भोजपुर के जवइनिया में गंगा कटाव से 150 से अधिक घर नदी में समाए

भोजपुर के शाहपुर प्रखंड के जवइनिया गांव में गंगा के तेज कटाव से 150 से अधिक घर नदी में समा चुके थे। ग्रामीणों ने कटावरोधी उपायों और सुरक्षित स्थान पर स्थायी पुनर्वास की मांग की।
भोजपुर के जवइनिया में गंगा कटाव से 150 से अधिक घर नदी में समाए
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भोजपुर के शाहपुर प्रखंड के जवइनिया गांव में गंगा के तेज कटाव से बड़ी संख्या में घर, खेत, घरेलू सामान, पेड़, धार्मिक स्थल और सार्वजनिक ढांचे प्रभावित हुए हैं। जुलाई 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, गांव के वार्ड संख्या चार और पांच में 150 से अधिक घर गंगा में समा चुके थे और कटाव लगातार जारी था।

कटाव की रफ्तार इतनी तेज थी कि कई परिवारों को अपने वर्षों पुराने घरों से जरूरी सामान निकालने का भी पूरा मौका नहीं मिला। कुछ लोग सामान सुरक्षित करने में जुटे रहे, जबकि अन्य बच्चों, बुजुर्गों और पशुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की कोशिश करते रहे। कई परिवारों के घरों के साथ खेत, सामान और पेड़ भी नदी की धारा में चले गए।

जवइनिया के ग्रामीणों के मुताबिक, गांव के कई हिस्सों में लगातार जमीन खिसक रही थी। घरों की नींव कमजोर पड़ रही थी और लोगों के सामने अपने घर के अगले हिस्से के कटाव की चिंता बनी हुई थी।

एक स्थानीय निवासी ने बताया था कि उनके परिवार की कई पीढ़ियां इसी गांव में रही थीं। रिपोर्ट के अनुसार, एक ग्रामीण ने करीब 16 लाख रुपये खर्च कर डेढ़ कट्ठे से अधिक जमीन पर 11 कमरों का घर बनाया था। कटाव के बाद यह मकान गंगा में समा गया और परिवार को बांध के आसपास रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।

ग्रामीणों के लिए घर केवल रहने की जगह नहीं थे। इन्हीं घरों में बच्चों का जन्म हुआ, बुजुर्गों ने जीवन बिताया, परिवारों में शादियां हुईं और त्योहार मनाए गए। घरों के आसपास की जमीन भी परिवारों की रोजी-रोटी का आधार थी। खेती योग्य जमीन पहले नदी में जाने के बाद कई परिवारों के सामने घर बचाने की चुनौती भी खड़ी हो गई।

जवइनिया में कटाव से केवल मकानों को नुकसान नहीं पहुंचा। रिपोर्ट में घुरूहु ब्रह्म बाबा मंदिर, वृक्षदंड ब्रह्म बाबा मंदिर, गोवर्धन मंदिर और मां काली मंदिर के गंगा में समा जाने का उल्लेख है। नल-जल योजना की पानी की टंकी और बड़े पेड़ भी कटाव की भेंट चढ़ गए।

दामोदरपुर पंचायत के वार्ड चार और पांच में करीब 2500 लोगों की आबादी थी। स्थानीय प्रतिनिधि के मुताबिक, कटाव के कारण बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए।

कटाव प्रभावित परिवारों के सामने अब सुरक्षित स्थान की समस्या है। नदी के किनारे से हटने का अर्थ केवल मकान बदलना नहीं है। इससे खेत, रोजगार के साधन, बच्चों की पढ़ाई और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क से दूरी की स्थिति पैदा हो सकती है।

ग्रामीणों ने लंबे समय से स्थायी समाधान की मांग की है। उनका कहना रहा कि तत्काल राहत या कुछ समय के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। उनकी मांगों में गंगा के कटाव वाले हिस्सों में बोल्डर पिचिंग, मजबूत ठोकर और अन्य कटावरोधी उपाय शामिल थे।

ग्रामीणों की मांग यह भी थी कि उन्हें केवल आर्थिक सहायता देने के बजाय सुरक्षित स्थान पर घर बनाकर दिया जाए, क्योंकि दोबारा घर बनाने की क्षमता हर परिवार के पास नहीं है।

गंगा किनारे रहने वाले लोगों के लिए कटाव की दिशा का अनुमान लगाना मुश्किल होता है। एक ओर नदी का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ का खतरा रहता है, वहीं जलस्तर घटने के बाद भी कई जगह तेज कटाव शुरू हो जाता है। किनारे की मिट्टी कमजोर होने पर नदी की धारा जमीन को अंदर की ओर काटती चली जाती है।

कटाव की स्थिति में गरीब और सीमित आय वाले परिवारों के सामने सबसे अधिक कठिनाई होती है। जिनके पास दूसरी जमीन या शहर में मकान नहीं है, उनके लिए घर का उजड़ना सीधे बेघर होने की स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसे परिवार राहत शिविर, बांध, सड़क किनारे या रिश्तेदारों के घर पर रहने को मजबूर हो सकते हैं।

बरसात के मौसम में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए अस्थायी ठिकानों पर रहना भी कठिन हो जाता है। घर के साथ कपड़े, बर्तन, फर्नीचर, अनाज, जरूरी कागजात, कृषि उपकरण और अन्य घरेलू सामान भी नदी में बह सकता है। कई परिवारों के पास इन सामानों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय नहीं होता।

जवइनिया में कुछ परिवारों के घर पूरी तरह नदी में चले गए, जबकि कई अन्य घर भी खतरे की जद में आ गए। प्रशासन और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े अधिकारियों ने राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया था। अधिकारियों की मौजूदगी और राहत सामग्री के जरिए तत्काल संकट को संभालने की कोशिश की गई।

हालांकि, ग्रामीणों की चिंता थी कि स्थायी सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने तक नदी दोबारा उनके लिए खतरा बन सकती है। उनके अनुसार, स्थानीय स्तर पर मिट्टी भरने, बोरे लगाने, सामान हटाने और बच्चों को सुरक्षित स्थान पर भेजने जैसे प्रयास किए गए, लेकिन तेज कटाव के दौरान जमीन तेजी से खिसक सकती है।

यह समस्या केवल भोजपुर तक सीमित नहीं है। बिहार के दूसरे गंगा किनारे वाले जिलों में भी हाल के वर्षों में कटाव से घर और खेत प्रभावित होने की घटनाएं सामने आती रही हैं।

अगस्त 2026 में भागलपुर के इंग्लिश गांव में तेज कटाव के कारण एक ही रात में 15 घर गंगा में समा गए थे। एक परिवार के लोगों ने रात में घर का हिस्सा टूटने की आवाज सुनी और बाहर निकलकर जान बचाई, लेकिन घर का सामान नदी में चला गया।

इस घटना में भी ग्रामीणों ने बताया कि पहले उनकी खेती योग्य जमीन कटाव में गई और बाद में घर भी नदी में चला गया। प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को चिह्नित कर सरकारी सहायता दिलाने और जरूरी सामान उपलब्ध कराने की बात कही थी।

भोजपुर के कटाव पीड़ित परिवारों के सामने अब बची हुई जमीन को सुरक्षित रखने और जिन लोगों के घर जा चुके हैं, उन्हें स्थायी रूप से बसाने का सवाल है। राहत और बचाव कार्य तत्काल जरूरतें पूरी कर सकते हैं, लेकिन विस्थापित परिवारों के लिए लंबे समय तक सुरक्षित जीवन सुनिश्चित करने के लिए पुनर्वास की व्यवस्था जरूरी होती है।

पुनर्वास की प्रक्रिया में जमीन, आवास, सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधा और रोजगार से जुड़े सवाल एक साथ सामने आते हैं। केवल जमीन उपलब्ध कराने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती, क्योंकि वहां पहुंचने का रास्ता, पेयजल और अन्य जरूरी सुविधाएं भी आवश्यक होती हैं।

गंगा किनारे बसे गांवों के लोगों की जिंदगी नदी से जुड़ी है। नदी खेती के लिए पानी देती है और आसपास की जमीन उनकी आजीविका का आधार है। पीढ़ियों से लोग इन्हीं गांवों में रहते आए हैं। लेकिन नदी की धारा बदलने पर वही नदी उनके लिए खतरा बन जाती है।

जवइनिया में गंगा के कटाव से उजड़े परिवारों के सामने वर्षों की मेहनत के बाद दोबारा जीवन शुरू करने की चुनौती है। जिन लोगों ने अपने घर को अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित मानकर बनाया था, वे अब सुरक्षित ठिकाने की तलाश में हैं। बच्चों की पढ़ाई, परिवार का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतें भी प्रभावित होती हैं।

कटाव के बाद समस्या जमीन और मकान तक सीमित नहीं रहती। परिवारों की जमा पूंजी, खेती, रोजी-रोटी, घरेलू सामान और वर्षों की यादें भी प्रभावित होती हैं।

कटाव प्रभावित गांवों में लंबे समय की योजना के साथ कटाव की निगरानी, जोखिम वाले परिवारों की पहचान, समय पर सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरण और स्थायी पुनर्वास की व्यवस्था की जरूरत होती है। जहां तकनीकी रूप से संभव हो, वहां वैज्ञानिक तरीके से कटावरोधी कार्य भी किए जाने की आवश्यकता होती है।

भोजपुर के गंगा कटाव पीड़ित परिवारों के लिए तत्काल भोजपुर जवइनिया गंगा कटाव: 150 से अधिक घर नदी में समाए, पुनर्वास की मांग
राहत के साथ स्थायी समाधान की जरूरत बनी हुई है, ताकि वे सुरक्षित स्थान पर दोबारा जीवन शुरू कर सकें और आने वाली बरसात में अपने घर और जमीन को लेकर अनिश्चितता में न रहें।

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