दिल्ली के भारत मंडपम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1993 में ब्रह्मलीन हुए स्वामी चिन्मयानंद के डिजिटल अवतार से बातचीत की। यह होलोबॉट तकनीक की मदद से संभव हुआ। जानिए होलोबॉट क्या है और इसमें होलोग्राम व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कैसे काम करते हैं।
Tech: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चिन्मय अमृत महोत्सव में एक ऐसे संत से बातचीत की, जिनका निधन 1993 में हो चुका था। मंच पर स्वामी चिन्मयानंद का डिजिटल रूप दिखाई दे रहा था। पीएम मोदी उनसे अपनी पुरानी मुलाकात का जिक्र कर रहे थे। कार्यक्रम में मौजूद लोगों के लिए भी यह नजारा खास था। दरअसल, स्वामी चिन्मयानंद को होलोबॉट तकनीक की मदद से डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया गया था।
1993 की मुलाकात को पीएम मोदी ने किया याद
दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित चिन्मय अमृत महोत्सव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वामी चिन्मयानंद के डिजिटल रूप से बातचीत की।
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इस दौरान उन्होंने 1993 में गुजरात के वडोदरा में हुई मुलाकात का जिक्र किया। उस समय मोदी स्वामी चिन्मयानंद को अमेरिका के शिकागो में होने वाले विश्व धर्म संसद के शताब्दी समारोह में आमंत्रित करने पहुंचे थे।
स्वामी चिन्मयानंद ने निमंत्रण स्वीकार किया था, लेकिन तीन अगस्त 1993 को अमेरिका के सैन डिएगो में उनका निधन हो गया।
करीब 33 साल बाद उनके डिजिटल रूप को मंच पर देखकर पुरानी यादें फिर ताजा हो गईं। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी सामने आया।
होलोबॉट तकनीक क्या है और यह कैसे काम करती है?
होलोबॉट की मदद से किसी व्यक्ति की तस्वीर को मंच पर ऐसे पेश किया जाता है कि सामने बैठे लोगों को वह असल में वहां मौजूद दिखाई देता है। इस तकनीक में एआई भी जुड़ा हो, तो दर्शक उस डिजिटल चेहरे से बातचीत कर सकते हैं। लोग सवाल पूछते हैं और उन्हें जवाब भी सुनने को मिलते हैं।
इसमें तस्वीर दिखाने और बातचीत कराने का काम दो अलग तकनीकें करती हैं। व्यक्ति की छवि सामने लाने के लिए होलोग्राम का इस्तेमाल होता है। सवालों के जवाब देने का काम एआई संभालता है। दोनों तकनीकों को मिलाकर ऐसा आभास कराया जा सकता है, जैसे सामने खड़ा व्यक्ति खुद बोल रहा हो।
मंच पर यह तस्वीर दिखाने के लिए प्रोजेक्टर, रोशनी और विशेष स्क्रीन लगाई जाती है। कई जगह पारदर्शी पर्दे का इस्तेमाल होता है, जिस पर व्यक्ति की छवि दिखाई जाती है। दर्शकों को यह पर्दा साफ नजर नहीं आता। ऐसे में उन्हें लगता है कि कोई व्यक्ति उनके सामने खड़ा होकर बोल रहा है, जबकि वहां उसकी डिजिटल तस्वीर होती है।
पुरानी तस्वीरों से कैसे तैयार होता है किसी इंसान का डिजिटल चेहरा?
किसी इंसान का डिजिटल रूप तैयार करना आसान काम नहीं है। इसके लिए सबसे पहले उसकी पुरानी तस्वीरें और वीडियो जुटाए जाते हैं। इनसे पता चलता है कि उस व्यक्ति का चेहरा कैसा था, वह किस तरह मुस्कुराता था और बातचीत के दौरान उसके चेहरे पर कैसे भाव आते थे।
इन तस्वीरों और वीडियो की मदद से कंप्यूटर पर उसका चेहरा बनाया जाता है। फिर उसमें ऐसी तकनीक जोड़ी जाती है, जिससे बोलते समय होंठ हिलें और चेहरे के भाव भी बदलें। कोशिश यही रहती है कि डिजिटल रूप असली व्यक्ति जैसा दिखाई दे।
आवाज के लिए पुरानी ऑडियो रिकॉर्डिंग का सहारा लिया जा सकता है। एआई उन रिकॉर्डिंग से बोलने का अंदाज और आवाज का उतार-चढ़ाव सीखकर मिलती-जुलती आवाज तैयार कर सकता है।
हालांकि, स्वामी चिन्मयानंद का डिजिटल रूप बनाने के लिए किन पुराने वीडियो और आवाज की रिकॉर्डिंग का सहारा लिया गया था, इसकी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है।
सवाल पूछने पर होलोबॉट कैसे देता है जवाब?
होलोबॉट में बातचीत की सुविधा जोड़ने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है।
जब कोई व्यक्ति सवाल पूछता है तो कंप्यूटर सबसे पहले उसकी आवाज को पहचानता है। इसके बाद सवाल को लिखित शब्दों में बदला जा सकता है।
एआई सवाल समझकर उपलब्ध जानकारी से जवाब तैयार करता है। इसके लिए संबंधित व्यक्ति की किताबों, भाषणों और पुराने दस्तावेजों की मदद ली जा सकती है।
तैयार जवाब को डिजिटल आवाज में सुनाया जाता है। इसी दौरान स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चेहरे के होंठ भी आवाज के अनुसार हिल सकते हैं।
हालांकि, हर कार्यक्रम में बातचीत इसी तरीके से हो, यह जरूरी नहीं है। कुछ जगह पहले से तैयार सवाल और जवाब भी इस्तेमाल किए जाते हैं।
क्या डिजिटल रूप असली व्यक्ति की तरह सोच सकता है?
होलोबॉट किसी इंसान की तरह दिखाई दे सकता है, लेकिन वह असली व्यक्ति नहीं होता। उसके पास उस व्यक्ति की अपनी यादें, अनुभव या चेतना नहीं होती।
कंप्यूटर केवल उपलब्ध जानकारी के आधार पर जवाब तैयार करता है। कई बार यह जवाब गलत भी हो सकता है।
इसलिए किसी संत, नेता या ऐतिहासिक व्यक्ति के डिजिटल रूप से कही गई बात को उसका वास्तविक बयान नहीं माना जा सकता।
अगर कोई जवाब पुरानी किताब या भाषण के आधार पर तैयार हुआ है तो उसकी पुष्टि मूल दस्तावेज से करना जरूरी है।
आगे कहां काम आ सकती है होलोबॉट तकनीक?
होलोबॉट का इस्तेमाल आने वाले समय में पढ़ाई और इतिहास से जुड़ी प्रदर्शनियों में बढ़ सकता है। किसी संग्रहालय में लोग पुराने दौर की किसी मशहूर हस्ती का डिजिटल रूप देख सकेंगे। वहां उसके जीवन और कामकाज से जुड़ी जानकारी भी हासिल कर सकेंगे।
स्कूलों में बच्चों को इतिहास पढ़ाने का तरीका भी इससे बदल सकता है। किताबों में किसी महान व्यक्ति के बारे में पढ़ने के साथ बच्चे उसका डिजिटल रूप देख पाएंगे। इससे उन्हें उस दौर की घटनाओं को समझने में मदद मिल सकती है।
बड़े आयोजनों में भी ऐसी तकनीक काम आ सकती है। हालांकि, किसी दिवंगत व्यक्ति का चेहरा या आवाज दोबारा तैयार करने से पहले जरूरी अनुमति और जानकारी की सच्चाई का ध्यान रखना होगा। एआई से तैयार आवाज में कही गई बात को उस व्यक्ति का असली बयान नहीं माना जा सकता।
भारत मंडपम में हुए चिन्मय अमृत महोत्सव में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वामी चिन्मयानंद के डिजिटल रूप से बातचीत करते हुए 1993 की मुलाकात को याद किया। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने उस संत का आभासी रूप देखा, जिनका निधन तीन दशक से भी पहले हो चुका था।
हालांकि, किसी व्यक्ति की आवाज और चेहरा डिजिटल रूप में तैयार करते समय अनुमति और सही जानकारी का ध्यान रखना भी जरूरी है।
चिन्मय अमृत महोत्सव में पीएम मोदी और स्वामी चिन्मयानंद के डिजिटल रूप के बीच हुई बातचीत ने दिखाया कि अब तकनीक की मदद से वर्षों पुरानी यादों को नए तरीके से लोगों के सामने लाया जा सकता है।










