21 मार्च को गणगौर पूजा, जानें व्रत रखने की विधि और धार्मिक महत्व

गणगौर पूजा 21 मार्च 2026 को राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में मनाई जाएगी। दांपत्य सुख, वर प्राप्ति और सांस्कृतिक उत्सव का पर्व।

गणगौर पूजा 2026 21 मार्च को मनाई जाएगी और यह शिव-पार्वती की आराधना का पर्व है। यह व्रत दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि, पति की दीर्घायु और अविवाहित कन्याओं के लिए मनचाहा वर प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में इसे धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें पारंपरिक गीत, शोभायात्रा और पूजा विधि शामिल हैं।

Gangaur Puja 2026: इस साल गणगौर पूजा 21 मार्च को मनाई जाएगी, जो विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। यह पूजा मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में होती है, जहां शिव और पार्वती की प्रतिमा का पूजन किया जाता है। महिलाएं पूरे दिन उपवास और भक्ति में रहती हैं, जिससे दांपत्य सुख, पति की लंबी आयु और अविवाहित कन्याओं के लिए वर प्राप्ति सुनिश्चित होती है। पारंपरिक गीत, झांकियां और सांस्कृतिक उत्सव इसे और भी आकर्षक बनाते हैं।

गणगौर पूजा का महत्व

गणगौर पूजा मुख्य रूप से दांपत्य जीवन में प्रेम और सुख बढ़ाने के लिए की जाती है। इसके अलावा, मान्यता है कि इस व्रत से पति की आयु और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। अविवाहित कन्याओं के लिए यह व्रत वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है। महिलाएं माता पार्वती की भक्ति में मग्न होकर पूरे दिन उपवास और आराधना करती हैं।

कहां और कैसे मनाते हैं गणगौर

गणगौर का उत्सव मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। राजस्थान में इसे 18 दिवसीय उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो होलिका दहन के अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होकर चैत्र शुक्ल तृतीया को समाप्त होता है।

इस पर्व में महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और शोभायात्रा निकालती हैं। विभिन्न गांवों और शहरों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार गौरा माता की प्रतिमा सजाई जाती है और सामूहिक रूप से पूजा का आयोजन होता है।

21 मार्च को गणगौर पूजा, जानें व्रत रखने की विधि और धार्मिक महत्व

पूजा विधि और तैयारी

गणगौर पूजा में शिव को ईसर जी और पार्वती को गौरा माता के रूप में पूजा जाता है। पूजा से पहले सुबह जल्दी स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनना अनिवार्य है। घर में मिट्टी या लकड़ी की प्रतिमा स्थापित करके माता गौरा को सिंदूर, कुमकुम, हल्दी, मेहंदी, फूल और श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है।

इसके अलावा, गुड़, गेहूं और मीठे पकवान का भोग लगाया जाता है। महिलाएं कथा सुनकर आरती करती हैं और श्रद्धा पूर्वक व्रत का पालन करती हैं। यह विधि पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार पूरी होती है।

पौराणिक कथा

गणगौर पूजा का इतिहास प्राचीन और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी पर भ्रमण करने आए। उस समय गांव की स्त्रियों ने माता पार्वती की भक्ति और श्रद्धा से पूजा की। इस पूजा के परिणामस्वरूप महिलाओं को सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मिला।

तब से यह पर्व विशेष रूप से स्त्रियों के लिए महत्वपूर्ण माना गया और आज भी महिलाएं अपने परिवार और जीवन साथी की भलाई के लिए गणगौर व्रत करती हैं।

उत्सव में सांस्कृतिक रंग

गणगौर पूजा में न केवल धार्मिक आस्था बल्कि सांस्कृतिक रंग भी देखने को मिलता है। महिलाएं रंग-बिरंगे परिधान पहनती हैं और गीतों और नृत्यों के माध्यम से उत्सव का आनंद बढ़ाती हैं। कई स्थानों पर नगर की शोभायात्राओं और भव्य झांकियों का आयोजन भी किया जाता है।

राजस्थान के जयपुर, उदयपुर और अजमेर में गणगौर उत्सव विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं। लोग इसे पारिवारिक और सामाजिक मेलजोल का अवसर भी मानते हैं।

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