बीमा नियामक IRDAI ने इंश्योरेंस कंपनियों के लिए नया मास्टर सर्कुलर जारी किया है। बड़ी हिस्सेदारी के शेयर ट्रांसफर की मंजूरी फीस 50 लाख से घटाकर 10 लाख रुपये कर दी गई है। IPO, ESOP और मर्जर को लेकर भी नियम स्पष्ट किए गए हैं।
बिजनेस न्यूज़: देश की इंश्योरेंस कंपनियों के लिए बीमा नियामक IRDAI ने बड़ा फैसला लिया है। अब कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी के शेयर ट्रांसफर की मंजूरी लेना पहले के मुकाबले सस्ता होगा। भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने इस प्रक्रिया में लगने वाली अधिकतम फीस को 50 लाख रुपये से घटाकर 10 लाख रुपये कर दिया है। इसके अलावा शेयर बाजार में लिस्टिंग, कर्मचारियों को शेयर देने और बीमा कंपनियों के आपसी मर्जर से जुड़े नियम भी स्पष्ट किए गए हैं।
अब शेयर ट्रांसफर की मंजूरी पर लगेंगे 10 लाख रुपये
IRDAI ने सोमवार, 2 नवंबर 2026 को नया मास्टर सर्कुलर जारी किया। इसमें इंश्योरेंस कंपनियों के रजिस्ट्रेशन, शेयरहोल्डिंग, पूंजी जुटाने और मर्जर से जुड़े कई प्रावधान शामिल किए गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव शेयर ट्रांसफर की मंजूरी फीस में हुआ है। पहले किसी बीमा कंपनी की पेड-अप इक्विटी कैपिटल में 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी ट्रांसफर करने की मंजूरी के लिए 50 लाख रुपये की प्रोसेसिंग फीस लगती थी। अब इसे घटाकर 10 लाख रुपये कर दिया गया है।
इस तरह कंपनियों को एक आवेदन पर 40 लाख रुपये की बचत होगी। हालांकि, यह कटौती बड़ी हिस्सेदारी के ट्रांसफर पर लागू होने वाली विशेष फीस में की गई है। दूसरे सामान्य शेयर ट्रांसफर आवेदनों के लिए निर्धारित फीस अलग है। नियामक ने यह भी साफ किया है कि नए नियम लागू होने से पहले जमा की गई फीस वापस नहीं मिलेगी। वहीं, पुराने नियमों के तहत पहले से जमा कुछ नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) आवेदनों को नई प्रोसेसिंग फीस से छूट मिलेगी।
IPO लाने वाली कंपनियों को देनी होगी पूरी जानकारी
IRDAI ने शेयर बाजार में उतरने की तैयारी कर रही इंश्योरेंस कंपनियों के लिए भी जरूरी शर्तें तय की हैं। अब किसी कंपनी को IPO लाने से पहले अपनी मौजूदा शेयरहोल्डिंग और लिस्टिंग के बाद होने वाले बदलाव की जानकारी नियामक को देनी होगी। जिन निवेशकों के पास कंपनी की पेड-अप इक्विटी का एक फीसदी से ज्यादा हिस्सा है, उनका विवरण अलग से देना होगा। कंपनी को यह भी बताना होगा कि वह IPO क्यों ला रही है और उससे कितनी रकम जुटाने की योजना है।
अगर IPO में नए शेयर जारी किए जाएंगे या पुराने निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे, तो दोनों की जानकारी अलग-अलग देनी होगी। इसके अलावा कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर या CEO को लिखित घोषणा करनी होगी कि IPO से जुड़े दस्तावेजों में दी गई जानकारी सही है और जरूरी कानूनी नियमों का पालन किया गया है। इसमें पॉलिसीधारकों के हितों की सुरक्षा का भरोसा भी शामिल होगा।
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ESOP के जरिए ज्यादा शेयर लेने पर जरूरी होगी मंजूरी
इंश्योरेंस कंपनियां अपने कर्मचारियों को ESOP यानी Employee Stock Option Plan के जरिए शेयर खरीदने का मौका देती हैं। इसका मकसद कर्मचारियों को कंपनी की हिस्सेदारी से जोड़ना होता है। नए सर्कुलर में इस प्रक्रिया पर भी निगरानी बढ़ाई गई है। अगर कंपनी के डायरेक्टर या बड़े अधिकारी ESOP के जरिए निर्धारित सीमा से ज्यादा शेयर हासिल करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले IRDAI से मंजूरी लेनी होगी।
यह नियम उन मामलों में भी लागू होगा, जहां कर्मचारियों को शेयर देने के लिए अलग ट्रस्ट बनाया गया है। शेयर बाजार में पहले से लिस्टेड इंश्योरेंस कंपनियों को भी शेयरहोल्डिंग में बदलाव पर नजर रखनी होगी। इसके लिए स्टॉक एक्सचेंज और डिपॉजिटरी के साथ जरूरी व्यवस्था करनी होगी।
बीमा कंपनियों के मर्जर में भी बढ़ेगी निगरानी
IRDAI ने दो बीमा कंपनियों के मर्जर और कारोबार के ट्रांसफर से जुड़े नियमों में भी जरूरी प्रावधान किए हैं। अब मर्जर की योजना बना रही कंपनियों को अपनी वित्तीय स्थिति और प्रस्तावित सौदे से जुड़े दस्तावेज देने होंगे। इसके साथ एक स्वतंत्र एक्चुअरी की रिपोर्ट भी जरूरी होगी। एक्चुअरी बीमा कारोबार से जुड़े वित्तीय जोखिमों और देनदारियों का आकलन करने वाला विशेषज्ञ होता है।
उसकी रिपोर्ट में बताया जाएगा कि मर्जर के बाद कंपनी की आर्थिक स्थिति, बीमा उत्पादों की कीमत और भविष्य में दावों का भुगतान करने की क्षमता पर क्या असर पड़ेगा। रिपोर्ट तैयार करने वाला विशेषज्ञ पिछले पांच वर्षों में मर्जर में शामिल किसी भी कंपनी से पेशेवर रूप से जुड़ा नहीं होना चाहिए।









