क्या 70-80 के दशक में आए हर शख्स को बंद कर दोगे मुर्शिदाबाद के व्यक्ति को हिरासत में रखने पर बंगाल सरकार पर भड़का HC

मुर्शिदाबाद के साहिदुल शेख को बांग्लादेशी होने के संदेह में हिरासत में रखने पर कलकत्ता HC ने सवाल उठाए। कोर्ट ने मेमो और पुलिस-सरकार से रिपोर्ट मांगी।
क्या 70-80 के दशक में आए हर शख्स को बंद कर दोगे मुर्शिदाबाद के व्यक्ति को हिरासत में रखने पर बंगाल सरकार पर भड़का HC
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मुर्शिदाबाद के एक व्यक्ति को कथित तौर पर बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में एक महीने से ज्यादा समय तक हिरासत में रखे जाने के मामले ने कलकत्ता हाई कोर्ट में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार से हिरासत की कानूनी वजह और प्रक्रिया को लेकर कई तीखे सवाल पूछे। न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने यह भी सवाल किया कि यदि 1970 और 1980 के दशक में बड़ी संख्या में लोग सीमा पार करके भारत आए थे, तो क्या अब उन सभी लोगों के खिलाफ इसी तरह कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने इस दौरान मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए जाने की जरूरत पर जोर दिया।

यह मामला मुर्शिदाबाद के दुबापारा गांव निवासी साहिदुल शेख से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार रानीनगर पुलिस ने 8 अगस्त को साहिदुल को हिरासत में लिया था। इसके बाद वह विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण अधिकारी यानी FRRO की हिरासत में रहा। अदालत में सुनवाई के दौरान यह सवाल सामने आया कि आखिर साहिदुल को किस कानूनी आधार पर हिरासत में रखा गया और उसे इस हिरासत की वजह से संबंधित दस्तावेज या मेमो क्यों नहीं दिया गया। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि साहिदुल का हिरासत या गिरफ्तारी मेमो उसके वकील को उपलब्ध कराया जाए।

मामले की शुरुआत साहिदुल की पत्नी देजीना बीबी की ओर से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बाद हुई। उनकी ओर से अदालत में दावा किया गया कि साहिदुल भारतीय नागरिक हैं और उन्हें केवल बांग्लादेशी होने के संदेह के आधार पर हिरासत में रखा गया है। पत्नी की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि साहिदुल का नाम SIR 2026 की सूची में सत्यापित और दर्ज है। उनके पास वोटर कार्ड, पैन कार्ड और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज भी मौजूद हैं। परिवार का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर सवाल है तो उसके संबंध में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए और हिरासत का आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए।

साहिदुल की ओर से अदालत में यह भी दलील दी गई कि यदि सरकार या पुलिस उन्हें विदेशी नागरिक मानती है तो उसके लिए संबंधित कानून के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। उनके वकील ने सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति को बिना हिरासत मेमो या स्पष्ट कारण बताए लंबे समय तक हिरासत में रखना किस प्रक्रिया के तहत आता है। अदालत के सामने यह भी बताया गया कि साहिदुल और उनकी पत्नी की एक बेटी है, जो इस साल हायर सेकेंडरी की परीक्षा देने वाली है। परिवार की ओर से इसी आधार पर अदालत से राहत की मांग की गई।

दूसरी ओर पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से अदालत में साहिदुल को लेकर अलग दावा पेश किया गया। राज्य के वकील राज मोहन चट्टोराज ने कहा कि साहिदुल ने कथित तौर पर खुद स्वीकार किया था कि वह बांग्लादेशी नागरिक है और कई साल पहले भारत आया था। राज्य की ओर से यह भी दावा किया गया कि साहिदुल ने एक मृत स्थानीय निवासी का बेटा होने का दावा किया और कथित तौर पर भारतीय दस्तावेज हासिल किए। सरकार के अनुसार इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उसका नाम SIR 2026 में शामिल हुआ। हालांकि, ये राज्य सरकार की ओर से अदालत में रखे गए दावे हैं और मामले में जांच अभी जारी है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने सरकार के इस पक्ष पर भी सवाल उठाया कि साहिदुल की कथित स्वीकारोक्ति आखिर किस अधिकारी के सामने हुई थी। अदालत ने यह स्पष्टता मांगी कि क्या यह बयान पुलिस के सामने दिया गया था या FRRO के समक्ष। कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब किसी व्यक्ति को 8 अगस्त से हिरासत में रखा गया है और सितंबर का मध्य आ चुका है, तो अब तक हिरासत का स्पष्ट आधार और संबंधित दस्तावेज क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति के दस्तावेजों को किस आधार पर अवैध माना गया।

इसी दौरान अदालत की टिप्पणी सामने आई कि 1970 और 1980 के दशक में बड़ी संख्या में लोग सीमा पार करके भारत आए थे। न्यायमूर्ति ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में क्या अब हर ऐसे व्यक्ति के खिलाफ इसी तरह कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदर्भ हिरासत की अवधि, कानूनी प्रक्रिया और मानवाधिकारों से जुड़ा था। अदालत ने यह जानना चाहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने की प्रक्रिया क्या है और संबंधित अधिकारियों ने अब तक इसके लिए क्या आधार तैयार किया है।

अदालत ने रानीनगर थाने के प्रभारी अधिकारी को 15 दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें यह बताना होगा कि साहिदुल को किस आधार पर हिरासत में लिया गया और कार्रवाई के पीछे पुलिस के पास क्या सामग्री या जानकारी थी। इसके अलावा मुर्शिदाबाद के पुलिस अधीक्षक को भी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। एसपी इस मामले में FRRO की भूमिका भी निभा रहे हैं। अदालत ने राज्य की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी देने के लिए 10 दिनों की समयसीमा तय की है।

कोर्ट ने साहिदुल के वकील को हिरासत या गिरफ्तारी मेमो उपलब्ध कराने के निर्देश पर राज्य की आपत्ति को भी स्वीकार नहीं किया। राज्य के वकील ने कथित तौर पर Official Secrets Act का हवाला देते हुए मेमो सौंपने पर आपत्ति जताई थी, लेकिन न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अदालत इस मामले में हिरासत की प्रक्रिया और उससे संबंधित रिकॉर्ड को लेकर राज्य से स्पष्ट जवाब चाहती है।

मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह होने की स्थिति में जांच और हिरासत की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ाई जाए। एक तरफ राज्य सरकार का दावा है कि साहिदुल की पहचान और दस्तावेजों को लेकर गंभीर संदेह है और इस संबंध में जांच की जा रही है। दूसरी तरफ साहिदुल का परिवार उन्हें भारतीय नागरिक बता रहा है और उनके पास मौजूद दस्तावेजों को इसका आधार मान रहा है। हाई कोर्ट के सामने फिलहाल दोनों पक्षों के दावे हैं और नागरिकता से जुड़े अंतिम तथ्य जांच तथा आगे की कानूनी प्रक्रिया से स्पष्ट होंगे।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि SIR 2026 में किसी व्यक्ति का नाम कथित तौर पर गलत तरीके से शामिल किया गया है, तो उस प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर सवाल किया कि यदि सरकार का दावा है कि किसी व्यक्ति ने गलत दस्तावेजों के जरिए सूची में अपना नाम शामिल कराया, तो उस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी और सत्यापन की भी पड़ताल क्यों नहीं की गई। अदालत की यह टिप्पणी जांच की पूरी प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय करने के संदर्भ में थी।

राज्य सरकार की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि साहिदुल की हिरासत रानीनगर पुलिस की ओर से मनमाने तरीके से नहीं की गई है, बल्कि FRRO से मिले इनपुट के आधार पर कार्रवाई हुई। सरकार के वकील ने यह तर्क दिया कि पुलिस बिना वजह किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं ले रही है। हालांकि कोर्ट ने इस जवाब के साथ-साथ यह भी जानना चाहा कि हिरासत के इतने समय बाद तक उसके लिए आवश्यक दस्तावेज और कानूनी आधार अदालत या संबंधित व्यक्ति के सामने क्यों नहीं रखा गया।

इस मामले में अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होगी। तब तक पुलिस और राज्य सरकार को अदालत के निर्देश के अनुसार अपनी रिपोर्ट और हलफनामा दाखिल करना होगा। इसके बाद कोर्ट यह देखेगा कि साहिदुल को हिरासत में रखने का आधार क्या था, संबंधित दस्तावेज किस स्थिति में हैं और जांच किस दिशा में आगे बढ़ी है। फिलहाल अदालत ने नागरिकता के अंतिम सवाल पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है, बल्कि हिरासत की प्रक्रिया और उसके कानूनी आधार को लेकर राज्य से जवाब मांगा है।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में नागरिकता, दस्तावेजों के सत्यापन और सीमा पार से आने वाले लोगों को लेकर प्रशासनिक और कानूनी सवाल लगातार चर्चा में हैं। ऐसे मामलों में किसी व्यक्ति को विदेशी नागरिक मानने से पहले दस्तावेजों की जांच, पहचान का सत्यापन और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। इस मामले में भी हाई कोर्ट की सुनवाई का केंद्र यही रहा कि संदेह के आधार पर हिरासत की कार्रवाई किस कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई और संबंधित व्यक्ति को उसके खिलाफ कार्रवाई का आधार कब और किस तरीके से बताया गया। अदालत के अगले आदेश और जांच रिपोर्ट के बाद ही मामले की आगे की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

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