मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी की याचिका खारिज करते हुए गिरफ्तारी वारंट पर लगी अंतरिम रोक हटा दी है। यह मामला बीजेपी नेता आकाश विजयवर्गीय की मानहानि शिकायत से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई 2021 से चल रही है।
भोपाल: तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने भोपाल की विशेष अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट पर नवंबर 2025 से लगी अंतरिम रोक को समाप्त कर दिया है। यह फैसला बीजेपी नेता आकाश विजयवर्गीय द्वारा दायर मानहानि मामले में सुनाया गया, जिसमें अभिषेक बनर्जी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है।
हाई कोर्ट ने खत्म की गिरफ्तारी वारंट पर रोक
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एकल पीठ ने टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी की याचिका को खारिज करते हुए उनके खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट पर लगी अंतरिम रोक को हटा दिया है। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की बेंच ने स्पष्ट किया कि अब वारंट के क्रियान्वयन पर किसी प्रकार की न्यायिक रोक प्रभावी नहीं रहेगी। अदालत के इस फैसले के बाद मामले में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।
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यह अंतरिम राहत पिछले कई महीनों से लागू थी, जिसके चलते विशेष अदालत द्वारा जारी वारंट पर अमल नहीं हो पा रहा था। अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद संबंधित अदालत और जांच एजेंसियां नियमानुसार आगे की प्रक्रिया पूरी कर सकती हैं।
मानहानि मामले से जुड़ा है पूरा विवाद
यह मामला वर्ष 2021 में दर्ज की गई एक मानहानि शिकायत से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता आकाश विजयवर्गीय हैं, जो वरिष्ठ बीजेपी नेता और वर्तमान मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र हैं। आरोप है कि नवंबर 2020 में कोलकाता में आयोजित एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान अभिषेक बनर्जी ने आकाश विजयवर्गीय के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था।
इसी टिप्पणी को आधार बनाते हुए भोपाल की एमपी-एमएलए कोर्ट में मानहानि का मामला दर्ज कराया गया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था, जिसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका दाखिल होने के बाद वारंट पर अंतरिम रोक लगा दी गई थी।
सुनवाई में अनुपस्थिति पर अदालत की नाराजगी
मामले की ताजा सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता पक्ष की गैर-हाजिरी पर भी नाराजगी जताई। रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के समय अभिषेक बनर्जी की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ। अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर फैसला सुनाया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान पक्षकार की ओर से प्रभावी पैरवी न होना कई बार अदालत के रुख को प्रभावित कर सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय अदालत उपलब्ध तथ्यों और कानूनी आधारों के अनुसार ही लेती है।
आगे क्या हो सकता है
हाई कोर्ट द्वारा राहत वापस लिए जाने के बाद अब अभिषेक बनर्जी के सामने कानूनी विकल्प सीमित हो गए हैं। वह इस आदेश को किसी उच्च न्यायिक मंच पर चुनौती दे सकते हैं या फिर संबंधित अदालत की प्रक्रिया का सामना कर सकते हैं। फिलहाल अदालत के आदेश के बाद गिरफ्तारी वारंट पर लगी रोक समाप्त हो चुकी है और मामले की अगली कानूनी कार्रवाई पर राजनीतिक और कानूनी हलकों की नजर बनी हुई है।
यह मामला राजनीतिक बयानबाजी, मानहानि कानून और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जैसे मुद्दों से भी जुड़ा माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मामले में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर सभी की नजर रहेगी।











