राजस्थान के झुंझुनूं जिले के युवा वैज्ञानिक रजत दाधीच ने कैंसर इलाज के लिए नई स्मार्ट ड्रग डिलीवरी तकनीक विकसित की है। दावा है कि इससे कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट कम होंगे और ट्यूमर का लक्षित उपचार संभव होगा।
झुंझुनू: राजस्थान के झुंझुनूं जिले के बुडाना गांव के युवा वैज्ञानिक रजत दाधीच ने कैंसर के इलाज के क्षेत्र में एक नई स्वदेशी तकनीक विकसित करने का दावा किया है। यह शोध विशेष रूप से ओरल कैंसर (मुंह के कैंसर) के उपचार को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने पर केंद्रित है।
वैज्ञानिक का दावा है कि उनकी विकसित की गई “स्मार्ट ड्रग डिलीवरी सिस्टम” तकनीक पारंपरिक कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम कर सकती है और ट्यूमर पर अधिक सटीक तरीके से दवा पहुंचा सकती है।
कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों से राहत का दावा
परंपरागत कैंसर उपचार में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी में दवाएं पूरे शरीर में फैल जाती हैं, जिससे स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं। इसके परिणामस्वरूप मरीजों को बाल झड़ना, उल्टी, कमजोरी और अन्य गंभीर दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है।
रजत दाधीच के अनुसार, उनकी नई तकनीक में दवा केवल ट्यूमर वाली जगह पर ही प्रभाव डालती है, जिससे शरीर के अन्य हिस्से सुरक्षित रहते हैं। इससे इलाज अधिक लक्षित और कम हानिकारक हो सकता है।
3D ट्यूमर मॉडल और नैनो टेक्नोलॉजी का उपयोग
इस शोध को विकसित करने के लिए वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में रेशम आधारित 3D ट्यूमर मॉडल तैयार किया, जिसमें कैंसर कोशिकाओं को वास्तविक परिस्थितियों जैसी स्थितियों में विकसित किया गया।
इसके साथ ही उन्होंने जिलेटिन आधारित माइक्रोजेल तैयार किए, जिनमें कैंसर की दवा डॉक्सोरूबिसिन को लोड किया गया। ये माइक्रोजेल शरीर में पहुंचकर धीरे-धीरे दवा छोड़ते हैं, जिससे उपचार अधिक नियंत्रित और प्रभावी बनता है।
इस प्रक्रिया में नैनो टेक्नोलॉजी और बायोमटेरियल्स इंजीनियरिंग का उपयोग किया गया है, जिससे यह शोध आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की उन्नत तकनीकों से जुड़ता है।
शरीर में खुद घुल जाने वाली बायोडिग्रेडेबल तकनीक
इस तकनीक की एक खास विशेषता यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले माइक्रोजेल पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल हैं। यानी वे शरीर में अपना काम पूरा करने के बाद स्वयं ही घुल जाते हैं और उन्हें बाहर निकालने के लिए किसी अतिरिक्त प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती।
वैज्ञानिक के अनुसार, यह सिस्टम कैंसर कोशिकाओं के डीएनए को प्रभावित करता है, जिससे वे स्वयं नष्ट हो जाती हैं, जबकि आसपास की स्वस्थ कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध को मिली पहचान
यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल ACS Biomaterials Science and Engineering (2026) में प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा वैज्ञानिक के शोध पत्रों को Google Scholar पर 36 से अधिक साइटेशन मिल चुके हैं।

रजत दाधीच वर्तमान में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी के सेंटर फॉर नैनोटेक्नोलॉजी में प्रोफेसर बिमान बी. मंडल के मार्गदर्शन में पीएचडी रिसर्च कर रहे हैं।
ग्रामीण पृष्ठभूमि से IIT गुवाहाटी तक का सफर
झुंझुनूं के बुडाना गांव से आने वाले रजत दाधीच ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद VIT वेल्लोर से M.Sc. एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद उन्हें भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से इंस्पायर फैलोशिप मिली, जिसके तहत वे IIT गुवाहाटी में रिसर्च कर रहे हैं।
उनके पिता एक निजी स्कूल में शिक्षक हैं और परिवार ने उनकी इस उपलब्धि पर गर्व जताया है।
अन्य चिकित्सा शोधों पर भी काम जारी
कैंसर उपचार तकनीक के अलावा रजत दाधीच घाव भरने वाली ऑक्सीजनेटिंग स्प्रे और स्किन रिपेयरिंग तकनीक पर भी काम कर रहे हैं। उनका उद्देश्य सस्ती और प्रभावी चिकित्सा तकनीकों का विकास करना है, जो आम लोगों तक आसानी से पहुंच सकें।
भारत में बढ़ते ओरल कैंसर मामलों पर फोकस
वैज्ञानिक का कहना है कि भारत में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में तंबाकू सेवन के कारण ओरल कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में यह तकनीक भविष्य में सस्ता और प्रभावी इलाज प्रदान कर सकती है।
उनका दावा है कि यह तकनीक न केवल ओरल कैंसर बल्कि अन्य प्रकार के ट्यूमर के इलाज में भी उपयोगी साबित हो सकती है।
अभी रिसर्च शुरुआती चरण में
इस तकनीक को लेकर वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह अभी प्री-क्लिनिकल और रिसर्च स्टेज में है। लैब परीक्षणों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, लेकिन अभी इसे पशु परीक्षण (Animal Testing), सुरक्षा मूल्यांकन और क्लिनिकल ट्रायल्स से गुजरना होगा।
फिलहाल इसे किसी सरकारी योजना या बड़े प्रोजेक्ट में शामिल नहीं किया गया है, लेकिन भविष्य में इसके विस्तार की संभावनाएं देखी जा रही हैं।
लागत और उपलब्धता पर अध्ययन जारी
इस तकनीक की अनुमानित लागत अभी तय नहीं की गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले बायोमटेरियल्स और निर्माण प्रक्रिया बड़े स्तर पर स्केलेबल हो सकती है, जिससे भविष्य में यह अपेक्षाकृत सस्ता इलाज विकल्प बन सकता है।
क्लिनिकल ट्रायल्स के बाद ही इसकी वास्तविक लागत और उपलब्धता पर स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।











