पिता की गुप्त सेवा को बेटों ने दिया नया आयाम, दरभंगा में हर शुक्रवार 400 जरूरतमंदों को मिलता है भरपेट भोजन

दरभंगा में श्याम सुंदर जसराजपुरिया वर्षों तक गुप्त रूप से गरीबों को भोजन कराते रहे। निधन के बाद बेटों ने सेवा जारी रखी, हर शुक्रवार 400 जरूरतमंद खाते हैं।
पिता की गुप्त सेवा को बेटों ने दिया नया आयाम, दरभंगा में हर शुक्रवार 400 जरूरतमंदों को मिलता है भरपेट भोजन
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दरभंगा में सेवा और इंसानियत की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जहां एक पिता ने वर्षों तक जिस नेक काम को बिना किसी प्रचार और दिखावे के किया, उनके निधन के बाद बेटों ने उसी सेवा को अपनी जिम्मेदारी बना लिया। दरभंगा के गुदरी बाजार निवासी श्याम सुंदर जसराजपुरिया लंबे समय तक हर शुक्रवार जरूरतमंद और गरीब लोगों को भोजन कराते रहे, लेकिन उन्होंने अपने इस काम को परिवार तक से छिपाकर रखा था। वे चुपचाप भोजन की व्यवस्था करते और जरूरतमंदों तक खाना पहुंचाते थे। उनके लिए यह किसी प्रचार या सम्मान का विषय नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करने का एक व्यक्तिगत संकल्प था।

श्याम सुंदर जसराजपुरिया के इस सेवा कार्य के बारे में उनके परिवार को भी लंबे समय तक जानकारी नहीं थी। वह हर शुक्रवार गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था करते थे और स्वयं भी इस सेवा में जुटे रहते थे। परिवार के सामने इस काम का उल्लेख न करने के पीछे उनका उद्देश्य भी यही था कि सेवा को किसी प्रदर्शन का रूप न मिले। वर्षों तक यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा। 10 मई 2025 को उनके निधन के बाद जब उनके बेटों राजेश और मुकेश को पिता की इस गुप्त सेवा के बारे में पता चला तो वे भावुक हो गए। उन्हें यह एहसास हुआ कि उनके पिता ने जीवन के एक लंबे हिस्से में चुपचाप समाज के जरूरतमंद लोगों के लिए काम किया था।

पिता की इस अनोखी परंपरा को जानने के बाद दोनों बेटों ने इसे बंद करने के बजाय आगे बढ़ाने का फैसला किया। बड़े बेटे राजेश और छोटे बेटे मुकेश ने तय किया कि जिस काम को उनके पिता ने इतने वर्षों तक बिना किसी अपेक्षा के किया, उसे उनकी याद में जारी रखा जाएगा। इसके बाद दोनों भाई हर शुक्रवार अपने घर के बाहर जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करने लगे। धीरे-धीरे यह सेवा आसपास के लोगों के लिए भी एक नियमित व्यवस्था बन गई और अब प्रत्येक शुक्रवार करीब 400 जरूरतमंद लोग यहां भोजन करते हैं।

इस सेवा की खास बात यह है कि यहां आने वाले लोगों को केवल औपचारिक तौर पर खाना नहीं दिया जाता, बल्कि परिवार की कोशिश रहती है कि उन्हें सम्मान के साथ भरपेट और स्वादिष्ट भोजन कराया जाए। भोजन में पनीर मसाला जैसे व्यंजन शामिल रहते हैं और खाने के साथ मिठाई भी दी जाती है। परिवार के सदस्य भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था का ध्यान रखते हैं ताकि दूर से आने वाले जरूरतमंद लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो। परिवार के लिए खाने वाले लोगों की संतुष्टि ही सबसे बड़ी खुशी और आशीर्वाद है।

दोनों भाइयों के अनुसार प्रत्येक शुक्रवार दोपहर करीब 12 बजे से भोजन सेवा शुरू होती है और यह शाम तक चलती है। इस दौरान परिवार के सदस्य अपने नियमित काम-धंधे से समय निकालकर सेवा में जुट जाते हैं। किसी की जिम्मेदारी भोजन परोसने की होती है तो कोई लोगों की व्यवस्था संभालता है। इस पूरे आयोजन में परिवार की भागीदारी इसे सिर्फ भोजन वितरण कार्यक्रम नहीं रहने देती, बल्कि पिता की याद और उनके संस्कारों से जुड़ी एक पारिवारिक परंपरा बना देती है।

राजेश और मुकेश का कहना है कि पिता ने जिस भावना से यह सेवा शुरू की थी, उसे जारी रखना ही उनके लिए पिता को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। उनके लिए यह काम केवल जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। पिता के निधन के बाद जब उन्हें उनके इस छिपे हुए सेवा कार्य के बारे में पता चला तो उन्हें समझ आया कि समाज के प्रति उनके पिता की सोच कितनी गहरी थी। अब हर शुक्रवार जरूरतमंदों की भीड़ को भोजन कराते समय दोनों भाइयों को लगता है कि वे अपने पिता की अधूरी नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित सेवा परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें सेवा के साथ सम्मान को महत्व दिया जाता है। जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने के दौरान परिवार की कोशिश रहती है कि किसी को ऐसा महसूस न हो कि उस पर कोई एहसान किया जा रहा है। भोजन लेने वाले लोगों की संतुष्टि को परिवार अपने लिए महत्वपूर्ण मानता है। इसी वजह से शुक्रवार का दिन अब जसराजपुरिया परिवार के लिए सामान्य दिन नहीं रह गया है। परिवार के सदस्य पहले से इसकी तैयारी करते हैं और भोजन की व्यवस्था से लेकर वितरण तक हर काम में भाग लेते हैं।

दरभंगा में जसराजपुरिया परिवार की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि समाज सेवा हमेशा बड़े मंच या किसी संस्था के माध्यम से ही हो, यह जरूरी नहीं है। एक व्यक्ति अपने स्तर पर भी जरूरतमंदों के लिए लगातार कुछ कर सकता है। श्याम सुंदर जसराजपुरिया ने अपने जीवनकाल में यही किया। उन्होंने न तो इस काम का प्रचार किया और न ही परिवार के सामने इसे चर्चा का विषय बनाया। उनके निधन के बाद जब बेटों को इस काम की जानकारी मिली तो उन्होंने इसे अपने पिता की विरासत के रूप में स्वीकार किया और आगे बढ़ाने का फैसला किया।

पिता की सेवा को आगे बढ़ाते हुए दोनों भाइयों ने आने वाले दिनों में इस व्यवस्था को और बेहतर और व्यापक बनाने की तैयारी भी जताई है। उनका उद्देश्य है कि अधिक से अधिक जरूरतमंद लोग इस भोजन सेवा से जुड़ सकें। फिलहाल प्रत्येक शुक्रवार करीब 400 लोग भोजन कर रहे हैं, लेकिन परिवार चाहता है कि भविष्य में सेवा का दायरा और बढ़े। इसके लिए व्यवस्था, भोजन और लोगों की सुविधा को लेकर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

जसराजपुरिया परिवार के इस काम की स्थानीय स्तर पर भी सराहना हुई है। डिवीजन चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के प्रधान महासचिव सुशील जैन ने परिवार की सेवा भावना की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को केवल अपने व्यापारिक और निजी हितों तक सीमित नहीं रहना चाहिए और समाज के कमजोर तथा जरूरतमंद वर्ग के लिए भी काम करना चाहिए। उनके अनुसार ऐसे कार्य समाज में सकारात्मक संदेश देते हैं और दूसरे लोगों को भी जरूरतमंदों की मदद करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

श्याम सुंदर जसराजपुरिया की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि उनके जीवन में की गई सेवा की जानकारी उनके परिवार को उनके निधन के बाद मिली। आमतौर पर लोग किसी सामाजिक काम को करते समय उसकी जानकारी आसपास के लोगों को देते हैं, लेकिन उन्होंने वर्षों तक इसे निजी प्रयास की तरह जारी रखा। उनके लिए जरूरतमंदों को खाना खिलाना ही उद्देश्य था। उन्होंने इसे अपनी पहचान बनाने का जरिया नहीं बनाया। उनके बेटों ने भी इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए सेवा को किसी प्रचार अभियान के बजाय पारिवारिक जिम्मेदारी की तरह अपनाया है।

हर शुक्रवार जब करीब 400 लोग भोजन के लिए जसराजपुरिया परिवार के घर के बाहर पहुंचते हैं, तो यह दृश्य परिवार के लिए भावुक करने वाला भी होता है। एक ओर वे अपने पिता को याद करते हैं, जिन्होंने इस सेवा की शुरुआत की थी, वहीं दूसरी ओर उनके सामने उन लोगों की जरूरत होती है जिनके लिए भोजन की व्यवस्था की जा रही है। परिवार के सदस्यों का मानना है कि इस सेवा को जारी रखना उनके लिए आत्मिक संतोष का माध्यम है। पिता की ओर से शुरू की गई मानव सेवा अब बेटों के जरिए आगे बढ़ रही है और यही उनके लिए सबसे बड़ी विरासत बन गई है।

इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सेवा की शुरुआत किसी बड़े अभियान या घोषणा से नहीं हुई थी। एक व्यक्ति ने अपने स्तर पर गरीबों को भोजन कराना शुरू किया और वर्षों तक इसे गुप्त रखा। उनके जाने के बाद बेटों ने उस काम को जाना और उसे समाप्त होने देने के बजाय आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। आज वही सेवा प्रत्येक शुक्रवार सैकड़ों लोगों तक भोजन पहुंचा रही है। यह पहल दिखाती है कि परिवार में अच्छे संस्कार किस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच सकते हैं और किसी व्यक्ति का छोटा-सा प्रयास उसके बाद भी समाज के लिए उपयोगी बना रह सकता है।

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