भारत में सस्ती हो सकती है स्कॉच व्हिस्की, अमेरिका को पछाड़ने की तैयारी में भारतीय बाजार

Scotch Whisky Price in India: भारत में स्कॉच व्हिस्की की कीमतें घट सकती हैं। जानें सस्ती शराब की वजह और कैसे भारतीय बाजार अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है।

भारत में प्रीमियम शराब की बढ़ती मांग के चलते स्कॉच व्हिस्की का बाजार लगातार विस्तार कर रहा है। इस रफ्तार को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि भारत स्कॉच व्हिस्की की बिक्री से होने वाली कमाई के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है।

बिजनेस न्यूज़: भारत में प्रीमियम शराब की बढ़ती मांग और भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते के तहत आयात शुल्क में कटौती से स्कॉच व्हिस्की के बाजार को नई गति मिलने की उम्मीद है। इस समझौते के तहत स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत किया गया है। अगले 10 वर्षों में इसे चरणबद्ध तरीके से 40 प्रतिशत तक लाने की योजना है। 

इससे आने वाले समय में भारत में आयातित स्कॉच व्हिस्की की कीमतों पर असर पड़ सकता है। साथ ही, बिक्री से होने वाली कुल कमाई के मामले में भारत अमेरिका को पीछे छोड़ने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। हालांकि, यह बदलाव तत्काल होने की संभावना नहीं है और कीमतों में वास्तविक कमी कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करेगी।

भारत में स्कॉच व्हिस्की की मांग लगातार बढ़ रही है

भारत दुनिया में व्हिस्की की खपत के सबसे बड़े बाजारों में शामिल है। यहां बढ़ती आय, शहरीकरण और प्रीमियम उत्पादों में बढ़ती दिलचस्पी के कारण महंगी शराब की मांग में भी इजाफा हो रहा है। स्कॉच व्हिस्की, जो स्कॉटलैंड में बनाई जाती है, भारतीय उपभोक्ताओं के बीच अपनी पहचान मजबूत कर रही है।स्कॉच व्हिस्की एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में ब्रिटेन से भारत को स्कॉच व्हिस्की का निर्यात लगभग 286 मिलियन पाउंड रहा, जिसकी भारतीय मुद्रा में कीमत करीब 3,614 करोड़ रुपये बताई गई। मात्रा के आधार पर भारत स्कॉच व्हिस्की का दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि, बिक्री के कुल मूल्य के लिहाज से अमेरिका और फ्रांस जैसे बाजार अभी भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

यही वजह है कि भारत को भविष्य में स्कॉच व्हिस्की की बिक्री से होने वाली कमाई के मामले में अमेरिका से आगे निकलने की संभावना के तौर पर देखा जा रहा है। इसके लिए केवल खपत बढ़ना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि प्रीमियम उत्पादों की बिक्री और ग्राहकों की खर्च करने की क्षमता भी अहम भूमिका निभाएगी।

आयात शुल्क 150% से घटकर 75% हुआ

भारत में सस्ती हो सकती है स्कॉच व्हिस्की, अमेरिका को पछाड़ने की तैयारी में भारतीय बाजार

भारत और ब्रिटेन के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते के तहत स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती की गई है। पहले यह शुल्क 150 प्रतिशत था, जिसे घटाकर 75 प्रतिशत किया गया है। आगे चलकर अगले 10 वर्षों में इसे 40 प्रतिशत तक लाने की योजना है। आयात शुल्क में कमी से विदेशी उत्पादों को भारतीय बाजार में उपलब्ध कराने की लागत कम हो सकती है। इसका फायदा आयातकों, वितरकों और उपभोक्ताओं तक पहुंचने की संभावना है। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि शुल्क में 50 प्रतिशत की कटौती होने पर खुदरा कीमत भी उतनी ही घट जाए।

भारत में शराब की कीमतों पर राज्य सरकारों के कर, परिवहन, भंडारण, वितरण लागत और खुदरा विक्रेताओं का मार्जिन भी असर डालते हैं। इसलिए अलग-अलग राज्यों में एक ही ब्रांड की कीमत अलग हो सकती है। ग्राहकों को वास्तविक राहत कितनी मिलेगी, यह कंपनियों की मूल्य निर्धारण रणनीति और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

प्रीमियम व्हिस्की की कीमतों में कितनी कमी संभव?

उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, आयात शुल्क में कटौती के बाद कुछ प्रीमियम स्कॉच व्हिस्की की कीमतों में लगभग 7 से 10 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। हालांकि, इसे सभी ब्रांडों और सभी राज्यों पर लागू होने वाली निश्चित कटौती नहीं माना जाना चाहिए। यदि कीमतों में कमी होती है, तो ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ सकती है जो पहले ऊंची कीमतों के कारण आयातित प्रीमियम व्हिस्की खरीदने से बचते थे। इससे विदेशी ब्रांडों को भारतीय बाजार में अपनी पहुंच बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

दूसरी ओर, कीमतों में संभावित बदलाव का असर स्थानीय व्हिस्की निर्माताओं पर भी पड़ सकता है। घरेलू कंपनियों को गुणवत्ता, ब्रांडिंग और कीमत के आधार पर प्रतिस्पर्धा मजबूत करनी पड़ सकती है।

व्हिस्की कारोबार में निवेश बढ़ने की उम्मीद

भारत में मांग बढ़ने और आयात शुल्क घटने से कंपनियां स्थानीय बॉटलिंग, गोदामों, वितरण नेटवर्क और अन्य व्यावसायिक सुविधाओं में निवेश बढ़ाने पर विचार कर सकती हैं। इससे आयातकों, वितरकों और खुदरा कारोबार से जुड़े व्यवसायों को नए अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, शराब कारोबार में राज्यों के अलग-अलग नियम और कर व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लाइसेंसिंग, बिक्री और वितरण से संबंधित स्थानीय नीतियां भी बाजार की वृद्धि को प्रभावित कर सकती हैं।

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