एक सुंदर सुभाषिता है—‘वृक्ष कबहूं नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमार्थ के कारने, साधुन धरा शरीर।’ इसका भावार्थ है कि पेड़ कभी अपने फल स्वयं नहीं खाता और नदी अपना जल अपने पास नहीं रखती।
नई दिल्ली: विश्व हिंदू परिषद के पूर्व वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल की जन्मशती वर्ष 27 सितंबर 2026 से शुरू हो गया है। संगठन की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस अवसर पर उनके जीवन, सामाजिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यों और संगठनात्मक भूमिका को याद करने के लिए वर्षभर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। अशोक सिंघल का सार्वजनिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाद में विश्व हिंदू परिषद से लंबे जुड़ाव के साथ-साथ अयोध्या के राम जन्मभूमि आंदोलन से भी गहराई से जुड़ा रहा।
अशोक सिंघल का जन्म 27 सितंबर 1926 को आगरा में हुआ था। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से धातुकर्म अभियांत्रिकी की पढ़ाई की और 1950 में डिग्री हासिल की। आईआईटी (बीएचयू) की पूर्व छात्रों की सूची में भी उनका नाम धातुकर्म में बीटेक करने वाले उल्लेखनीय पूर्व छात्रों के रूप में दर्ज है। छात्र जीवन के दौरान ही उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव हुआ और आगे चलकर उन्होंने पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में काम किया।
संगठन से लेकर सामाजिक कार्यों तक
अशोक सिंघल ने कई दशकों तक संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालीं। 1980 के दशक की शुरुआत में उन्हें विश्व हिंदू परिषद में महत्वपूर्ण दायित्व दिया गया। इसके बाद संगठन के विस्तार और विभिन्न धार्मिक-सामाजिक अभियानों में उनकी भूमिका बढ़ती गई। 1984 में दिल्ली में धर्म संसद के आयोजन और उसके बाद राम जन्मभूमि से जुड़े अभियान को व्यापक स्तर पर संगठित करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। स्वतंत्र रिपोर्टों में उन्हें अयोध्या आंदोलन के प्रमुख आयोजकों में शामिल किया गया है।
उनके समर्थकों और संगठन से जुड़े लोगों के अनुसार, सिंघल सामाजिक सेवा, धार्मिक शिक्षा और वंचित समुदायों तक पहुंच जैसे विषयों पर भी काम करते थे। विश्व हिंदू परिषद के पुराने दस्तावेजों में सामाजिक समानता से जुड़े कार्यक्रमों, सामूहिक भोज, ग्रामीण क्षेत्रों में मंदिर निर्माण और पिछड़े वर्गों के लोगों को धार्मिक प्रशिक्षण देने जैसी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। इन पहलों को संगठन ने सामाजिक समरसता के अपने प्रयासों के रूप में प्रस्तुत किया है।
आपदा के समय राहत और सेवा गतिविधियों में भी उनके संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं की भूमिका का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से वर्ष 2001 के गुजरात भूकंप के बाद राहत कार्यों में स्वयंसेवी संगठनों की सक्रियता बढ़ी थी। सिंघल के जीवन से जुड़े संस्मरणों में गुजरात और देश के अन्य हिस्सों की यात्राओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं से लगातार संपर्क बनाए रखने का उल्लेख किया जाता है।
राम जन्मभूमि आंदोलन में प्रमुख भूमिका

अशोक सिंघल के सार्वजनिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय राम जन्मभूमि आंदोलन रहा। 1980 और 1990 के दशक में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर चले व्यापक अभियान में उन्होंने विश्व हिंदू परिषद की ओर से संगठन और जन mobilization में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना भारतीय राजनीति और समाज के इतिहास की एक निर्णायक घटना बनी, और उस दौर में सिंघल आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे।
इस आंदोलन की राजनीतिक और सामाजिक व्याख्या को लेकर अलग-अलग मत रहे हैं। समर्थक उन्हें राम मंदिर अभियान का महत्वपूर्ण रणनीतिकार और आयोजक मानते हैं, जबकि आलोचकों ने आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव और सांप्रदायिक तनाव पर सवाल उठाए हैं। इसलिए सिंघल की विरासत को समझते समय उनकी संगठनात्मक भूमिका के साथ उस दौर के व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ को भी देखना जरूरी है।
शिक्षा और संगीत से विशेष लगाव
सार्वजनिक और संगठनात्मक गतिविधियों के अलावा अशोक सिंघल की रुचि शिक्षा और भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी बताई जाती है। विभिन्न जीवनी स्रोतों के अनुसार वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रशिक्षित गायक थे और उन्होंने प्रसिद्ध संगीतज्ञ पंडित ओंकारनाथ ठाकुर से प्रशिक्षण लिया था। शिक्षा के क्षेत्र में भी वे विशेष रूप से भारतीय और वैदिक ज्ञान परंपरा से जुड़ी पहलों को महत्व देते थे।
विश्व हिंदू परिषद से जुड़े प्रकाशनों में उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा और सेवा से जुड़ी परियोजनाओं के समर्थन से भी जोड़ा गया है। संगठन की मौजूदा वेबसाइट पर भी सामाजिक सेवा और शिक्षा क्षेत्र में चल रही कई परियोजनाओं का उल्लेख किया गया है, हालांकि इन सभी पहलों को सीधे सिंघल की व्यक्तिगत पहल के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
जन्मशती वर्ष में विरासत पर चर्चा
अशोक सिंघल का निधन 17 नवंबर 2015 को हुआ था। करीब दो दशक से अधिक समय तक विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े रहने के कारण संगठन के इतिहास में उनका नाम महत्वपूर्ण माना जाता है। 27 सितंबर 2026 से शुरू हुआ जन्मशती वर्ष उनके समर्थकों के लिए उनके विचारों और कार्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर है।
वहीं व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह अवसर भारत के हालिया सामाजिक और राजनीतिक इतिहास के एक ऐसे दौर को समझने का भी है, जिसमें धार्मिक आंदोलन, संगठनात्मक mobilization और राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे।










