महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से जुड़े प्रावधानों के साथ पारित कराने के लिए केंद्र सरकार संसद का विस्तारित सत्र बुलाने पर विचार कर सकती है। इस संभावना को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं।
नई दिल्ली: महिला आरक्षण कानून में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर संसद में एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की चर्चा है। अप्रैल में बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के कारण संबंधित विधेयक पारित नहीं हो पाया था। अब संसद के मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान नहीं होने की बात सामने आने के बाद विशेष या विस्तारित बैठक बुलाए जाने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए संसद की बैठक बुलाने पर विचार कर सकती है। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से आधिकारिक घोषणा होने तक किसी निश्चित तारीख या कार्यक्रम की पुष्टि नहीं की जा सकती।
क्या दो दिन के नोटिस पर बुलाई जा सकती है बैठक?
संसद की संभावित विस्तारित बैठक को लेकर एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने चर्चा को और बढ़ा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि संसद का सत्र औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है, तो निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत कम समय के नोटिस पर बैठक बुलाने की संभावना हो सकती है। बताया गया है कि ऐसी स्थिति में दो दिन के नोटिस पर विस्तारित बैठक आयोजित की जा सकती है। इसके विपरीत, यदि सत्रावसान की औपचारिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो, तो नए सत्र के आयोजन के लिए अलग प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
हालांकि, नोटिस की अवधि और बैठक बुलाने की प्रक्रिया को लेकर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित संसदीय नियमों और आधिकारिक निर्देशों की पुष्टि आवश्यक है। केवल सत्रावसान नहीं होने के आधार पर यह तय नहीं माना जा सकता कि सरकार विशेष बैठक अवश्य बुलाएगी।
अप्रैल में क्यों पारित नहीं हो पाया था विधेयक?
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महिला आरक्षण कानून में संशोधन से संबंधित प्रस्ताव अप्रैल में बजट सत्र के दौरान लोकसभा में चर्चा के केंद्र में आया था। उस समय विधेयक को पारित कराने के लिए विस्तारित बैठक आयोजित किए जाने की जानकारी सामने आई थी, लेकिन सदन में आवश्यक समर्थन नहीं मिलने के कारण इसे मंजूरी नहीं मिल सकी।
इस घटनाक्रम के बाद प्रस्तावित संशोधनों के भविष्य को लेकर सवाल उठे थे। अब एक बार फिर विशेष बैठक की संभावना पर चर्चा होने से यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या सरकार इस विधेयक को पारित कराने के लिए नई रणनीति अपनाएगी।
महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों का महत्व केवल संसदीय संख्या तक सीमित नहीं है। इनका संबंध लोकसभा की संरचना, निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण और महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण विषयों से भी है।
अनुच्छेद 85 में क्या है प्रावधान?
संसद के सत्र बुलाने और सत्रावसान को लेकर संविधान का अनुच्छेद 85 महत्वपूर्ण है। इसके तहत राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन को समय-समय पर बैठक के लिए बुलाते हैं। इसी अनुच्छेद में संसद के सत्रावसान और लोकसभा को भंग करने से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से जब मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान नहीं होने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 85 के प्रावधानों का पालन किए जाने की बात कही थी।
यहां यह समझना जरूरी है कि सदन की बैठक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना और सत्र का औपचारिक सत्रावसान करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। अनिश्चितकाल के लिए स्थगन के बाद भी राष्ट्रपति द्वारा सत्रावसान की औपचारिक घोषणा होने तक सत्र का समापन नहीं माना जाता।
पहले भी लंबे समय तक नहीं हुआ सत्रावसान
संसदीय इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जब सदनों की बैठक स्थगित होने और औपचारिक सत्रावसान के बीच लंबा अंतर रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, वर्ष 1987 में यह अवधि 76 दिन और 1989 में 54 दिन रही थी। वर्ष 2006 तथा 2013 में भी लगभग 49-49 दिनों तक औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ था। वर्ष 1963 में यह अवधि 41 दिन बताई गई है।
ये उदाहरण बताते हैं कि संसद की बैठक स्थगित होने के बाद औपचारिक सत्रावसान में देरी पहले भी हुई है। इसलिए मौजूदा स्थिति को अपने आप में किसी विशेष विधेयक को पारित कराने की तैयारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।








