भारत और रूस के बीच आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग को लेकर बातचीत तेज हो गई है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अगले सप्ताह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए दिल्ली आने की उम्मीद है।
BRICS Summit 2026: भारत और रूस के बीच रणनीतिक सहयोग का दायरा अब पारंपरिक रक्षा, ऊर्जा और व्यापार से आगे बढ़कर आर्कटिक क्षेत्र तक पहुंचता नजर आ रहा है। BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली द्विपक्षीय बातचीत में Arctic Region और Northern Sea Route (NSR) अहम मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। इस सहयोग से भारत को यूरोप तक समुद्री व्यापार के लिए एक वैकल्पिक और छोटा रास्ता मिल सकता है।
आर्कटिक सहयोग पर भारत-रूस की बातचीत तेज
रूस का आर्कटिक क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के साथ-साथ वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है। दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र में व्यापार, परिवहन, विज्ञान, तकनीक और ऊर्जा से जुड़े सहयोग पर चर्चा चल रही है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में आर्कटिक क्षेत्र को लेकर भारत और रूस के बीच बढ़ते संपर्क का संकेत दिया है।
उनके अनुसार, दोनों देश हाई-लैटिट्यूड क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर सक्रिय बातचीत कर रहे हैं। रूस और भारत के बीच अंतर-सरकारी आयोग की बैठकों में भी आर्कटिक क्षेत्र से जुड़े आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग पर चर्चा हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में आर्कटिक भारत-रूस संबंधों में सहयोग का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
Northern Sea Route भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
भारत के लिए इस प्रस्तावित सहयोग का सबसे बड़ा आकर्षण Northern Sea Route हो सकता है। यह समुद्री मार्ग रूस के उत्तरी आर्कटिक तट के साथ होकर गुजरता है और एशिया तथा यूरोप के बीच समुद्री संपर्क को छोटा करने की क्षमता रखता है। मौजूदा समुद्री व्यापार में यूरोप तक पहुंचने के लिए स्वेज नहर एक प्रमुख मार्ग है। इसके मुकाबले Northern Sea Route का इस्तेमाल भारतीय कार्गो के लिए दूरी को लगभग 40 फीसदी तक कम कर सकता है। इससे कुछ मार्गों पर यात्रा का समय भी करीब दो सप्ताह तक घटने की संभावना है।
कम दूरी का मतलब ईंधन, परिवहन समय और लॉजिस्टिक्स लागत में संभावित बचत भी है। हालांकि, इस मार्ग पर मौसम और बर्फ की स्थिति के कारण सामान्य समुद्री मार्गों की तुलना में अलग तरह की तैयारी जरूरी होगी।
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5,600 किलोमीटर लंबा है Northern Sea Route
Northern Sea Route करीब 5,600 किलोमीटर लंबा समुद्री मार्ग है, जो रूस के आर्कटिक क्षेत्र से होकर गुजरता है। लंबे समय तक यहां समुद्री बर्फ के कारण जहाजों की आवाजाही सीमित रही है। जलवायु परिवर्तन के चलते आर्कटिक समुद्री बर्फ में बदलाव आया है, जिससे साल के कुछ हिस्सों में इस मार्ग पर नौवहन की संभावनाएं बढ़ी हैं।
हालांकि, NSR पर संचालन अभी भी चुनौतीपूर्ण है। सामान्य मालवाहक जहाजों की बजाय बर्फीले पानी में चलने में सक्षम विशेष जहाजों और मजबूत पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है।
इसी वजह से भारत और रूस के बीच आर्कटिक के लिए उपयुक्त जहाजों के निर्माण और भारतीय कार्गो के लिए पोर्ट सुविधाएं विकसित करने पर बातचीत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रूस की परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी Rosatom इस मार्ग के संचालन और आइसब्रेकिंग क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आर्कटिक में खनिजों और ऊर्जा का बड़ा भंडार
आर्कटिक क्षेत्र केवल समुद्री व्यापार के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है। यहां तेल और गैस समेत कई रणनीतिक प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार मौजूद हैं।रूस के आर्कटिक क्षेत्र में LNG और अन्य हाइड्रोकार्बन संसाधनों के अलावा निकेल, तांबा, प्लेटिनम, पैलेडियम और दुर्लभ मृदा तत्व यानी Rare Earth Elements जैसे महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं।
इन खनिजों की मांग इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा उपकरण, ऊर्जा तकनीक और आधुनिक विनिर्माण उद्योगों में लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आर्कटिक में भारत की भागीदारी से भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति के नए विकल्प खुल सकते हैं।








