भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 में हुई प्रत्यर्पण संधि अब सुर्खियों में है। बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और अन्य आरोपियों को ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ का दोषी पाते हुए सजा सुनाई है।
INDIA-BANGLADESH EXTRADITION TREATY: भारत को बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को प्रत्यर्पित करने के मामले में एक महत्वपूर्ण 'कुंजी' मिल गई है। भारत बांग्लादेश की इस मांग को ठुकरा सकता है। भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 में हुई प्रत्यर्पण संधि में ऐसी दो अचूक धाराएँ हैं, जिनके आधार पर भारत साफ तौर पर हसीना को प्रत्यर्पित न करने का निर्णय ले सकता है। बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने शेख हसीना को ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ का दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई है।
इसी फैसले में पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा मिली, जबकि तीसरे आरोपी पूर्व IG पुलिस चौधरी अब्दुल्ला अल-ममून को 5 साल की सजा दी गई। शेख हसीना ने 5 अगस्त 2024 को पद से इस्तीफा देकर बांग्लादेश छोड़ दिया था और पिछले 15 महीनों से दिल्ली के एक सेफ हाउस में रह रही हैं। अब बांग्लादेश भारत से हसीना को सौंपने की मांग कर रहा है।
भारत के पास दो कानूनी हथियार
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत से कहा कि शेख हसीना और अन्य दोषियों को तुरंत बांग्लादेश को सौंपा जाए। उनका कहना है कि यह मानवता के खिलाफ अपराधों के दोषियों को शरण देने का गंभीर उल्लंघन होगा। वहीं, भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत एक निकट पड़ोसी और मित्र देश होने के नाते बांग्लादेश के लोगों के सर्वोत्तम हितों के लिए प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत हमेशा शांति, लोकतंत्र, समावेशिता और स्थिरता के हित में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा।
लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जे.एस. सोढ़ी, जो भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश और चीन के मामलों के विशेषज्ञ हैं, के अनुसार भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 में हुई प्रत्यर्पण संधि में धारा 6 और धारा 8 भारत के लिए निर्णायक ‘हथियार’ हैं। इन धाराओं के तहत भारत शेख हसीना को प्रत्यर्पित करने से इनकार कर सकता है।
धारा 6: राजनीतिक अपराध का अपवाद
धारा 6 के अनुसार, यदि जिस अपराध के लिए प्रत्यर्पण की मांग की गई है वह राजनीतिक प्रकृति का अपराध है, तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है।हालांकि, इसके उपधारा 2 में कुछ अपराधों को राजनीतिक अपराध नहीं माना गया है, जैसे:
- गैर इरादतन हत्या
- जीवन को खतरे में डालने या संपत्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाने वाला विस्फोट
- आग्नेयास्त्र या गोला-बारूद रखना, जिससे जीवन या संपत्ति को गंभीर क्षति होने की संभावना हो
- आतंकवाद से संबंधित अन्य अपराध
विशेषज्ञों का मानना है कि शेख हसीना को फांसी की सजा दिए जाने का निर्णय भले ही राजनीतिक दबाव में लिया गया हो, लेकिन कानूनी रूप से उन्हें अपने पक्ष का सुनवाई का अधिकार मिलना अनिवार्य है।
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धारा 7: न्यायिक प्रक्रिया का अपवाद
धारा 7 के तहत, यदि प्रत्यर्पण मांगने वाले देश के न्यायालय में उसी अपराध के लिए मुकदमा चल रहा है, तो अनुरोध प्राप्तकर्ता देश प्रत्यर्पण अस्वीकार कर सकता है। इसका मतलब यह है कि भारत बांग्लादेश की अदालत द्वारा लिए गए फैसले के बावजूद शेख हसीना को बिना कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई के सौंपने से इनकार कर सकता है। भारत यह मामला अपने सक्षम प्राधिकरण के सामने रखेगा और उसी आधार पर निर्णय करेगा।
धारा 8: अन्याय या दमन का जोखिम
धारा 8 के अनुसार, किसी व्यक्ति का प्रत्यर्पण नहीं किया जा सकता यदि भारत यह मानता है कि:
- प्रत्यर्पण अन्यायपूर्ण या दमनकारी होगा
- आरोपित अपराध का स्वरूप मामूली है या समय बीत चुका है
- अभियोजन न्याय के हित में उचित नहीं है
- आरोप सैन्य अपराध हैं, जो सामान्य कानून के तहत अपराध नहीं हैं
इस धारा के तहत शेख हसीना को प्रत्यर्पित करना कानूनी और नैतिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण होगा। शेख हसीना ने 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में अपने पद से इस्तीफा दिया और पिछले 15 महीनों से भारत में दिल्ली के एक सुरक्षित आवास (सेफ हाउस) में रह रही हैं।









