सोमवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर अस्थिरता में कमी और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा हाल ही में उठाए गए नीतिगत कदमों के चलते आने वाले समय में भारतीय रुपये पर दबाव कम हो सकता है।
बिजनेस न्यूज़: भारतीय मुद्रा बाजार के लिए आने वाले महीने राहत भरे साबित हो सकते हैं। एक प्रमुख वित्तीय संस्था की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं में कमी, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सक्रिय नीतियों और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी के कारण भारतीय रुपये पर बना दबाव कम हो सकता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही के दौरान रुपये में मजबूती देखने को मिल सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की भविष्य की मौद्रिक नीतियां इस सुधार की गति को प्रभावित कर सकती हैं।
सितंबर 2026 तक रुपये में सुधार की संभावना
वित्तीय सेवा कंपनी एलारा सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में रह सकता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि इस अवधि में डॉलर-रुपया विनिमय दर 93 से 95 रुपये प्रति डॉलर के दायरे में रह सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि चालू खाते के घाटे पर नियंत्रण, विदेशी पूंजी प्रवाह में वृद्धि और वित्तीय बाजारों में स्थिरता जैसे कारक रुपये को समर्थन प्रदान करेंगे। इसके अलावा, वैश्विक ऊर्जा कीमतों में संतुलन और आयात लागत में कमी भी भारतीय मुद्रा के पक्ष में काम कर सकती है।
RBI के कदमों का दिखने लगा असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल के महीनों में उठाए गए कई कदमों का सकारात्मक प्रभाव मुद्रा बाजार पर दिखाई देने लगा है। केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने, निवेशकों का विश्वास बढ़ाने और विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए कई नीतिगत उपाय लागू किए हैं।विशेष रूप से सरकारी बॉन्ड बाजार में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए कर संबंधी रियायतें और विदेशी निवेशकों के लिए आसान नियमों ने निवेश प्रवाह को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि RBI की यह रणनीति केवल अल्पकालिक स्थिरता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य भारतीय वित्तीय बाजारों को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाना भी है।
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विदेशी निवेश में तेज बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 में लागू किए गए एक महत्वपूर्ण कर सुधार के बाद भारतीय ऋण बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है। सरकार द्वारा कुछ सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश को कर-मुक्त करने के फैसले ने वैश्विक निवेशकों को आकर्षित किया है। नीतिगत बदलाव के बाद केवल दस कारोबारी दिनों के भीतर भारतीय डेट मार्केट में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का प्रवाह उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। इससे न केवल बाजार में तरलता बढ़ी, बल्कि सरकारी बॉन्ड यील्ड पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि भारत को प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में और अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है, तो आने वाले वर्षों में देश में कुल विदेशी निवेश 80 से 85 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
फेडरल रिजर्व बन सकता है चुनौती
हालांकि रुपये के लिए तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित निवेशों के बढ़ते प्रभाव के कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में वृद्धि का रास्ता अपना सकता है। यदि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर रुख कर सकते हैं। इसका असर भारतीय रुपये समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि फेडरल रिजर्व सितंबर 2026, दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 में क्रमशः 25-25 आधार अंकों की दर वृद्धि कर सकता है। ऐसी स्थिति में रुपये की मजबूती सीमित हो सकती है।









