Lenskart पर उपभोक्ता अधिकार मामले में बड़ा फैसला, प्रचारित ऑफर पूरा न करने पर लगा जुर्माना

उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े एक मामले में ऑप्टिकल रिटेलर Lenskart पर बड़ा फैसला आया है। प्रचारित ऑफर को पूरा न करने के आरोप में कंपनी पर जुर्माना लगाया गया है।

मॉल और रिटेल स्टोर्स में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अक्सर ‘बाय वन, गेट वन फ्री’ जैसे ऑफर दिए जाते हैं। ऐसे ऑफर देखकर ग्राहक अतिरिक्त उत्साह के साथ खरीदारी करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उन्हें प्रचारित लाभ पूरी तरह मिलेगा।

Lenskart: खुदरा बाजार में आकर्षक छूट और विशेष ऑफर ग्राहकों को खरीदारी के लिए प्रेरित करते हैं। हालांकि, जब कंपनियां या स्टोर अपने प्रचारित वादों को पूरा नहीं करते, तो यह उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन का मामला बन सकता है। हाल ही में भारत में एक ऐसा ही मामला सामने आया, जिसमें एक प्रमुख आईवियर रिटेल ब्रांड को कथित रूप से प्रचारित ऑफर का लाभ ग्राहक को न देने के कारण उपभोक्ता आयोग के आदेश का सामना करना पड़ा।

यह मामला उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के महत्व को उजागर करता है और ग्राहकों को यह संदेश देता है कि यदि किसी उत्पाद या सेवा के संबंध में किए गए वादे पूरे नहीं किए जाते हैं, तो वे कानूनी सहायता लेने का अधिकार रखते हैं।

क्या था विवाद?

मामले के अनुसार, एक ग्राहक ने मार्च 2025 में एक ऑप्टिकल स्टोर से लगभग 3,000 रुपये मूल्य का उत्पाद खरीदा। उस समय स्टोर में “बाय वन, गेट वन फ्री” (एक खरीदें, एक मुफ्त पाएं) ऑफर चल रहा था। ग्राहक का दावा था कि ऑफर के तहत उसे दूसरा उत्पाद मुफ्त मिलना चाहिए था, लेकिन खरीदारी के बाद उसे केवल एक ही उत्पाद प्रदान किया गया। 

जब उसने स्टोर से इस बारे में पूछताछ की, तो कथित तौर पर इसे तकनीकी त्रुटि बताया गया और आश्वासन दिया गया कि दूसरा उत्पाद बाद में उपलब्ध करा दिया जाएगा। हालांकि, ग्राहक के अनुसार कई बार संपर्क करने के बावजूद न तो उसे वादा किया गया दूसरा उत्पाद मिला और न ही पूरी राशि वापस की गई।

आंशिक रिफंड के बाद भी विवाद जारी रहा

Lenskart पर उपभोक्ता अधिकार मामले में बड़ा फैसला, प्रचारित ऑफर पूरा न करने पर लगा जुर्माना

ग्राहक ने कई बार स्टोर से संपर्क किया और समाधान की मांग की। बाद में कंपनी की ओर से आंशिक रूप से लगभग 1,500 रुपये की राशि लौटाई गई, लेकिन ग्राहक का कहना था कि उसे ऑफर के अनुरूप पूरा लाभ नहीं मिला। ग्राहक ने यह भी आरोप लगाया कि बार-बार स्टोर के चक्कर लगाने के कारण उसका समय बर्बाद हुआ और उसे मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा। इसके बाद मामला उपभोक्ता विवाद निवारण मंच तक पहुंच गया।

मामले की सुनवाई के बाद संबंधित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने माना कि उपभोक्ता को प्रचारित ऑफर का पूरा लाभ नहीं मिला और इससे उसे असुविधा का सामना करना पड़ा। आयोग ने संबंधित कंपनी को ग्राहक की शेष राशि लौटाने, निर्धारित अवधि से ब्याज का भुगतान करने तथा मानसिक परेशानी और कानूनी खर्चों के लिए अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

उपभोक्ताओं के लिए क्या है सीख?

यह मामला केवल एक ग्राहक और एक स्टोर के बीच विवाद तक सीमित नहीं है। यह उन लाखों उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण है जो रोजाना विभिन्न ऑफर्स और डिस्काउंट योजनाओं के आधार पर खरीदारी करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्राहकों को किसी भी ऑफर का लाभ लेने से पहले उसकी शर्तों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। साथ ही खरीदारी से जुड़े सभी दस्तावेज, बिल, रसीद और प्रचार सामग्री सुरक्षित रखनी चाहिए ताकि किसी विवाद की स्थिति में उनका उपयोग किया जा सके।

दुनिया भर में उपभोक्ता संरक्षण एजेंसियां भ्रामक विज्ञापन और अधूरे वादों को गंभीरता से ले रही हैं। डिजिटल और ऑफलाइन दोनों तरह के बाजारों में कंपनियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने प्रचार अभियानों में पारदर्शिता बनाए रखें और ग्राहकों को वही लाभ दें जिसका वादा किया गया हो।

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