हिमाचल के ऐतिहासिक चंबा शहर पर भूस्खलन का संकट: ड्रोन सर्वे में 7 संवेदनशील इलाके मिले, 270 मकानों पर खतरा

हिमाचल के ऐतिहासिक चंबा शहर में ड्रोन सर्वे से 7 संवेदनशील इलाके सामने आए हैं। करीब 270 मकानों पर भूस्खलन का संभावित खतरा बताया गया है।
हिमाचल के ऐतिहासिक चंबा शहर पर भूस्खलन का संकट: ड्रोन सर्वे में 7 संवेदनशील इलाके मिले, 270 मकानों पर खतरा
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हिमाचल प्रदेश के ऐतिहासिक चंबा शहर पर भूस्खलन का खतरा लगातार गंभीर होता जा रहा है। मानसून के दौरान लगातार बारिश के बीच शहर और इसके आसपास की पहाड़ियों में जमीन खिसकने की घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। अब ड्रोन सर्वे के जरिए ऐसे सात संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां भूस्खलन की आशंका अधिक बताई जा रही है। इन इलाकों में करीब 270 मकानों के प्रभावित होने या ढहने का खतरा सामने आया है। हालांकि किसी मकान का ढहना निश्चित नहीं माना जा सकता, लेकिन संवेदनशील ढलानों और जमीन की स्थिति को देखते हुए इन घरों को जोखिम वाले क्षेत्र में रखा गया है।

चंबा जिला प्रशासन की ओर से आपदा और भूस्खलन के जोखिम को देखते हुए निगरानी बढ़ाई जा रही है। चंबा जिला हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहां बारिश के मौसम में पहाड़ी ढलानों के अस्थिर होने की समस्या सामने आती रहती है। इस साल भी भारी बारिश के दौरान चंबा शहर और आसपास के इलाकों में मलबा आने, सड़कें बाधित होने और रिहायशी क्षेत्रों में पानी तथा मलबा घुसने की घटनाएं सामने आई थीं। 28 जुलाई 2026 को भारी बारिश के दौरान चंबा के सुल्तानपुर वार्ड और आसपास की पंचायतों में फ्लैश रनऑफ के साथ बोल्डर और मलबा आने से घरों और दुकानों को नुकसान पहुंचा था।

ड्रोन सर्वे से सामने आई संवेदनशीलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहाड़ी शहरों में जमीन के खिसकने का खतरा केवल उस जगह तक सीमित नहीं रहता जहां दरार या भूस्खलन दिखाई देता है। ऊपरी ढलान पर जमीन कमजोर होने से नीचे बसे मकानों, सड़कों और अन्य निर्माणों पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि प्रशासन की ओर से केवल भूस्खलन वाले स्थानों की पहचान करने के बजाय ऐसे पूरे क्षेत्रों का सर्वे किया जा रहा है जहां जमीन की स्थिरता को लेकर आशंका है।

सर्वे के दौरान संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान होने के बाद करीब 270 मकानों को संभावित जोखिम वाले दायरे में माना जा रहा है। इन मकानों में रहने वाले लोगों के लिए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। खासकर बारिश के दौरान लगातार नमी बढ़ने, पानी के जमीन में जाने और ढलानों पर दबाव बढ़ने से कमजोर हिस्सों में दरारें चौड़ी हो सकती हैं। प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जोखिम वाले मकानों की पहचान के साथ-साथ वहां रहने वाले परिवारों को समय रहते सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाए।

चंबा का भौगोलिक स्वरूप भी इस खतरे को बढ़ाने वाला माना जाता है। शहर और इसके आसपास कई इलाके ढलानदार भूभाग पर बसे हुए हैं। पुराने निर्माण, संकरी गलियां, पहाड़ी कटाव और लगातार बढ़ता शहरी दबाव कई स्थानों पर प्राकृतिक ढलानों को प्रभावित करता है। बारिश के दौरान जब पानी की निकासी ठीक नहीं रहती तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे में ड्रोन सर्वे से मिले आंकड़े प्रशासन को उन स्थानों की प्राथमिकता तय करने में मदद कर सकते हैं जहां तत्काल निगरानी या सुरक्षा उपायों की जरूरत है।

चंबा में इस तरह की निगरानी की जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में मानसून के दौरान भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का खतरा लगातार बना रहता है। चंबा जिले में जुलाई के अंत में भारी बारिश के दौरान रिहायशी क्षेत्रों में मलबा और पानी पहुंचने की घटनाएं इसका उदाहरण हैं। उस समय सुल्तानपुर वार्ड और आसपास के सरोल, परेल और तड़ोही क्षेत्रों में भी बारिश के कारण नुकसान की खबर सामने आई थी।

वैज्ञानिक स्तर पर भी चंबा जैसे हिमालयी क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव और ढलानों की संवेदनशीलता पर अध्ययन होते रहे हैं। 2026 में प्रकाशित एक शोध में चंबा जिले में मिट्टी के कटाव को लेकर जियोस्पेशियल और रिमोट-सेंसिंग आधारित आकलन किया गया। शोधकर्ताओं ने पर्वतीय क्षेत्र में मिट्टी के कटाव को गंभीर पर्यावरणीय समस्या बताया है। ऐसे वैज्ञानिक अध्ययन और प्रशासनिक ड्रोन सर्वे भविष्य में जोखिम वाले क्षेत्रों की बेहतर पहचान और प्रबंधन में उपयोगी हो सकते हैं।

ड्रोन सर्वे की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि इससे किसी इलाके की जमीन और ढलानों की स्थिति को ऊपर से व्यापक तरीके से देखा जा सकता है। जिन जगहों पर पैदल या सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल होता है, वहां भी ड्रोन के जरिए तस्वीरें और वीडियो जुटाए जा सकते हैं। इसके आधार पर दरारों, मिट्टी के खिसकने, ढलान के कमजोर हिस्सों और निर्माण वाले क्षेत्रों के बीच संभावित जोखिम का आकलन किया जा सकता है। यदि ऐसे सर्वे को नियमित रूप से दोहराया जाए तो जमीन की स्थिति में होने वाले बदलावों की तुलना भी की जा सकती है।

270 मकानों के जोखिम में आने की जानकारी के बाद अब सबसे अहम सवाल इन घरों में रहने वाले परिवारों की सुरक्षा का है। प्रशासन को यह तय करना होगा कि कौन से मकान तत्काल खाली कराने की स्थिति में हैं और किन घरों में केवल निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। हर संवेदनशील क्षेत्र में खतरे की गंभीरता एक जैसी नहीं होती। किसी स्थान पर जमीन में मामूली दरार हो सकती है, जबकि दूसरे स्थान पर ढलान का बड़ा हिस्सा अस्थिर हो सकता है। इसलिए जोखिम के स्तर के आधार पर अलग-अलग सुरक्षा योजना जरूरी होगी।

बारिश के दौरान लोगों को भी प्रशासन की चेतावनियों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। घर के आसपास जमीन में अचानक दरार दिखाई देना, दीवारों या फर्श में नई दरारें आना, दरवाजे-खिड़कियों का अचानक ठीक से बंद न होना, पहाड़ी ढलान से लगातार पत्थर या मिट्टी गिरना और पानी के बहाव की दिशा बदलना संभावित खतरे के संकेत हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखाई देने पर लोगों को खुद जोखिम का आकलन करने के बजाय स्थानीय प्रशासन या आपदा प्रबंधन अधिकारियों को जानकारी देनी चाहिए।

चंबा जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी आपात स्थिति के लिए 112 सहित कई हेल्पलाइन नंबर उपलब्ध कराए गए हैं। जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार राष्ट्रीय आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली के लिए 112 नंबर का इस्तेमाल किया जा सकता है।

भूस्खलन का खतरा केवल मकानों तक सीमित नहीं होता। इससे सड़कें बंद होने, बिजली और पानी की लाइनों को नुकसान पहुंचने, यातायात बाधित होने और जरूरी सेवाओं की पहुंच प्रभावित होने का खतरा भी रहता है। यदि कोई प्रमुख सड़क भूस्खलन की चपेट में आती है तो राहत और बचाव दलों को प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचने में मुश्किल हो सकती है। इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान के साथ वैकल्पिक रास्तों और आपातकालीन पहुंच की व्यवस्था भी जरूरी हो जाती है।

चंबा शहर ऐतिहासिक और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु आते हैं। मानसून के दौरान भूस्खलन का खतरा बढ़ने से स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले यात्रियों की सुरक्षा भी प्रशासन की जिम्मेदारी बन जाती है। पहाड़ी सड़कों पर अचानक मलबा गिरने या सड़क धंसने की स्थिति में यातायात प्रभावित हो सकता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन, लोक निर्माण विभाग और आपदा प्रबंधन टीमों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण रहेगा।

हिमाचल के दूसरे हिस्सों की तरह चंबा में भी प्राकृतिक ढलानों पर निर्माण और बारिश के पानी की निकासी से जुड़े सवाल लगातार उठते रहे हैं। किसी भी पहाड़ी शहर में यदि प्राकृतिक जल निकासी बाधित होती है तो बारिश का पानी जमीन के भीतर जाकर ढलान को कमजोर कर सकता है। इसके अलावा सड़क निर्माण या भवन निर्माण के दौरान पहाड़ी की कटिंग भी यदि वैज्ञानिक तरीके से नहीं की जाए तो ढलान की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसलिए भविष्य में निर्माण गतिविधियों के साथ भूगर्भीय और ढलान स्थिरता से जुड़े पहलुओं को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।

चंबा जिले में प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ना भी महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर के अनुसार भारत में भूस्खलनों की मैपिंग के लिए उच्च और बहुत उच्च रिजॉल्यूशन वाले सैटेलाइट डेटा तथा एरियल इमेज का इस्तेमाल किया जाता है और कई क्षेत्रों में फील्ड वैलिडेशन भी किया जाता है। ऐसे आधुनिक रिमोट-सेंसिंग डेटा और स्थानीय ड्रोन सर्वे को मिलाकर किसी क्षेत्र की भूस्खलन संवेदनशीलता का अधिक विस्तृत आकलन किया जा सकता है।

चंबा में सामने आए सात संवेदनशील क्षेत्रों और 270 मकानों का मामला प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी 270 मकान निश्चित रूप से ढह जाएंगे, बल्कि यह कि इन मकानों और उनके आसपास की जमीन को जोखिम के लिहाज से गंभीरता से देखने की जरूरत है। वास्तविक खतरे का स्तर भूगर्भीय जांच, ढलान की स्थिरता, बारिश की स्थिति और मौके पर तकनीकी निरीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगा।

फिलहाल सबसे जरूरी है कि संवेदनशील इलाकों में नियमित निगरानी रखी जाए और बारिश के दौरान किसी भी असामान्य गतिविधि पर तुरंत कार्रवाई की जाए। जिन मकानों को अधिक जोखिम वाले क्षेत्र में चिह्नित किया गया है, वहां रहने वाले लोगों को आपात स्थिति के लिए पहले से तैयारी रखने की जरूरत होगी। प्रशासन को भी जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर अस्थायी राहत व्यवस्था तैयार रखनी होगी।

चंबा में ड्रोन सर्वे से सामने आई तस्वीर यह बताती है कि पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन अब केवल घटना के बाद राहत पहुंचाने तक सीमित नहीं रह सकता। खतरे वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान, संवेदनशील मकानों की सूची, नियमित तकनीकी निगरानी, जल निकासी व्यवस्था की जांच और लोगों को समय पर चेतावनी देना आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बेहद जरूरी है। सात संवेदनशील इलाकों में 270 मकानों के खतरे की पहचान इसी दिशा में एक अहम कदम है। आने वाले दिनों में इन क्षेत्रों की तकनीकी जांच और प्रशासनिक स्तर पर लिए जाने वाले सुरक्षा फैसले यह तय करेंगे कि संभावित भूस्खलन के खतरे से चंबा शहर और उसके निवासियों को किस हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

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