दिवाली से पहले ग्रीन पटाखों को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की दो प्रमुख संस्थाओं CSIR-NEERI और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की राय अलग-अलग सामने आई है।
Green Crackers: दिवाली से पहले भारत में ग्रीन पटाखों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कम प्रदूषण वाले पटाखों को बढ़ावा देने की कोशिश के बीच केंद्र सरकार की दो प्रमुख वैज्ञानिक एवं पर्यावरण संस्थाओं—CSIR-NEERI और CPCB—की राय में अंतर सामने आया है। CSIR-NEERI ने कुछ नई पटाखा फॉर्मूलेशन को व्यावसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त बताया है, लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने इनमें बोरियम नाइट्रेट के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है।
मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। केंद्र सरकार ने अदालत को बताया है कि नए फॉर्मूले से होने वाले उत्सर्जन और बोरियम के संभावित प्रभावों का दोबारा वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा। इसके लिए दिल्ली, भोपाल, कोलकाता और चेन्नई में परीक्षण किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में दिवाली से पहले नए फॉर्मूले वाले पटाखों के बड़े पैमाने पर उत्पादन को लेकर अंतिम स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
ग्रीन पटाखों का पूरा मामला क्या है?
भारत में ग्रीन पटाखों की अवधारणा का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों की तुलना में वायु प्रदूषण और हानिकारक उत्सर्जन को कम करना है। केंद्र सरकार ने CSIR-NEERI को ऐसी फॉर्मूलेशन विकसित करने का निर्देश दिया था, जिससे पटाखों से निकलने वाले पार्टिकुलेट मैटर यानी PM उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी लाई जा सके।
पटाखा निर्माताओं के साथ मिलकर कुछ नई फॉर्मूलेशन तैयार की गईं। NEERI के अनुसार, इनसे PM10 और PM2.5 के उत्सर्जन में करीब 45 से 60 फीसदी तक कमी दर्ज की गई। इन फॉर्मूलों को फुलझड़ी, अनार, चकरी, पेंसिल और ट्विंकलिंग स्टार जैसे विभिन्न प्रकार के पटाखों के लिए व्यावसायिक उत्पादन के लिहाज से उपयुक्त बताया गया है।
CPCB को बोरियम के इस्तेमाल पर आपत्ति
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विवाद का सबसे अहम बिंदु बोरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल है। CPCB की ओर से इस पर सवाल उठाए गए हैं। बोर्ड का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों में पटाखों में बोरियम साल्ट के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट प्रतिबंधात्मक रुख अपनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2018 के अपने आदेश में पटाखों से जुड़े प्रदूषण को कम करने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए थे।
बाद के आदेशों में भी ग्रीन पटाखों के निर्माण में प्रतिबंधित पदार्थों के इस्तेमाल को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई। यही वजह है कि नई फॉर्मूलेशन में बोरियम की मौजूदगी ने वैज्ञानिक मूल्यांकन और कानूनी अनुमति के बीच नया विवाद खड़ा कर दिया है।
केंद्र सरकार फिर कराएगी वैज्ञानिक जांच
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से बताया गया है कि बोरियम से जुड़े संभावित स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों तथा नई ग्रीन पटाखा फॉर्मूलेशन से होने वाले उत्सर्जन की दोबारा जांच की जाएगी। देश के चार प्रमुख शहरों—दिल्ली, भोपाल, कोलकाता और चेन्नई—में परीक्षण की योजना है। इन परीक्षणों के नतीजे यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं कि नई फॉर्मूलेशन वास्तव में मौजूदा पर्यावरणीय और कानूनी मानकों पर खरी उतरती है या नहीं। इस जांच के बाद ही नए फॉर्मूले वाले पटाखों के व्यावसायिक उत्पादन और इस्तेमाल को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।
लड़ी वाले पटाखों पर भी उठे सवाल
विवाद सिर्फ बोरियम तक सीमित नहीं है। लड़ी या जुड़े हुए पटाखों को लेकर भी कानूनी और पर्यावरणीय सवाल सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, CSIR-NEERI ने कुछ परिस्थितियों में लड़ी वाले पटाखों के उत्पादन की अनुमति देने की सिफारिश की है। दावा है कि प्रस्तावित फॉर्मूलेशन से PM उत्सर्जन में करीब 30 फीसदी और ठोस कचरे में लगभग 32 फीसदी तक कमी हो सकती है।
लेकिन यहां भी सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश महत्वपूर्ण हो जाते हैं। 2018 में अदालत ने पटाखों की लड़ी या सीरीज के निर्माण, बिक्री और इस्तेमाल पर रोक लगाई थी। इसलिए नई वैज्ञानिक फॉर्मूलेशन को लागू करने से पहले उसके कानूनी पक्ष पर भी विचार जरूरी होगा।









