीय जांच में यह देखा जाना बाकी है कि 20 अगस्त को भेजी गई कथित सूचना किस अधिकारी या कार्यालय को मिली, उसमें क्या जानकारी दी गई थी, पंप बंद करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया और संबंधित अधिकारियों ने उस सूचना के आधार पर क्या कार्रवाई की। इन सवालों के जवाब जांच के दौरान सामने आ सकते हैं।
वाराणसी में 3 और 4 सितंबर को हुई भारी बारिश के दौरान कई निचले इलाकों में पानी भर गया था। जल निकासी व्यवस्था पर दबाव बढ़ने से सड़कें और आवासीय क्षेत्र प्रभावित हुए। पंपिंग स्टेशनों की भूमिका ऐसे समय में महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बारिश और सीवर नेटवर्क पर बढ़ने वाले दबाव के बीच पानी की निकासी के लिए इनका संचालन किया जाता है। इसी वजह से पंप बंद रहने का मुद्दा जांच में प्रमुख बिंदु बन गया है।
नगर विकास मंत्री ए.के. शर्मा ने 12 और 13 सितंबर को वाराणसी का दौरा कर जलभराव प्रभावित इलाकों का स्थलीय निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान उन्होंने जल निकासी व्यवस्था की समीक्षा की और अधिकारियों को प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से राहत कार्य करने के निर्देश दिए। रिपोर्टों के मुताबिक मंत्री ने पंपिंग स्टेशनों की स्थिति को लेकर नाराजगी जताई थी। इसके बाद शासन स्तर पर अधिशासी अभियंता के खिलाफ कार्रवाई हुई।
हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक मंत्री की समीक्षा बैठक में भी अधिशासी अभियंता की अनुपस्थिति को लेकर नाराजगी सामने आई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि समीक्षा बैठक के दौरान उन्हें बुलाने के लिए संबंधित अधिकारी को फोन करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन पवन कुमार गुप्ता बैठक में उपस्थित नहीं हुए। हालांकि निलंबन आदेश में किन-किन घटनाओं को आधार बनाया गया है और विभागीय जांच में उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी किस सीमा तक तय होती है, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
सरकार की ओर से की गई कार्रवाई में केवल पंप बंद रहने का मुद्दा ही नहीं, बल्कि चौकाघाट पंपिंग स्टेशन पर वरुणा नदी के बैकफ्लो को रोकने के लिए आवश्यक व्यवस्था की योजना नहीं बनाए जाने का भी उल्लेख है। विभागीय प्रारंभिक जांच में इसे गंभीर लापरवाही के रूप में देखा गया है। साथ ही उच्च अधिकारियों के निर्देशों के अनुपालन में अपेक्षित कार्रवाई नहीं किए जाने की बात भी सामने आई है।
अब अधिशासी अभियंता के उस दावे को भी जांच का हिस्सा बनाया जाना महत्वपूर्ण होगा कि उन्होंने 20 अगस्त को ही पंप बंद करने से जुड़ी जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय और नगर निगम को दे दी थी। यदि उनके पास इस सूचना को भेजे जाने का आधिकारिक रिकॉर्ड, पत्र, ई-मेल या अन्य दस्तावेज मौजूद हैं, तो विभागीय जांच में उनकी भूमिका और जिम्मेदारी का आकलन करते समय इन दस्तावेजों की भी जांच की जा सकती है। दूसरी ओर, केवल सूचना भेज देना और वास्तविक समय पर पंप संचालन या वैकल्पिक जल निकासी व्यवस्था सुनिश्चित करना अलग-अलग जिम्मेदारियां हो सकती हैं। इसलिए जांच में इन दोनों पहलुओं को अलग-अलग देखा जाना जरूरी होगा।
इस पूरे विवाद का केंद्र यही है कि वाराणसी में जलभराव के दौरान पंपिंग व्यवस्था क्यों प्रभावित हुई और इसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है। सरकार ने प्रारंभिक जांच के आधार पर निलंबन किया है, जबकि अधिशासी अभियंता अपने बचाव में पूर्व सूचना देने का दावा कर रहे हैं। विभागीय जांच में रिकॉर्ड, आदेश, संचार और पंप संचालन से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि पंप बंद रहने का निर्णय किसके स्तर पर हुआ और उसे समय रहते चालू कराने की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी।
निलंबन के बाद पवन कुमार गुप्ता को उत्तर प्रदेश जल निगम नगरीय के कानपुर क्षेत्र के मुख्य अभियंता कार्यालय से संबद्ध किया गया है। निलंबन अवधि में उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा। उनके खिलाफ विभागीय जांच के लिए अधिकारी भी नियुक्त किया गया है। इसका मतलब यह है कि निलंबन फिलहाल अंतिम दोषसिद्धि नहीं है, बल्कि विभागीय कार्रवाई और जांच की प्रक्रिया का हिस्सा है।
वाराणसी में लगातार बारिश के दौरान जल निकासी व्यवस्था पहले भी प्रशासन के लिए चुनौती रही है। ऐसे में पंपिंग स्टेशन, सीवर लाइन, नालों और नदी के बैकफ्लो को रोकने वाली व्यवस्थाओं की समय रहते समीक्षा जरूरी हो जाती है। इस घटना के बाद विभागीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि संवेदनशील क्षेत्रों में मानसून से पहले कितनी तैयारी की गई थी और पंपिंग स्टेशनों की संचालन व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हुई।
फिलहाल मामले में दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं। सरकारी प्रारंभिक जांच पंप बंद रहने, जल निकासी प्रभावित होने और जरूरी कार्ययोजना नहीं बनाए जाने को गंभीर लापरवाही मान रही है, जबकि निलंबित अधिशासी अभियंता का कहना है कि उन्होंने 20 अगस्त को ही संबंधित स्तरों पर पंप बंद करने की सूचना दे दी थी। अब विभागीय जांच में दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच होगी। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जलभराव के लिए प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर किसकी कितनी जिम्मेदारी थी।












