CEC ज्ञानेश कुमार को पद छोड़ना होगा: SIR विवाद के बीच एमके स्टालिन का बड़ा बयान

एमके स्टालिन ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। SIR और चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया को लेकर विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई। 4

डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने SIR रोकने और चुनाव आयोग की आंतरिक घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की। विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में CEC-EC नियुक्ति कानून पर भी सुनवाई हुई।

चेन्नई: डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस्तीफे की मांग की है। यह बयान ऐसे समय आया है जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। स्टालिन ने SIR को रोकने और आयोग के भीतर हुई घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग भी की है।

स्टालिन ने CEC ज्ञानेश कुमार पर क्या कहा?

डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने 23 सितंबर को एक बयान में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद छोड़ना चाहिए और उनके पास पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। स्टालिन की यह प्रतिक्रिया एक मीडिया रिपोर्ट के बाद सामने आई, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों के दौरान कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

स्टालिन ने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के नाम पर मतदाता सूची से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर डीएमके और अन्य विपक्षी दल पहले से आपत्ति जताते रहे हैं। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठे और पश्चिम बंगाल में भी इसके कारण व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक प्रतिक्रिया देखने को मिली।

हालांकि, ये आरोप स्टालिन और विपक्षी दलों के राजनीतिक दावे हैं। चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सामने आई रिपोर्टों पर अलग रुख रखा है और कहा है कि विचारों में अंतर होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। आयोग से जुड़े सूत्रों ने SIR समेत फैसलों को सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही है।

SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?

SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की समीक्षा और सत्यापन किया जाता है। इसे लेकर विपक्षी दलों ने कई राज्यों में मतदाताओं के नाम हटाए जाने और प्रक्रिया के तरीके पर सवाल उठाए हैं।

स्टालिन ने कहा कि डीएमके ने SIR के तहत मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाने के कदम का लगातार विरोध किया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रक्रिया से जुड़े घटनाक्रमों और सामने आई रिपोर्टों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

स्टालिन ने आयोग के भीतर कथित राजनीतिक हस्तक्षेप की जांच की मांग करते हुए कहा कि SIR की प्रक्रिया को रोका जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के भीतर हुई घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी तय होती है तो उसे जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की कथित आपत्तियों से उठा सवाल

विवाद को उस रिपोर्ट के बाद और बल मिला जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में SIR से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यशैली और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इस पूरे विवाद को अलग तरीके से प्रस्तुत किया। आयोग का कहना है कि फैसलों के दौरान लिखित टिप्पणियां, सुझाव या असहमति दर्ज होना संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग से जुड़े सूत्रों ने यह भी कहा कि SIR सहित उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

इसलिए फिलहाल एक ओर विपक्षी दलों के आरोप हैं, जबकि दूसरी ओर चुनाव आयोग इन दावों को खारिज करते हुए अपनी प्रक्रिया को संस्थागत और लोकतांत्रिक निर्णय व्यवस्था का हिस्सा बता रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में CEC-EC नियुक्ति कानून पर सुनवाई

इसी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी सुनवाई हुई। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले पर अलग-अलग राय दी।

मामला उस कानून से जुड़ा है, जिसने CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले चयन पैनल की संरचना में बदलाव किया। 2023 के कानून के तहत पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की 2023 की संविधान पीठ ने संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाले पैनल की व्यवस्था का निर्देश दिया था।

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने क्रिकेट का उदाहरण क्यों दिया?

सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी निष्पक्षता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने क्रिकेट में अंपायर का उदाहरण देते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में स्वतंत्रता और निष्पक्षता की धारणा के महत्व पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि किसी संस्था का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।

जस्टिस दत्ता ने नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, ऐसी व्यवस्था में चयन प्रक्रिया के भीतर स्वतंत्र संतुलन को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में अलग-अलग राय

दो सदस्यीय पीठ इस सवाल पर एकमत नहीं थी कि 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। जस्टिस दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय दी।

इसके बाद मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा गया, ताकि उचित संख्या वाली बड़ी पीठ के गठन पर निर्णय लिया जा सके। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यह प्रक्रिया मामले की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि आगे की न्यायिक सुनवाई के लिए पीठ के गठन से संबंधित है।

ज्ञानेश कुमार कब बने थे मुख्य चुनाव आयुक्त?

भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था। वे 1988 बैच के केरल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी रहे हैं। इससे पहले वे केंद्र सरकार और केरल सरकार में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं।

विवाद का अगला चरण क्या होगा?

SIR, चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और CEC की भूमिका को लेकर राजनीतिक विवाद फिलहाल जारी है। डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, SIR पर रोक और आयोग के भीतर हुई घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि निर्णय प्रक्रिया में टिप्पणियां और मतभेद दर्ज होना संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा है और उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसी बीच CEC और EC की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आगे बढ़ रहा है।

इस तरह मौजूदा विवाद के तीन प्रमुख पहलू हैं—SIR के तहत मतदाता सूची का पुनरीक्षण, चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और CEC-EC की नियुक्ति से संबंधित कानूनी ढांचा। इन तीनों मुद्दों पर राजनीतिक दलों, चुनाव आयोग और न्यायपालिका के रुख से आने वाले दिनों में मामले की दिशा स्पष्ट होगी।

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