आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया जनगणना और परिसीमन के कारण 2029 तक पूरी होना मुश्किल दिख रहा है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि प्रक्रिया में समय लगेगा और बदलाव 2034 तक टल सकता है।
अमरावती/हैदराबाद: भारत के दो प्रमुख दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया अब लंबी देरी का सामना कर सकती है। ताजा घटनाक्रमों और कानूनी संकेतों के अनुसार, दोनों राज्यों में सीटों के परिसीमन (Delimitation) और नई सीटों के गठन की प्रक्रिया 2029 के चुनावों से पहले पूरी होना मुश्किल दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय जनगणना प्रक्रिया पूरी होने और उसके बाद परिसीमन आयोग के गठन में लगने वाले समय के कारण यह बदलाव संभवतः 2034 के आम और विधानसभा चुनावों तक टल सकता है।
यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण बन गया है, क्योंकि दोनों तेलुगु राज्यों में प्रमुख राजनीतिक दल लंबे समय से विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
क्या कहता है आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014?
2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन के दौरान संसद ने “आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम” पारित किया था। इसी कानून के तहत दोनों राज्यों में भविष्य में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान रखा गया था।
कानून के अनुसार:
- आंध्र प्रदेश में 50 अतिरिक्त विधानसभा सीटें बढ़ाई जा सकती हैं
- तेलंगाना में 34 नई विधानसभा सीटें जोड़ी जा सकती हैं
वर्तमान में:
- आंध्र प्रदेश विधानसभा में 175 सीटें हैं
- तेलंगाना विधानसभा में 119 सीटें हैं
यदि प्रस्ताव लागू होता है, तो दोनों राज्यों की राजनीतिक संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
जनगणना के कारण अटकी प्रक्रिया
सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया सीधे तौर पर राष्ट्रीय जनगणना और परिसीमन से जुड़ी हुई है।
भारत में किसी भी राज्य में निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमा तय करने या सीटें बढ़ाने के लिए अद्यतन जनसंख्या आंकड़ों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि परिसीमन प्रक्रिया जनगणना पूरी होने के बाद ही शुरू की जा सकती है।
सूत्रों के अनुसार:
- जनगणना प्रक्रिया में लंबा समय लग सकता है
- डेटा संकलन और सत्यापन के बाद परिसीमन आयोग गठित होगा
- नई सीटों की सीमाएं तय करने में अतिरिक्त समय लगेगा
- इसी वजह से 2029 के चुनावों तक सीट वृद्धि लागू होना मुश्किल माना जा रहा है।
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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का रुख
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधानसभा सीटों के परिसीमन की प्रक्रिया जनगणना के बाद ही आगे बढ़ेगी।
कानूनी और प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया में और देरी होती है, तो नई सीटों का प्रभाव 2034 के चुनावों तक टल सकता है।
इस बयान ने दोनों राज्यों में राजनीतिक हलचल तेज कर दी है, क्योंकि कई राजनीतिक दल और नेता उम्मीद कर रहे थे कि 2029 के चुनावों से पहले नई सीटें लागू हो जाएंगी।
तेलुगु राज्यों में क्यों महत्वपूर्ण है सीट बढ़ोतरी?
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों राज्यों में विधानसभा सीटें बढ़ाने का मुद्दा केवल संख्या का नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का भी है।
पिछले एक दशक में:
- शहरी आबादी तेजी से बढ़ी है
- नए जिले और प्रशासनिक इकाइयां बनी हैं
- कई निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या काफी बढ़ चुकी है
- राजनीतिक दलों का तर्क है कि वर्तमान सीट संरचना बदलती जनसंख्या के अनुरूप नहीं है।
विशेष रूप से हैदराबाद, विजाग, विजयवाड़ा और अन्य तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का दबाव बढ़ रहा है।
राजनीतिक दलों के लिए क्यों अहम है यह मुद्दा?
दोनों राज्यों के प्रमुख राजनीतिक दल लंबे समय से सीट बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं क्योंकि इससे राजनीतिक अवसर भी बढ़ेंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- अधिक सीटों का मतलब अधिक टिकट वितरण
- नए नेताओं और क्षेत्रीय समूहों को प्रतिनिधित्व
- गठबंधन राजनीति में नए समीकरण
जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को साधने का अवसर
तेलुगु राज्यों में बड़ी संख्या में राजनीतिक आकांक्षी हैं, जो भविष्य में चुनाव लड़ना चाहते हैं। मौजूदा सीमित सीटों के कारण कई नेताओं को अवसर नहीं मिल पाता।
इसी वजह से सत्ताधारी और विपक्षी दल दोनों सीट वृद्धि के पक्ष में दिखाई देते हैं।
परिसीमन प्रक्रिया क्या होती है?
परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों की संख्या तय की जाती है।
भारत में परिसीमन आयोग:
- जनसंख्या आंकड़ों का अध्ययन करता है
- निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करता है
- सीटों के आरक्षण और प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाता है
यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को संतुलित रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हालांकि भारत में राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा और विधानसभा सीटों के व्यापक परिसीमन पर लंबे समय से राजनीतिक बहस जारी है।
2029 या 2034? राजनीतिक और प्रशासनिक गणित
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जनगणना जल्द पूरी हो जाती है और केंद्र सरकार प्राथमिकता के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया शुरू करती है, तो सीमित संभावना है कि 2029 से पहले कुछ बदलाव दिखाई दें।
लेकिन अधिकांश विशेषज्ञों का अनुमान है कि:
- जनगणना डेटा तैयार होने में समय लगेगा
- कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं लंबी होंगी
- परिसीमन आयोग की सिफारिशों पर राजनीतिक सहमति जरूरी होगी
ऐसे में 2034 का चुनाव अधिक संभावित समय माना जा रहा है।
राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है असर
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सीट वृद्धि का मुद्दा केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है।
यदि दोनों राज्यों में विधानसभा और लोकसभा सीटें बढ़ती हैं, तो इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- संसद में दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है
- राष्ट्रीय दलों की रणनीति बदल सकती है
- गठबंधन राजनीति में तेलुगु राज्यों का महत्व और बढ़ सकता है
भारत में परिसीमन और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व हमेशा संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा है, क्योंकि अलग-अलग राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर में बड़ा अंतर है।
जनता और नेताओं की बढ़ती उम्मीदें
दोनों राज्यों में कई नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता उम्मीद कर रहे थे कि 2029 तक नई सीटों का गठन हो जाएगा। इससे कई नए राजनीतिक चेहरों को मौका मिल सकता था।
अब संभावित देरी की खबरों ने राजनीतिक हलकों में निराशा पैदा कर दी है।
हालांकि राज्य सरकारें और राजनीतिक दल अब भी केंद्र से प्रक्रिया को तेज करने की मांग कर रहे हैं। आने वाले महीनों में यह मुद्दा संसद, अदालत और क्षेत्रीय राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।











