G7 समिट के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अहम मुलाकात हुई। ट्रम्प ने मोदी को मजबूत और कूल नेता बताया और समर्थन का भरोसा दिया। मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा और होर्मुज स्ट्रेट खोलने की बात उठाई।
नई दिल्ली/पेरिस: फ्रांस के एवियन में आयोजित 52वें G7 शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन वैश्विक राजनीति में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए। इस दौरान भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi और अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित किया।
बैठक में समुद्री सुरक्षा, वैश्विक व्यापार मार्गों की स्थिरता, पश्चिम एशिया संकट और हाल ही में अमेरिका-ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की नीतियों और नेतृत्व की सराहना भी की, जिससे भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए।
ट्रम्प की मोदी पर टिप्पणी: दोस्ती और समर्थन का संदेश
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने G7 के दौरान कई सार्वजनिक बयानों में प्रधानमंत्री मोदी को “शांत, कूल और मजबूत नेता” बताया। उन्होंने कहा कि जब तक वे राष्ट्रपति हैं, व्हाइट हाउस में भारत का एक मजबूत मित्र मौजूद रहेगा। ट्रम्प ने यह भी कहा कि यदि भारत या प्रधानमंत्री मोदी पर किसी प्रकार का हमला होता है, तो अमेरिका सहयोग के लिए तैयार रहेगा।
हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनकी शैली मोदी से अलग है, लेकिन दोनों के बीच आपसी सम्मान और दोस्ताना संबंध लंबे समय से कायम हैं। ट्रम्प के इन बयानों को भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था कई क्षेत्रों में अस्थिरता का सामना कर रही है।
मोदी का फोकस: समुद्री सुरक्षा और होर्मुज स्ट्रेट की स्थिरता
दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने G7 समिट में वैश्विक समुद्री मार्गों की सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक जलमार्गों में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना वैश्विक जिम्मेदारी है।
मोदी ने बताया कि इस क्षेत्र में कई भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है, जो वैश्विक व्यापार व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला पर पश्चिम एशिया संकट का गहरा प्रभाव पड़ रहा है, जिसका असर विकासशील देशों पर अधिक पड़ता है।
पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
G7 समिट के दौरान पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उसके वैश्विक प्रभावों पर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस संकट के कारण ईंधन, खाद्य और उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है, जिसका असर विशेष रूप से ग्लोबल साउथ देशों पर लंबे समय तक रहेगा।
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उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया को कमजोर देशों पर संकट का बोझ साझा रूप से डालना चाहिए, न कि उन्हें अकेले इस दबाव का सामना करने देना चाहिए। मोदी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी ही इस तरह के वैश्विक संकटों का समाधान है।
अमेरिका-ईरान समझौते पर G7 का समर्थन
G7 नेताओं ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया अंतरिम समझौते का स्वागत किया। समूह ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। इस समझौते को लेकर ट्रम्प प्रशासन की भूमिका की भी सराहना की गई।
G7 नेताओं ने कहा कि यह समझौता ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने और क्षेत्रीय तनाव कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि इस समझौते का दीर्घकालिक प्रभाव इसके कार्यान्वयन और क्षेत्रीय देशों के सहयोग पर निर्भर करेगा।
यूरोपीय नेताओं के साथ मोदी की कूटनीतिक बैठकें
G7 समिट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कई वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। इनमें यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष Antonio Costa और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष Ursula von der Leyen के साथ हुई बातचीत शामिल रही। इन बैठकों में व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, सर्कुलर इकॉनमी, रक्षा सहयोग और तकनीकी साझेदारी जैसे क्षेत्रों पर विस्तार से चर्चा हुई।
दोनों पक्षों ने आपसी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इसके अलावा मोदी ने जर्मनी के चांसलर Friedrich Merz के साथ भी बातचीत की, जिसमें औद्योगिक विकास, तकनीकी साझेदारी और हरित ऊर्जा जैसे विषय प्रमुख रहे।
ट्रम्प के बयान और G7 में माहौल
G7 समिट के दौरान राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा कि “मैं बॉस हूं”, जिससे माहौल हल्का-फुल्का हो गया और अन्य नेता मुस्कुराते नजर आए। इस तरह के बयानों के बावजूद, समिट का मुख्य फोकस वैश्विक सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा संकट पर रहा।
ट्रम्प ने पूर्व अमेरिकी प्रशासन की ईरान नीति की आलोचना करते हुए कहा कि पहले किए गए समझौतों ने ईरान को आर्थिक लाभ दिया, जो अमेरिका के हित में नहीं था।









