असम में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चाय बागान मजदूरों की नाराजगी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। राज्य के लगभग 8 लाख से अधिक मजदूर चाय बागानों में काम करते हैं और इनमें से बड़ी संख्या ऐसे क्षेत्रों में रहती है, जहां करीब 45 विधानसभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव माना जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मजदूरों की नाराजगी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है।
कम दिहाड़ी और अधूरी मांगों से बढ़ी नाराजगी
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डिब्रूगढ़ के चाय बागानों में काम करने वाले 24 वर्षीय परदुम ताती जैसे कई मजदूर अपनी मौजूदा दिहाड़ी से संतुष्ट नहीं हैं। परदुम बताते हैं कि उनकी रोज की कमाई 280 रुपए है, जो महंगाई के दौर में बेहद कम है। पिछले 10 वर्षों में मजदूरी में केवल 154 रुपए की बढ़ोतरी हुई है, जो मजदूरों की जरूरतों के हिसाब से नाकाफी है।
मजदूरों की मुख्य तीन मांगें हैं—दिहाड़ी बढ़ाई जाए, जमीन का मालिकाना हक मिले और टी-ट्राइब समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिया जाए। मजदूरों का कहना है कि उन्होंने 551 रुपए दिहाड़ी की मांग की थी, लेकिन सरकार ने इसे पूरा नहीं किया।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और ग्लोबल लिविंग वेज कोएलिशन (GLWC) की रिपोर्ट के अनुसार, एक मजदूर को परिवार चलाने के लिए कम से कम 15,000 रुपए मासिक आय की जरूरत है, जबकि वर्तमान में यह आय करीब 8,000 रुपए ही है। इससे मजदूरों के जीवन स्तर पर सीधा असर पड़ रहा है।
महिला मजदूरों की समस्याएं और बुनियादी सुविधाओं की कमी
असम के चाय बागानों में लगभग 60% मजदूर महिलाएं हैं, जो पत्तियां तोड़ने का मुख्य काम करती हैं। लेकिन उन्हें बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है।
महिला मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या टॉयलेट की कमी है। उन्हें काम के दौरान खुले में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों पर खतरा रहता है।
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इसके अलावा, मजदूरों को रहने के लिए जो क्वार्टर दिए गए हैं, उनकी हालत भी खराब है। कई घरों की छतें टपकती हैं और दीवारें टूटी हुई हैं। बीमा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी मजदूरों की परेशानियों को बढ़ाती है।
महंगाई के कारण मजदूरों के लिए घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया है। बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजमर्रा के खर्चों के बीच संतुलन बनाना उनके लिए चुनौती बन गया है।
चाय बागानों का राजनीतिक महत्व और चुनावी असर
असम में चाय जनजाति की आबादी करीब 70 लाख है, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 20% हिस्सा है। यही कारण है कि 126 विधानसभा सीटों में से करीब 45 सीटों पर इनका सीधा प्रभाव है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चाय बागान मजदूरों का वोट किसी भी पार्टी की जीत-हार तय कर सकता है। पहले यह समुदाय कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक था, लेकिन 2016 के बाद यह धीरे-धीरे BJP की ओर शिफ्ट हुआ।
हालांकि इस बार मजदूरों की नाराजगी और अधूरी मांगें चुनावी समीकरण बदल सकती हैं। खासतौर पर दिहाड़ी, जमीन का हक और ST दर्जा जैसे मुद्दे इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
सरकार और विपक्ष के दावे
BJP का कहना है कि सरकार चाय जनजाति को ST दर्जा दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (GoM) बनाया है और विभिन्न समुदायों के नेताओं से बातचीत की है। साथ ही, सरकार ने वादा किया है कि अगले तीन वर्षों में मजदूरी बढ़ाकर 500 रुपए तक की जाएगी।
वहीं, कांग्रेस का कहना है कि अगर उनकी सरकार बनती है तो मजदूरों की मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। पार्टी का कहना है कि जो समुदाय निर्धारित मानकों को पूरा करेंगे, उन्हें ST दर्जा दिया जाएगा।








