ईरान और अमेरिका ने जेनेवा वार्ता के दौरान न्यूक्लियर डील के लिए गाइडिंग प्रिंसिपल्स पर सहमति जताई है। दोनों पक्षों ने इसे शुरुआती प्रगति बताया है, हालांकि अंतिम समझौते तक पहुंचने से पहले कई तकनीकी और राजनीतिक मुद्दे सुलझाने बाकी हैं।
वाशिंगटन: ईरान और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर डील को लेकर एक अहम प्रगति सामने आई है। दोनों देशों के वार्ताकारों ने तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर दूसरे दौर की बातचीत के दौरान एक संभावित समझौते के लिए ‘गाइडिंग प्रिंसिपल्स’ पर सहमति जताई है। इस सहमति के साथ ही अगले दौर की वार्ता की दिशा तय हो गई है। हालांकि दोनों पक्षों ने साफ किया है कि अंतिम समझौते तक पहुंचना अभी आसान नहीं होगा।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने जेनेवा में राज्य टीवी से बातचीत में कहा कि दोनों पक्ष एक सेट ऑफ गाइडिंग प्रिंसिपल्स पर सामान्य समझ तक पहुंचने में सफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर अब आगे संभावित समझौते का मसौदा तैयार किया जाएगा। अराघची ने यह भी स्पष्ट किया कि यह शुरुआती सफलता है और इसका मतलब यह नहीं है कि जल्द ही अंतिम डील हो जाएगी, लेकिन कम से कम बातचीत का रास्ता अब औपचारिक रूप से शुरू हो चुका है।
जेनेवा वार्ता के बाद आगे की रणनीति
जेनेवा में हुई इस बैठक को दोनों देशों ने सकारात्मक बताया है। इससे पहले ओमान में अप्रत्यक्ष बातचीत का दौर चला था, जिसके बाद यह सीधी वार्ता हुई। एक अमेरिकी अधिकारी ने भी माना कि बातचीत में प्रगति हुई है, लेकिन अभी कई तकनीकी और राजनीतिक विवरणों पर चर्चा बाकी है।
सूत्रों के अनुसार ईरान अगले दो हफ्तों में एक विस्तृत प्रस्ताव पेश कर सकता है। इसका उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच मौजूद मतभेदों को कम करना होगा। अभी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर स्पष्ट सहमति बनना बाकी है।
एटॉमिक प्रोग्राम खत्म करना ‘रेड लाइन्स’
अमेरिकी राष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ शब्दों में कहा है कि ईरान के एटॉमिक प्रोग्राम को समाप्त करना अमेरिका की ‘रेड लाइन्स’ में शामिल है। उन्होंने फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि कुछ मायनों में बातचीत अच्छी रही, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने कुछ लाल रेखाएं तय की हैं, जिन्हें ईरान अभी स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
वेंस ने कहा कि अमेरिका की प्राथमिक रुचि यह सुनिश्चित करना है कि ईरान को परमाणु हथियार न मिले। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सब कुछ टेबल पर है। उनके मुताबिक अमेरिका के पास मजबूत सेना और प्रभावी कूटनीतिक टीम दोनों हैं। उन्होंने संकेत दिया कि अगर कूटनीति अपनी सीमा तक पहुंच जाती है, तो आगे का फैसला राष्ट्रपति के हाथ में होगा।

ट्रंप प्रशासन की शर्तें
ट्रंप प्रशासन चाहता है कि यह वार्ता केवल न्यूक्लियर प्रोग्राम तक सीमित न रहे। अमेरिका चाहता है कि इसमें ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम और विरोधी-शासन प्रदर्शनकारियों के साथ उसका व्यवहार भी शामिल हो। हालांकि तेहरान ने इन मुद्दों को बातचीत से बाहर रखने पर जोर दिया है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि संभावित समझौता ऐसा होना चाहिए जिसमें कोई परमाणु हथियार न हो, कोई मिसाइल खतरा न हो और ऐसी कोई गतिविधि न हो जो क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचाए। उन्होंने दोहराया कि अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता यह है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न करे।
अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुश्नर इस वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका उद्देश्य एक व्यापक समझौता तैयार करना है जो सिर्फ न्यूक्लियर मुद्दे तक सीमित न हो।
कूटनीति बनाम सैन्य विकल्प
जेडी वेंस ने यह भी कहा कि अमेरिका कूटनीतिक रास्ता अपनाना चाहता है, लेकिन यदि जरूरत पड़ी तो सैन्य विकल्प भी खुला है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने पहले भी सेना के इस्तेमाल की इच्छा दिखाई है और आवश्यकता पड़ने पर वह निर्णय ले सकते हैं।
वेंस के बयान को ईरान के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि हालात उस बिंदु तक पहुंचें जहां कूटनीति विफल हो जाए, लेकिन यदि ऐसा होता है तो आगे की रणनीति राष्ट्रपति तय करेंगे।
खामेनेई की चेतावनी
दूसरी ओर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और नौसेना की गतिविधियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दुनिया की सबसे मजबूत सेना को भी ऐसा थप्पड़ मारा जा सकता है कि वह उठ न पाए।
खामेनेई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अमेरिकी युद्धपोतों को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि युद्धपोत खतरनाक सैन्य उपकरण हो सकता है, लेकिन उससे भी खतरनाक वह हथियार है जो उसे समुद्र की तलहटी में भेज सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में अभ्यास
ईरान ने हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य, फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में सैन्य अभ्यास किए हैं। इन अभ्यासों के दौरान ईरान ने दावा किया कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य के कुछ हिस्सों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। यह क्षेत्र वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक बाजार पर असर डाल सकता है।








