लगातार ट्रांसफर से परेशान जज दिनेश गुप्ता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वे प्रतिभाशाली अधिकारी हैं। कोर्ट ने उनकी सेहत, रिटायरमेंट और पारिवारिक हालात को देखते हुए हाईकोर्ट सीजे को दो हफ्ते में सहानुभूति से निर्णय लेने के निर्देश दिए।
Jaipur: जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिनेश गुप्ता ने बार-बार तबादलों से परेशान होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी सेवानिवृत्ति में अब केवल 10 महीने शेष हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनका लगातार स्थानांतरण किया गया, जिससे न सिर्फ उनकी निजी बल्कि पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी बढ़ गईं।
जज गुप्ता ने अपनी याचिका में बताया कि वे गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और जयपुर में उनका नियमित इलाज चल रहा है। इसके अलावा उनकी पत्नी भी शिक्षिका हैं, जिनकी रिटायरमेंट में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। ऐसे में बार-बार ट्रांसफर से पूरा परिवार मानसिक दबाव में है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की बेंच में हुई, जिसमें सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि दिनेश गुप्ता एक प्रतिभाशाली और सक्षम जज हैं।
कोर्ट ने कहा कि उन्हें जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) में निदेशक (विधि) और विधिक सेवा प्राधिकरण में जिम्मेदारी दी गई थी, जिसे किसी भी तरह से सजा के रूप में नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि उनकी काबिलियत के कारण ही उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति, रिटायरमेंट में कम समय और पारिवारिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के एक्टिंग सीजे को दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस को निर्देश दिए कि वे जज दिनेश गुप्ता के प्रतिवेदन पर दो सप्ताह के भीतर सहानुभूतिपूर्वक विचार करें। कोर्ट ने साफ किया कि यह निर्णय प्रशासनिक विवेक से लिया जाए, लेकिन मानवीय पहलुओं को नजर में रखा जाए।
कोर्ट के इस निर्देश के बाद जज गुप्ता को बड़ी राहत की उम्मीद जगी है, क्योंकि अब उनके ट्रांसफर को लेकर उच्च स्तर पर दोबारा विचार किया जाएगा।
फैसले के बाद हुआ था पहला ट्रांसफर
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जज दिनेश गुप्ता जयपुर की कॉमर्शियल कोर्ट में पदस्थ थे। इसी दौरान 5 जुलाई 2025 को उन्होंने एक निजी कंपनी पर 50 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। इसी दिन उनका जयपुर से ब्यावर प्रिंसिपल जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर ट्रांसफर कर दिया गया।
इसके बाद केवल पांच महीने के भीतर ही 2 दिसंबर 2025 को उनका दूसरा ट्रांसफर कर ब्यावर से जालौर भेज दिया गया। इस लगातार हो रहे तबादले से जज गुप्ता मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान हो गए।
उन्होंने इस संबंध में राजस्थान हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस को प्रतिवेदन देकर जयपुर में ही पोस्टिंग बनाए रखने की मांग की थी, लेकिन जब उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
चर्चित फैसलों के कारण रहे सुर्खियों में
जज दिनेश गुप्ता अपने पूरे न्यायिक करियर में कई बड़े और चर्चित फैसलों के लिए जाने जाते रहे हैं। वर्ष 2005 में जयपुर में मजिस्ट्रेट रहते हुए उन्होंने एक रैली के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के अपमान के मामले में तत्कालीन जयपुर एसपी सहित दो आरएएस अधिकारियों के खिलाफ संज्ञान लेकर गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए थे।
इसके अलावा, उन्होंने आरसीए के तत्कालीन अध्यक्ष और आईपीएल कमिश्नर रहे ललित मोदी के खिलाफ भी एक मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। सवाई माधोपुर पॉक्सो कोर्ट में तैनाती के दौरान एक मामले में तत्कालीन डीजीपी कपिल गर्ग को भी उनकी अदालत में पेश होना पड़ा था।
जेडीए में रहते हुए बड़ा खुलासा
जयपुर विकास प्राधिकरण में विधि निदेशक के रूप में कार्य करते हुए जज गुप्ता ने जयपुर की अरबों रुपए की सरकारी जमीन को कथित मिलीभगत से हड़पने का मामला उजागर किया था। उनकी सख्ती के कारण जमीन के एक बड़े हिस्से को अवैध कब्जे से बचाया जा सका।
उनके इन फैसलों और कार्यशैली के कारण वे हमेशा चर्चा में रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ है कि न्यायपालिका में उनकी छवि एक ईमानदार और निर्भीक अधिकारी की रही है।









