बिहार विधानसभा में शुक्रवार को भाकपा (माले) विधायक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी नियम पर रोक को 'ब्राह्मणवादी' कहा। इस टिप्पणी पर सत्ता पक्ष ने तीखा विरोध जताया और सदन में बहस गरमाई।
Patna: बिहार विधानसभा में शुक्रवार को एक बार फिर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार तनातनी देखने को मिली। मामला तब गर्माया जब भाकपा (माले) विधायक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 पर रोक को 'ब्राह्मणवादी' कह दिया। इस टिप्पणी के बाद सदन में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और मामला गंभीर हो गया।
विधायक की टिप्पणी पर सत्ता पक्ष ने तुरंत विरोध जताया। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने निर्देश दिए कि कार्यवाही में 'ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग न किया जाए और इसे हटा दिया जाए। उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि संवैधानिक संस्था के फैसलों पर सवाल उठाने के लिए इस तरह की भाषा का उपयोग उचित नहीं है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस
सदन में उप मुख्यमंत्री ने कहा कि हर समाज का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि मुजफ्फरपुर में तकनीकी शिक्षा के अध्ययन के दौरान, वह भूमिहार-ब्राह्मण समुदाय से होने के बावजूद रैगिंग का शिकार हुए और हॉस्टल से निकाल दिए गए। इस पर उन्होंने जोर दिया कि किसी संवैधानिक संस्था के निर्णय पर विवाद उठाने के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
विपक्ष के इस तर्क पर सत्तापक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। विधायक मिथिलेश तिवारी ने सवाल उठाया कि विपक्ष के लोगों को ब्राह्मणों से इतनी शिकायत क्यों है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान कृष्ण ने अपने आंसुओं से ब्राह्मण के पैर का पखारा किया था। इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि ब्राह्मण ही शादी और श्राद्ध दोनों कराता है और एक ब्राह्मण ने भिक्षा मांगकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
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राजद और माले विधायक का रुख
राजद के नेता आलोक मेहता ने इस मामले में साफ किया कि माले विधायक ने ब्राह्मण जाति का अपमान नहीं किया बल्कि ब्राह्मणवाद की आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि यह सामाजिक और शैक्षिक संदर्भ में उठाया गया मुद्दा था, न कि किसी समुदाय के खिलाफ कोई व्यक्तिगत टिप्पणी।
माले विधायक की ओर से भी यह कहा गया कि उनका इरादा किसी जाति का अपमान करना नहीं था। उन्होंने यूजीसी के नियमों पर रोक को सामाजिक असमानता और उच्च शिक्षा में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया मुद्दा बताया।
UGC नियम पर उठे सवाल
बिहार विधानसभा में बहस का केंद्र UGC के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 पर लगी। इस नियम का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में विविधता और समान अवसर को बढ़ावा देना है। माले विधायक ने इस नियम पर रोक को 'ब्राह्मणवादी' कहकर सदन में चर्चा छेड़ दी। सत्तापक्ष का तर्क रहा कि किसी संवैधानिक संस्था के निर्णय पर जाति आधारित टिप्पणी असंवैधानिक और अनुचित है।
विपक्ष का कहना था कि यह शब्द सामाजिक असमानता और शिक्षा के अवसरों में पक्षपात के विरोध में इस्तेमाल किया गया। हालांकि, सदन में हंगामा बढ़ता देख अध्यक्ष ने तुरंत नियमन लागू कर शब्द हटाने का आदेश दिया और दोनों पक्षों को शांति बनाए रखने का निर्देश दिया।










