HC ने बुंदेलखंड विवि को दिया निर्देश, तीन सप्ताह में करें शिक्षक पदोन्नति पर फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय को शिक्षक डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पदोन्नति पर तीन सप्ताह में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय को शिक्षक डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पदोन्नति पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि सेवानिवृत्ति से पहले मामले का निस्तारण जरूरी है ताकि याची को सेवा संबंधी नुकसान न हो।

 प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी के शिक्षक डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पदोन्नति से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने विश्वविद्यालय और राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर सभी आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर निर्णय लेने को कहा है, क्योंकि याची इसी महीने के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

सेवानिवृत्ति से पहले फैसला लेने पर कोर्ट का जोर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पदोन्नति से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि याची की सेवानिवृत्ति की तारीख काफी नजदीक है, इसलिए निर्णय में और देरी नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकलपीठ ने विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे तीन सप्ताह के भीतर मामले का निस्तारण करें।

अदालत ने यह भी कहा कि इस संबंध में पारित आदेश की प्रति अगली सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए। मामले की अगली सुनवाई 24 जून 2026 को निर्धारित की गई है।

कुलाधिपति के आदेश के बावजूद लंबित रहा मामला

याची की ओर से अदालत को बताया गया कि कुलाधिपति ने 30 मार्च 2026 को उनके पक्ष में फैसला दिया था। साथ ही विश्वविद्यालय को उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 के तहत आठ सप्ताह के भीतर सकारण आदेश पारित करने का निर्देश भी दिया गया था।

हालांकि निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बावजूद विश्वविद्यालय की ओर से कोई अंतिम आदेश जारी नहीं किया गया। याची का कहना है कि इस देरी के कारण उनकी पदोन्नति का मामला अब तक अधर में लटका हुआ है, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति 30 जून 2026 को प्रस्तावित है।

आर्थिक और सेवा संबंधी नुकसान की आशंका

याची के अधिवक्ताओं तंजीला परवीन और अंकुर विश्वकर्मा ने अदालत के समक्ष दलील दी कि यदि सेवानिवृत्ति से पहले पदोन्नति संबंधी फैसला नहीं हुआ तो उनके मुवक्किल को अपूरणीय आर्थिक और सेवा संबंधी नुकसान उठाना पड़ सकता है। पदोन्नति का प्रभाव न केवल वेतन और भत्तों पर पड़ता है, बल्कि सेवानिवृत्ति लाभों पर भी इसका असर होता है।

दूसरी ओर, विश्वविद्यालय और राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने बताया कि कुलाधिपति के आदेश के बाद छह सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद मामला कार्य परिषद के समक्ष रखा जाएगा, जिसके बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

कुलपति और रजिस्ट्रार को दिए गए विशेष निर्देश

विश्वविद्यालय की दलील सुनने के बाद अदालत ने कहा कि प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है, लेकिन याची की सेवानिवृत्ति को देखते हुए मामले में अनावश्यक विलंब स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कुलपति और रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वे कुलाधिपति के आदेशों के अनुरूप सभी जरूरी औपचारिकताएं तीन सप्ताह के भीतर पूरी करें और पदोन्नति मामले में अंतिम निर्णय लें।

हाई कोर्ट के इस आदेश से अब विश्वविद्यालय प्रशासन पर निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई पूरी करने का दबाव बढ़ गया है। मामले की अगली सुनवाई में अदालत विश्वविद्यालय द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगी।

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