अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ रहा है। अमेरिकी सेना मिडिल ईस्ट में अतिरिक्त युद्धपोत, लड़ाकू विमान और सैनिक भेज रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव के बाद ईरान पर नए हमले का फैसला ले सकते हैं।
वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध एक बार फिर तेज होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी सेना मिडिल ईस्ट में अपनी ताकत बढ़ा रही है। तीन विमानवाहक पोतों की तैनाती की तैयारी है और हजारों अतिरिक्त सैनिक भी क्षेत्र की ओर भेजे जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर बड़े हमलों के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, किसी नई सैन्य कार्रवाई का अंतिम आदेश जारी होने की पुष्टि नहीं हुई है।
3 नवंबर के चुनाव के बाद हो सकता है बड़ा हमला
अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मध्यावधि चुनाव होने हैं। इन चुनावों से पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर बड़े हमले नहीं करने की बात कही है। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना दोबारा व्यापक सैन्य कार्रवाई कर सकती है। 22 अक्टूबर को ABC News ने दो इजरायली सूत्रों के हवाले से बताया कि अमेरिका और इजरायल की सेनाओं ने ईरान पर संभावित नए हमलों की योजना तैयार की है। सूत्रों के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई चुनाव के बाद होने की ज्यादा संभावना है।
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एना केली ने भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका 3 नवंबर से पहले ईरान पर नए हमले नहीं करेगा। हालांकि, चुनाव के बाद की योजना पर प्रशासन ने कोई अंतिम फैसला सार्वजनिक नहीं किया है। 23 अक्टूबर को फ्लोरिडा में एक चुनावी रैली के दौरान ट्रंप ने ईरान के खिलाफ एक और सैन्य अभियान चलाने की संभावना जताई। उन्होंने इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी।
मिडिल ईस्ट में अमेरिका ने बढ़ाई सैन्य ताकत
ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी नौसेना की गतिविधियां तेज हो गई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका क्षेत्र में तीन विमानवाहक पोतों और उनके साथ चलने वाले युद्धपोतों की मौजूदगी सुनिश्चित करने की तैयारी कर रहा है। इनमें USS Theodore Roosevelt, USS George Washington और USS George H.W. Bush शामिल हैं।
USS Theodore Roosevelt सितंबर के आखिर में सैन डिएगो से रवाना हुआ था। इसके साथ लड़ाकू विमान और मिसाइल हमलों से बचाव करने में सक्षम युद्धपोत भी तैनात किए जा रहे हैं। अमेरिका ने Makin Island Amphibious Ready Group को भी क्षेत्र की ओर भेजा है। इसमें नौसेना के जहाजों के साथ मरीन सैनिक शामिल हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई तैनाती में करीब 9,000 अतिरिक्त नौसैनिक और मरीन शामिल हो सकते हैं। क्षेत्र में पहले से लगभग 50,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद बताए गए हैं। हालांकि, इन जहाजों की तैनाती का मतलब यह नहीं है कि हमला तय हो चुका है। कुछ युद्धपोत पहले से मौजूद जहाजों की जगह भी ले सकते हैं।
तेल की कीमतों ने बढ़ाई ट्रंप की चिंता
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ईरान के खिलाफ किसी बड़े हमले का फैसला अमेरिकी चुनावों से भी जुड़ा माना जा रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। इसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी पड़ा है। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की विदेश नीति कार्यक्रम की निदेशक सुजैन मलोनी ने 20 अक्टूबर की चर्चा में बताया कि ईरान युद्ध से पेट्रोल की कीमतें बढ़ी हैं।
इसका असर आम लोगों के खर्च और अमेरिकी राजनीति पर पड़ रहा है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले सैन्य कार्रवाई बढ़ाना ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। दूसरी तरफ इजरायल ईरान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के पक्ष में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिका के साथ मिलकर नए हमले करना चाहते हैं।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर बढ़ रहा टकराव
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज भी है। यह समुद्री रास्ता फारस की खाड़ी को बाकी दुनिया से जोड़ता है और अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर रखी है। इसका मकसद ईरान के समुद्री व्यापार और तेल निर्यात पर दबाव बनाना है।
दूसरी तरफ ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। 23 अक्टूबर को रॉयटर्स ने बताया कि अक्टूबर में हॉर्मुज और आसपास के समुद्री इलाकों में जहाजों पर कम से कम 28 हमलों की पुष्टि या रिपोर्ट दर्ज हुई है। व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते हमलों से तेल की ढुलाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो रहा है।
फरवरी से जारी है अमेरिका-ईरान का संघर्ष
अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों से जुड़े देशों पर हमले किए। बीच में संघर्ष रोकने और समझौता करने की कोशिशें हुईं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका। दोनों पक्षों के बीच सीमित हमले और समुद्री तनाव जारी हैं।
अब नई सैन्य तैनाती से पूरे मिडिल ईस्ट में चिंता बढ़ गई है। ईरान भी चेतावनी दे चुका है कि दोबारा बड़े हमले हुए तो उसका जवाब पहले से ज्यादा व्यापक हो सकता है।








