केंद्र सरकार ने प्रशांत महासागर में विकसित हो रहे El Niño के संभावित प्रभावों को देखते हुए मानसून की तैयारी तेज कर दी है। कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने मंगलवार को बताया कि अल-नीनो के कारण मानसूनी बारिश में कमी आने की आशंका को देखते हुए सरकार ने देश के 197 संवेदनशील जिलों की पहचान कर ली है।
नई दिल्ली: भारत सरकार ने संभावित अल-नीनो प्रभाव को देखते हुए मानसून और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले जोखिमों से निपटने की तैयारी तेज कर दी है। केंद्र सरकार ने ऐसे 197 जिलों की पहचान की है, जहां अल-नीनो के कारण सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका हो सकती है। इसके मद्देनजर राज्यवार आपात योजनाएं तैयार की जा रही हैं ताकि किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सके।
कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जानकारी दी कि सरकार लगातार मौसम की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और आवश्यकता पड़ने पर प्रभावित जिलों की संख्या में बदलाव भी किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर में बढ़ते तापमान के कारण वैश्विक मौसम चक्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिसका असर भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है।
क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब होती है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों में मौसम के पैटर्न पर पड़ता है। भारत के लिए अल-नीनो विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिण-पश्चिम मानसून को प्रभावित कर सकता है।
कई बार इसके कारण वर्षा में कमी, लंबे शुष्क दौर और कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल असर देखने को मिलता है। हालांकि हर अल-नीनो वर्ष में समान प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन मजबूत अल-नीनो की स्थिति में मौसम संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
197 जिलों के लिए तैयार हो रही आपात योजना
सरकार ने संभावित जोखिम वाले 197 जिलों की पहचान कर राज्य सरकारों के साथ समन्वय बढ़ाना शुरू कर दिया है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में वर्षा सामान्य से कम होती है, तो किसानों को वैकल्पिक फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए विभिन्न प्रकार के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है और किसानों को बदलती मौसम परिस्थितियों के अनुसार खेती की रणनीति अपनाने की जानकारी दी जाएगी। उद्देश्य यह है कि बारिश में कमी की स्थिति में भी कृषि उत्पादन और किसानों की आय पर न्यूनतम असर पड़े।
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मौसम मॉडल दे रहे हैं गंभीर संकेत
वैश्विक मौसम पूर्वानुमान संस्थानों के कई मॉडल आने वाले वर्षों में प्रशांत महासागर के तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना जता रहे हैं। अनुमानों के अनुसार, मध्य प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से लगभग 3 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है, जबकि कुछ मॉडल 4 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि का संकेत दे रहे हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह हाल के दशकों के सबसे प्रभावशाली अल-नीनो घटनाक्रमों में से एक हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री तापमान में यह बदलाव केवल महासागरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक स्तर पर वर्षा, तापमान और मौसम की चरम घटनाओं को प्रभावित कर सकता है।
रिकॉर्ड गर्मी और मौसमीय अस्थिरता की आशंका
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, मजबूत अल-नीनो की स्थिति दुनिया के कई हिस्सों में अत्यधिक गर्मी, सूखा, अनियमित वर्षा और चरम मौसम घटनाओं की संभावना बढ़ा सकती है। भारत में इसका असर मानसून की समय-सारिणी, वर्षा के वितरण और कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में अनियमित और तीव्र वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
इसी कारण सरकार और कृषि विशेषज्ञ किसानों को मौसम आधारित कृषि प्रबंधन अपनाने और जोखिम कम करने वाली फसलों पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय ने यह भी संकेत दिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक मजबूती के लिए नई योजनाओं पर काम किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन और मौसम संबंधी चुनौतियों के बीच ग्रामीण रोजगार और कृषि गतिविधियों को स्थिर बनाए रखना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम पूर्वानुमान तकनीकों, डिजिटल कृषि सेवाओं, जल संरक्षण और बेहतर बीज प्रबंधन के माध्यम से संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।










