मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में गोटमार मेले के दौरान पांढुर्णा और सावरगांव पक्षों के बीच जमकर पत्थरबाजी हुई। घटना में 834 लोग घायल हुए, जबकि एक व्यक्ति के पैर की हड्डी टूट गई। प्रशासन ने सुरक्षा के लिए 700 पुलिसकर्मी तैनात किए थे।
भोपाल: मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में सदियों पुरानी गोटमार मेले की परंपरा इस बार भी हिंसक पत्थरबाजी में बदल गई। जाम नदी में पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के लोगों के बीच झंडे पर कब्जे को लेकर हुए मुकाबले में 834 लोग घायल हुए। एक व्यक्ति के पैर की हड्डी टूट गई, जबकि कई लोगों को सिर में गंभीर चोटें आईं।
झंडे पर कब्जे के लिए दोनों पक्षों में पत्थरबाजी
पांढुर्णा में पोला पर्व के दूसरे दिन आयोजित होने वाला गोटमार मेला हर साल बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करता है। इस आयोजन में पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के लोग जाम नदी के बीच लगाए गए झंडे पर कब्जा करने के लिए मुकाबला करते हैं।
परंपरा के तहत दोनों पक्षों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। इस बार भी मुकाबले के दौरान पत्थरों की तेज बौछार शुरू हो गई। देखते ही देखते बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आ गए और 834 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई।
घायलों में कई लोगों के सिर पर गंभीर चोटें आईं। एक व्यक्ति के पैर की हड्डी टूट गई। घायलों को तत्काल उपचार के लिए अस्पतालों और मेला क्षेत्र में बनाए गए स्वास्थ्य शिविरों में ले जाया गया।
सात अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र और 22 एंबुलेंस तैनात
प्रशासन ने मेले के दौरान संभावित चोटों और आपात स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए सात अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाए थे। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 44 डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई गई।
इसके अलावा 22 एंबुलेंस को भी मेला क्षेत्र में तैनात किया गया था। पत्थरबाजी में घायल लोगों को उनकी स्थिति के अनुसार प्राथमिक उपचार दिया गया और जरूरत पड़ने पर अस्पताल भेजा गया।
पत्थरों की अचानक शुरू हुई बौछार के बीच कई लोगों को अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थानों की ओर भागना पड़ा। आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी और पत्थरबाजी ने सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी कर दी।
सुरक्षा के लिए 700 पुलिसकर्मी तैनात
गोटमार मेले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए 700 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। मेला क्षेत्र और उसके आसपास निगरानी के लिए 10 CCTV कैमरों और तीन ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।
प्रशासन की ओर से हर साल आयोजन के दौरान सुरक्षा बढ़ाई जाती है, क्योंकि इस परंपरा में पत्थरबाजी के कारण बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने का इतिहास रहा है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1955 से 2025 के बीच गोटमार मेले में पत्थरबाजी के दौरान 14 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा हर साल बड़ी संख्या में लोग घायल होते रहे हैं।
परंपरा को सुरक्षित बनाने की कोशिशें
गोटमार मेले की हिंसक प्रकृति को देखते हुए प्रशासन की ओर से समय-समय पर पत्थरबाजी को रोकने या इसका सुरक्षित विकल्प तलाशने की कोशिश की जाती रही है।
एक समय पत्थरों की जगह रबर बॉल से गोटमार आयोजित करने का प्रयास भी किया गया था। हालांकि, आयोजन के दौरान कुछ ही समय बाद रबर की गेंदें गायब हो गईं और लोगों ने फिर से पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।
इससे साफ हुआ कि परंपरा को बदलना प्रशासन के लिए आसान नहीं है। स्थानीय स्तर पर इस आयोजन से जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण इसे पूरी तरह रोकने की कोशिशों को भी चुनौती का सामना करना पड़ा है।
मां चंडिका के पूजन के बाद शुरू होता है आयोजन
गोटमार मेले में शामिल होने वाले लोग पहले मां चंडिका का पूजन और दर्शन करते हैं। इसके बाद जाम नदी के बीच होने वाली पारंपरिक पत्थरबाजी शुरू होती है।
इस आयोजन में पांढुर्णा और सावरगांव के हजारों लोग हिस्सा लेते हैं। दोनों पक्षों के खिलाड़ियों का लक्ष्य नदी के बीच लगाए गए झंडे पर कब्जा करना होता है।
झंडे तक पहुंचने की कोशिश के दौरान दोनों पक्ष एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। यही परंपरा आयोजन को बेहद जोखिमपूर्ण बनाती है और हर वर्ष चोटों की घटनाएं सामने आती हैं।
1955 से 2025 तक 14 लोगों की मौत
गोटमार मेले का इतिहास गंभीर हादसों से भी जुड़ा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 1955 से 2025 तक पत्थरबाजी के दौरान 14 लोगों की मौत हो चुकी है।
इसके बावजूद यह परंपरा स्थानीय स्तर पर जारी है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा इंतजाम बढ़ाए जाते हैं और लोगों को नियंत्रित करने के प्रयास किए जाते हैं, लेकिन आयोजन के दौरान पत्थरबाजी को पूरी तरह रोक पाना अब तक मुश्किल रहा है।
इस बार 834 लोगों के घायल होने की घटना ने एक बार फिर इस परंपरा की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गोटमार की शुरुआत को लेकर अलग-अलग मान्यताएं
गोटमार मेले की शुरुआत को लेकर स्थानीय स्तर पर कई किवदंतियां प्रचलित हैं। इनमें से एक मान्यता इसे भोसला राजाओं के सैनिकों के युद्धाभ्यास से जोड़ती है।
दूसरी लोकप्रिय कहानी पांढुर्णा के एक युवक और सावरगांव की युवती की प्रेम कहानी से जुड़ी है। इस मान्यता के अनुसार, दोनों के प्रेम संबंध का विरोध करने के दौरान दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाजी हुई थी। बाद में इसी घटना को गोटमार की परंपरा की शुरुआत से जोड़ा गया।
हालांकि, इन कहानियों की ऐतिहासिक पुष्टि का उल्लेख उपलब्ध जानकारी में नहीं है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, समय के साथ इस आयोजन का स्वरूप बदलता गया है।
बढ़ती आक्रामकता ने बढ़ाई चिंता
स्थानीय लोगों के मुताबिक, समय के साथ गोटमार मेले में आक्रामकता बढ़ी है। गोफन के इस्तेमाल, अवैध शराब और अन्य कारणों ने आयोजन को पहले की तुलना में अधिक जोखिमपूर्ण बना दिया है।
परंपरा और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है। एक ओर स्थानीय लोग इसे पुरानी परंपरा के रूप में देखते हैं, वहीं दूसरी ओर पत्थरबाजी से होने वाली चोटों और मौतों के आंकड़े इसकी गंभीरता को सामने रखते हैं।
परंपरा, आस्था और सुरक्षा के बीच चुनौती
गोटमार मेला मध्य प्रदेश के पांढुर्णा क्षेत्र की एक विशिष्ट स्थानीय परंपरा है, लेकिन इसके दौरान होने वाली हिंसक पत्थरबाजी लंबे समय से विवाद का विषय रही है।
इस बार 834 लोगों के घायल होने और एक व्यक्ति की पैर की हड्डी टूटने की घटना ने फिर यह सवाल सामने रखा है कि पारंपरिक आयोजन को किस तरह सुरक्षित बनाया जा सकता है। प्रशासन ने पुलिस, स्वास्थ्यकर्मियों, एंबुलेंस, CCTV और ड्रोन की व्यवस्था की, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों का घायल होना चुनौती को स्पष्ट करता है।
आने वाले समय में प्रशासन और स्थानीय समुदाय के सामने परंपरा को बनाए रखते हुए आयोजन में चोट और जान के जोखिम को कम करने का रास्ता तलाशना अहम होगा।












