कारगिल विजय की अनसुनी दास्तान: 18 हजार फीट की ऊंचाई पर साहस, रणनीति और तिरंगे की ऐतिहासिक जीत

कारगिल विजय दिवस पर पूर्व सैनिकों ने 1999 के युद्ध के साहस, रणनीति और बलिदान की अनसुनी कहानियां साझा कीं। कठिन हालात में भारतीय सेना ने ऐतिहासिक जीत हासिल की।

कारगिल विजय दिवस पर वीरो की धरती कहे जाने वाले झुंझुनूं जिले के दो पूर्व सैनिकों ने 1999 के युद्ध के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कठिन पहाड़ी लड़ाई, सीमित संसाधनों, साहस, सैन्य रणनीति और साथियों के बलिदान को याद करते हुए कहा कि युद्धभूमि पर सबसे ऊपर केवल राष्ट्र की रक्षा का संकल्प होता है।

झुंझुनूं: कारगिल विजय दिवस के 27 वर्ष पूरे होने पर राजस्थान के झुंझुनूं जिले के दो पूर्व सैनिकों ने 1999 के कारगिल युद्ध से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। 22 ग्रेनेडियर्स के सेवानिवृत्त ऑनरेरी कैप्टन टीपू सुलतान खान और सेवानिवृत्त नायब सूबेदार जंगशेर खान ने बताया कि कारगिल की बर्फीली चोटियों पर लड़ी गई लड़ाई केवल सैन्य अभियान नहीं थी, बल्कि साहस, अनुशासन, रणनीति और राष्ट्र के प्रति समर्पण की मिसाल थी। उन्होंने कहा कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों ने अपने कर्तव्य से पीछे हटने का विचार नहीं किया और अंततः दुश्मन के कब्जे वाली रणनीतिक चोटियों पर तिरंगा फहराया।

कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लड़ी गई निर्णायक लड़ाई

पूर्व सैनिकों ने बताया कि युद्ध के दौरान भारतीय सेना को लगभग 18 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद दुश्मन की मजबूत चौकियों तक पहुंचना पड़ा। दुश्मन ऊंचाई पर होने के कारण सामरिक रूप से मजबूत स्थिति में था, जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे से चढ़ाई करते हुए आगे बढ़ना पड़ रहा था। हर जवान के कंधे पर लगभग 50 किलोग्राम का सैन्य सामान था और सीमित संसाधनों के बीच लगातार आगे बढ़ना पड़ता था। कम तापमान, बर्फीली हवाएं और दुर्गम पहाड़ियां इस अभियान को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना रही थीं।

सैन्य रणनीति और मनोवैज्ञानिक बढ़त

पूर्व सैनिकों के अनुसार, युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने परिस्थितियों के अनुसार कई प्रभावी सैन्य रणनीतियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने बताया कि एक महत्वपूर्ण अभियान के दौरान सैनिकों ने अपनी रेजिमेंट का युद्धघोष करते हुए आगे बढ़कर दुश्मन की चौकियों के बेहद करीब पहुंचने के बाद धार्मिक नारा भी लगाया, जिससे विरोधी पक्ष क्षणिक रूप से भ्रमित हुआ और भारतीय सैनिकों को सामरिक बढ़त मिली। इसके बाद भारतीय सेना ने आगे बढ़ते हुए खालूबार रिज पर नियंत्रण स्थापित किया और वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया। सैन्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि युद्ध में मनोवैज्ञानिक रणनीतियां कई बार निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

युद्ध से बड़ी कोई निजी जिम्मेदारी नहीं

सेवानिवृत्त नायब सूबेदार जंगशेर खान ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें मोर्चे पर जाने का आदेश मिला, उसी समय उनके परिवार में शादी का कार्यक्रम भी तय था। परिवार की ओर से लगातार उन्हें घर आने के संदेश मिल रहे थे, लेकिन उन्होंने स्पष्ट जवाब दिया कि उस समय उनके लिए सबसे बड़ा दायित्व देश की रक्षा करना था। उन्होंने अपने परिवार को संदेश भेजा कि युद्ध में सफल होकर लौटना ही उनके लिए सबसे बड़ा उत्सव होगा। उनका कहना है कि सैनिक के लिए राष्ट्र सर्वोपरि होता है और व्यक्तिगत जीवन की खुशियां भी उसी के बाद आती हैं।

परिवार तक पहुंच गई थी शहादत की अफवाह

जंगशेर खान ने याद करते हुए बताया कि युद्ध के दौरान उनके परिवार तक उनके शहीद होने की झूठी सूचना पहुंच गई थी। इससे परिवार गहरे सदमे में आ गया, जबकि वह उस समय मोर्चे पर अपने साथियों के साथ लड़ाई जारी रखे हुए थे। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद किसी सैनिक ने अपना मोर्चा नहीं छोड़ा और सभी ने मिलकर दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर किया।

जब अपने ही सैनिकों के पास कराना पड़ा तोपों से फायर

सेवानिवृत्त ऑनरेरी कैप्टन टीपू सुलतान खान ने युद्ध के सबसे चुनौतीपूर्ण क्षणों को याद करते हुए बताया कि एक समय ऐसा भी आया जब अग्रिम मोर्चे पर मौजूद सैनिकों का गोला-बारूद तेजी से कम होने लगा और दुश्मन लगातार जवाबी हमला कर रहा था। ऐसी स्थिति में सैन्य कमांडरों ने विशेष आपातकालीन तोपखाना सहायता (SOS Fire) का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य दुश्मन की प्रगति रोकना था, भले ही गोले भारतीय सैनिकों की स्थिति के बेहद निकट गिरें। उन्होंने बताया कि यह फैसला बेहद जोखिम भरा होता है, लेकिन कई बार सैनिकों की जान बचाने और दुश्मन की बढ़त रोकने के लिए आवश्यक हो जाता है।

टीपू सुलतान खान ने कहा कि उन कुछ सेकंडों में हर सैनिक अपने परिवार, बचपन और जीवन की यादों को महसूस करता है, लेकिन कर्तव्य की भावना उसे डटे रहने की शक्ति देती है। उन्होंने बताया कि इसके बाद भारतीय सैनिकों ने आमने-सामने की लड़ाई में भी साहस दिखाया और महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की।

देशभर से मिला नागरिकों का भावनात्मक समर्थन

कारगिल युद्ध के दौरान देशभर से लोगों ने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए। पूर्व सैनिकों ने बताया कि विभिन्न राज्यों से बहनों ने सैनिकों के लिए राखियां भेजीं, बच्चों ने शुभकामना पत्र लिखे और नागरिकों ने भोजन तथा अन्य आवश्यक सामग्री भेजकर अपना समर्थन जताया। उनका कहना है कि सीमाओं पर लड़ रहे सैनिकों के लिए यह भावनात्मक सहयोग किसी बड़ी ताकत से कम नहीं था। इससे उन्हें यह विश्वास मिलता था कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है।

प्रेरणा देने वाला पारिवारिक पत्र

टीपू सुलतान खान ने एक भावुक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि युद्ध पर रवाना होने से पहले उनके चाचा ने उन्हें एक पत्र लिखा था। पत्र में उन्हें साहस बनाए रखने, देश की रक्षा में कोई कमी न छोड़ने और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं भी युद्ध में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की गई थी। उन्होंने बताया कि वह पत्र आज भी उनके जीवन की सबसे प्रेरणादायक यादों में शामिल है और कठिन परिस्थितियों में उन्हें मानसिक शक्ति देता रहा।

कारगिल ने सिखाया राष्ट्रीय एकता का अर्थ

दोनों पूर्व सैनिकों ने कहा कि कारगिल युद्ध ने उन्हें यह सिखाया कि युद्धभूमि पर किसी सैनिक की पहचान उसकी जाति, भाषा या धर्म से नहीं होती। वहां केवल एक पहचान होती है—भारत का सैनिक। उन्होंने कहा कि मोर्चे पर सभी जवान एक-दूसरे के लिए परिवार की तरह होते हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य देश की रक्षा करना होता है। यही भावना कारगिल विजय की सबसे बड़ी ताकत बनी।

आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

कारगिल युद्ध की ये यादें केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी हैं। पूर्व सैनिकों का मानना है कि देश की सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक भावना से जुड़ी होती है। उन्होंने युवाओं से देशभक्ति, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता के मूल्यों को अपनाने की अपील की।

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