महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड को बड़ी राहत दी है। FDA ने पुणे स्थित कंपनी की कैरी एंड फॉरवर्डिंग यूनिट का दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने का आदेश वापस ले लिया है।
Cipla Drug Licence Case: महाराष्ट्र के Food and Drug Administration (FDA) को सिप्ला से जुड़े एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी का सामना करना पड़ा। कोर्ट की आपत्ति के बाद FDA ने पुणे स्थित Cipla Pharma and Life Sciences Ltd. की कैरी एंड फॉरवर्डिंग यूनिट का दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने का अपना आदेश वापस लेने पर सहमति जताई है। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि विभाग की प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया।
मामले की सुनवाई एक्टिंग चीफ जस्टिस रविंद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखड की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने FDA की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि विभाग ने कार्रवाई करते समय कंपनी को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया।
FDA ने लाइसेंस क्यों रद्द किया था?
FDA ने पुणे के वाडकी इलाके में स्थित सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज की दवा भंडारण और वितरण सुविधा का बिक्री लाइसेंस 27 अगस्त से रद्द कर दिया था। विभाग की कार्रवाई ‘Reactin Plus’ टैबलेट से जुड़ी पैकेजिंग, स्टोरेज और दवा की वापसी में कथित गंभीर अनियमितताओं के आरोपों के बाद की गई थी।लाइसेंस रद्द होने के बाद कंपनी ने इस कार्रवाई को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। सिप्ला का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा ने अदालत के सामने FDA की प्रक्रिया से संबंधित कई आपत्तियां उठाईं।
सुनवाई का मौका नहीं मिलने का आरोप
कंपनी के वकील ने अदालत को बताया कि FDA ने 26 अगस्त को विभाग के सामने होने वाली सुनवाई में कंपनी की ओर से प्रतिनिधि भेजने के लिए ईमेल किया था। हालांकि, 26 अगस्त को राज्य सरकार की ओर से सार्वजनिक अवकाश था। सिप्ला की ओर से कहा गया कि छुट्टी होने के कारण कंपनी का प्रतिनिधि उस दिन उपलब्ध नहीं था।
कंपनी ने कथित तौर पर सुनवाई को आगे बढ़ाने का अनुरोध भी किया, लेकिन इसके बावजूद FDA ने उसी दिन आदेश पारित कर दिया। कंपनी का तर्क था कि लाइसेंस रद्द करने जैसे गंभीर प्रशासनिक निर्णय से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए था।
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हाई कोर्ट ने FDA की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान FDA की ओर से अतिरिक्त सरकारी वकील पी.पी. काकड़े ने तर्क दिया कि संबंधित कानून कंपनी को सुनवाई का अधिकार देने के लिए बाध्य नहीं करता। इस दलील पर अदालत ने विभाग से सवाल किया कि जब FDA ने खुद कंपनी को सुनवाई के लिए प्रतिनिधि भेजने को कहा था, तो उसे अपना पक्ष रखने का अवसर क्यों नहीं दिया गया।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि सार्वजनिक अवकाश वाले दिन सुनवाई और उसके बाद आदेश जारी करने की प्रक्रिया कितनी उचित थी। पीठ ने FDA की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि विभाग ने इस मामले में अपनी सीमाओं से आगे जाकर काम किया है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि ऐसी प्रशासनिक कार्रवाई में प्रक्रिया और निष्पक्षता का पालन बेहद जरूरी है। किसी कंपनी के लाइसेंस पर असर डालने वाला फैसला उसके कारोबार और दवा वितरण व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
FDA ने आदेश वापस लेने पर दी सहमति
अदालत की टिप्पणियों के बाद FDA ने लाइसेंस रद्द करने का आदेश तत्काल वापस लेने की बात कही। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि वह कंपनी को नया कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी करेगा। इसके बाद कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा और मामले से जुड़े तथ्यों तथा जवाबों पर विचार करने के बाद FDA नया आदेश पारित करेगा।
यानी मौजूदा आदेश वापस लिए जाने का मतलब यह नहीं है कि मामले से जुड़े आरोप पूरी तरह खत्म हो गए हैं। नियामकीय प्रक्रिया नए सिरे से आगे बढ़ सकती है।









