बांग्लादेश चुनाव 2026: शफीकुर रहमान ने बदली जमात की पुरानी छवि, लोकतांत्रिक रूप में पार्टी को किया प्रस्तुत

बांग्लादेश चुनाव 2026 में जमात-ए-इस्लामी का उदय, शफीकुर रहमान का नेतृत्व, BNP के साथ गठबंधन और धार्मिक राजनीति का प्रभाव, चुनावी रणनीति पर विश्लेषण।

बांग्लादेश चुनाव 2026 में जमात-ए-इस्लामी सक्रिय हो गई है। शफीकुर रहमान के नेतृत्व में पार्टी BNP के साथ गठबंधन कर रही है। धार्मिक राजनीति, कानूनी चुनौतियां और लोकतांत्रिक छवि सुधार के बीच जमात की भूमिका अहम बनी हुई है।

Bangladesh Elections 2026: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी पार्टी सियासत के केंद्र में है। यह पार्टी पिछले एक दशक से चुनाव नहीं लड़ पाई थी, लेकिन अब राजनीतिक परिदृश्य में इसे एक बार फिर सक्रिय देखा जा रहा है। चुनाव ना केवल सत्ता परिवर्तन का मौका लाते हैं, बल्कि देश की वैचारिक दिशा को भी तय करेंगे। इस चुनावी माहौल में जमात-ए-इस्लामी और उसके प्रमुख शफीकुर रहमान की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है।

जमात-ए-इस्लामी का राजनीतिक ग्राफ इस बार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के साथ सीधी टक्कर में है। अतीत में BNP और जमात का गठबंधन सत्ता तक पहुंच चुका है। इस बार भी दोनों दलों का गठबंधन चुनावी रणनीति में निर्णायक हो सकता है।

जमात का पाकिस्तान से संबंध

बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने के बाद से ही देश की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक राजनीति के बीच संघर्ष देखा गया है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जमात-ए-इस्लामी पर पाकिस्तान का समर्थन करने के आरोप लगे थे। यही कारण है कि आज भी जमात को मुक्ति संग्राम विरोधी के रूप में देखा जाता है। इन आरोपों ने पार्टी की स्वीकार्यता को हमेशा प्रभावित किया है।

बांग्लादेश चुनाव 2026: शफीकुर रहमान ने बदली जमात की पुरानी छवि, लोकतांत्रिक रूप में पार्टी को किया प्रस्तुत

हालांकि अब अवामी लीग पर बैन है, इसलिए जमात खुद को एक विकल्प के रूप में पेश कर रही है। पार्टी की विचारधारा इस्लामी शासन और शरीयत आधारित व्यवस्था पर केंद्रित रही है। इसके आलोचक मानते हैं कि जमात की यह विचारधारा बांग्लादेश के संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत से टकराती है। यही टकराव जमात-ए-इस्लामी को अक्सर विवादों के केंद्र में रखता रहा है।

कानूनी चुनौतियां

2013 में बांग्लादेश की अदालत ने जमात-ए-इस्लामी का पंजीकरण रद्द कर दिया था। इसके बाद पार्टी कानूनी रूप से चुनाव लड़ने में अयोग्य हो गई थी। सरकार ने कहा था कि जमात का संविधान देश के संविधान के अनुरूप नहीं है। इस कदम को अवामी लीग सरकार ने लोकतंत्र और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया था। विपक्ष ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार दिया।

हालांकि चुनावी प्रतिबंध के बावजूद जमात-ए-इस्लामी का प्रभाव जमीनी स्तर पर खत्म नहीं हुआ। पार्टी ने मदरसों, धार्मिक संस्थाओं और छात्र संगठनों के माध्यम से अपना असर बनाए रखा।

शफीकुर रहमान का उदय

शफीकुर रहमान वर्तमान में जमात-ए-इस्लामी का सबसे बड़ा चेहरा हैं। उन्हें पार्टी का अपेक्षाकृत नरम और लोकतांत्रिक चेहरा माना जाता है। उन्होंने कट्टरपंथी राजनीति से दूरी बनाकर लोकतंत्र, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देने की कोशिश की है। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में जमात की छवि सुधारने का प्रयास भी देखा जा रहा है।

शफीकुर रहमान ने पार्टी की पुरानी छवि को बदलने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। उनका कहना है कि बांग्लादेश की राजनीति को इस्लामी मूल्यों के अनुरूप होने के साथ-साथ आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में भी ढाला जा सकता है।

बांग्लादेश चुनाव 2026: शफीकुर रहमान ने बदली जमात की पुरानी छवि, लोकतांत्रिक रूप में पार्टी को किया प्रस्तुत

BNP और जमात की चुनावी रणनीति

इस बार के चुनाव में शफीकुर रहमान की जमात और BNP के बीच सीधी टक्कर है। जमात और नए दल नेशनल सिटीजन पार्टी के बीच गठजोड़ हुआ है। इसका उद्देश्य है बांग्लादेश की राजनीति में अपना दबदबा कायम करना। चुनावी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बांग्लादेशी समाज धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक राजनीति के बीच किस दिशा में अपना भविष्य देखता है।

शफीकुर रहमान की पृष्ठभूमि

शफीकुर रहमान का जन्म 1958 में बांग्लादेश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के मौलवी बाजार जिले में हुआ। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और सिलहट के एमएजी उस्मानी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। डॉक्टर बनने के साथ-साथ वह छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे।

उनका राजनीतिक सफर इस्लामी छात्र संगठन से शुरू हुआ और बाद में जमात-ए-इस्लामी में शामिल होकर उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियों में प्रगति की। 2019 में उन्हें पार्टी का अमीर (प्रमुख) चुना गया। उनका यह नेतृत्व उस दौर में आया जब जमात-ए-इस्लामी को कानूनी मुश्किलों और चुनावी नाकामियों का सामना करना पड़ रहा था।

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