एसीबी कोर्ट ने पूर्व मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी को वैध करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि परिजनों को व्हाट्सएप कॉल और अन्य माध्यमों से समय पर सूचना दी गई थी, इसलिए लिखित सूचना न होने के आधार पर गिरफ्तारी अवैध नहीं मानी जा सकती।
जयपुर: राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले से जुड़े मामले में गिरफ्तार पूर्व मंत्री महेश जोशी को लेकर एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी को वैध ठहराते हुए उनके द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए रिहाई की मांग की गई थी।
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब मामला पहले से ही राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा में बना हुआ है।
गिरफ्तारी को अवैध बताने वाली याचिका खारिज
पूर्व मंत्री महेश जोशी की ओर से अदालत में दायर प्रार्थना पत्र में यह दलील दी गई थी कि उनकी गिरफ्तारी के दौरान कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। याचिका में कहा गया था कि परिजनों को गिरफ्तारी के आधार की लिखित सूचना नहीं दी गई, जिससे गिरफ्तारी को अवैध माना जाना चाहिए।
हालांकि, एसीबी कोर्ट संख्या-2 ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया और स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी में सभी संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का पालन किया गया था।
कोर्ट का अवलोकन: सूचना तकनीकी माध्यमों से दी गई
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी के परिजनों को गिरफ्तारी की जानकारी समय पर विभिन्न माध्यमों से दी गई थी। कोर्ट के अनुसार, सूचना केवल लिखित रूप में ही नहीं बल्कि तकनीकी और मौखिक माध्यमों से भी उपलब्ध कराई गई थी।
जज ने यह भी माना कि गिरफ्तारी के दौरान प्रक्रिया में किसी प्रकार की गंभीर अनियमितता नहीं पाई गई, जो इसे अवैध घोषित करने का आधार बन सके।
एसीबी का पक्ष: व्हाट्सएप कॉल और फोन से दी गई जानकारी
विशिष्ट लोक अभियोजक मंजूला जैन ने अदालत में एसीबी की ओर से पक्ष रखते हुए बताया कि गिरफ्तारी की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी थी। उनके अनुसार, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भूपेन्द्र सिंह की टीम पूर्व मंत्री के आवास पर गई थी, जहां उनके परिवार के सदस्य मौजूद थे।
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एसीबी का कहना था कि महेश जोशी को मुख्यालय ले जाने की जानकारी उनके परिजनों को मौके पर ही दी गई थी। इसके बाद फोन कॉल और व्हाट्सएप कॉल के माध्यम से भी सूचना साझा की गई।
एसीबी ने अदालत में व्हाट्सएप कॉल के स्क्रीनशॉट भी प्रस्तुत किए, जिन्हें सूचना के प्रमाण के रूप में पेश किया गया।
गिरफ्तारी के समय परिवार को जानकारी देने का दावा
एसीबी के अनुसार, जब पूर्व मंत्री को उनके आवास से हिरासत में लिया गया, तब उनके पुत्र रोहित जोशी, पुत्रवधू और अन्य परिजन मौजूद थे। टीम ने उन्हें आधिकारिक रूप से परिचय देकर कार्रवाई की जानकारी दी।
इसके बाद आरोपी को एसीबी मुख्यालय ले जाया गया, जहां औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज की गई।
सुप्रीम कोर्ट दिशा-निर्देशों के पालन का दावा
एसीबी कोर्ट में यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार गिरफ्तारी के दौरान परिजनों को सूचित करना आवश्यक है, और इस मामले में इसका पालन किया गया।
अदालत ने भी माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि परिजनों को गिरफ्तारी की जानकारी समय रहते मिल गई थी, इसलिए इसे अवैध नहीं कहा जा सकता।
बचाव पक्ष का तर्क: लिखित सूचना नहीं दी गई
महेश जोशी की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि गिरफ्तारी के समय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। उनके वकील ने कहा कि गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना परिजनों या अधिवक्ता को नहीं दी गई, जो नियमों के अनुसार अनिवार्य है।
बचाव पक्ष ने इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए गिरफ्तारी को अवैध करार देने और तत्काल रिहाई की मांग की थी।
कोर्ट की टिप्पणी: बचाव का अधिकार सुरक्षित रहा
एसीबी कोर्ट के जज राजेश कुमार दड़िया ने अपने आदेश में कहा कि आपराधिक प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य आरोपी के “बचाव के अधिकार” को सुरक्षित रखना होता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब रिमांड के लिए आरोपी को कोर्ट में पेश किया गया, तब उनके वकील पहले से मौजूद थे और उन्होंने प्रभावी रूप से बहस भी की। इससे यह सिद्ध होता है कि आरोपी को कानूनी प्रतिनिधित्व और बचाव का पूरा अवसर मिला।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई
इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि महेश जोशी के पुत्र रोहित जोशी द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) राजस्थान हाईकोर्ट में दायर की गई है।
इस याचिका पर बुधवार को सुनवाई प्रस्तावित है, जिसमें गिरफ्तारी की वैधता और प्रक्रिया संबंधी पहलुओं पर आगे कानूनी बहस होने की संभावना है।
जल जीवन मिशन घोटाला मामला और जांच का दायरा
जल जीवन मिशन से जुड़े कथित घोटाले की जांच लंबे समय से एसीबी और अन्य एजेंसियों द्वारा की जा रही है। यह मामला सरकारी योजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा हुआ है।
इस केस में कई स्तरों पर जांच जारी है और कई अन्य लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है।
राजनीतिक और कानूनी असर
पूर्व मंत्री की गिरफ्तारी और उसके बाद कोर्ट का यह फैसला राजस्थान की राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह मामला आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और कानूनी प्रक्रियाओं दोनों पर असर डाल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट में चल रही याचिका इस केस की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।










