मध्य प्रदेश विधानसभा ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को मंजूरी दे दी है। यह विधेयक सोमवार को मानसून सत्र के दौरान सदन में पेश किया गया था, जिसे मंगलवार को चर्चा के बाद पारित कर दिया गया।
Madhya Pradesh UCC Bill 2026: मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) को लेकर सरकार की पहल ने एक बार फिर देश में इस मुद्दे पर चर्चा तेज कर दी है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य शादी, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। सरकार का तर्क है कि इससे अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों से पैदा होने वाली कानूनी जटिलताओं को कम किया जा सकेगा और नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे।
मध्य प्रदेश सरकार की इस पहल को देश में UCC को लेकर चल रही व्यापक बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, किसी भी नए कानून के वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए उसके अंतिम प्रावधान, अधिसूचना और लागू होने की तारीख महत्वपूर्ण होगी।
क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता का मतलब ऐसी कानूनी व्यवस्था से है, जिसमें धर्म या समुदाय के आधार पर व्यक्तिगत मामलों के लिए अलग-अलग कानूनों के बजाय समान नागरिक नियम लागू हों। इसके दायरे में आम तौर पर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार, दत्तक ग्रहण और पारिवारिक मामलों को शामिल किया जाता है।
भारत में अभी व्यक्तिगत कानूनों का एक बहुस्तरीय ढांचा है। अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषयों पर अलग कानून लागू होते हैं। UCC के समर्थकों का मानना है कि समान कानून से लैंगिक समानता और कानूनी स्पष्टता बढ़ सकती है, जबकि इसके आलोचक धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
संविधान में UCC का क्या प्रावधान है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। यह प्रावधान संविधान के राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है। हालांकि, नीति-निर्देशक तत्व मौलिक अधिकारों की तरह सीधे अदालत में लागू कराने योग्य नहीं हैं। इसी वजह से UCC को लेकर संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार और समानता के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है।
संविधान निर्माण के दौरान भी समान नागरिक संहिता पर चर्चा हुई थी। इसके समर्थकों का तर्क था कि समान नागरिक कानून राष्ट्रीय एकता और लैंगिक समानता को मजबूत कर सकता है, जबकि तत्कालीन बहस में यह भी माना गया कि ऐसे सुधारों के लिए व्यापक सामाजिक सहमति जरूरी होगी।
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मध्य प्रदेश में UCC की तैयारी कैसे हुई?
राज्य सरकार के अनुसार, मध्य प्रदेश में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन संबंधों से जुड़े मामलों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। सरकार ने इन व्यवस्थाओं का अध्ययन कर एक समान और व्यावहारिक कानूनी ढांचा तैयार करने की दिशा में काम किया है। बताया गया है कि 27 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति गठित की गई।
समिति में कानून, शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र और प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों को शामिल किया गया। समिति ने विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के साथ-साथ अन्य राज्यों में अपनाए गए UCC मॉडल का अध्ययन किया। समिति ने महिलाओं और बच्चों के अधिकारों, लैंगिक समानता और सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुझाव तैयार करने पर जोर दिया। लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण और उससे जुड़े अधिकारों एवं जिम्मेदारियों पर भी विचार किया गया।
जनता से मांगे गए सुझाव
सरकार ने UCC की प्रक्रिया में जनभागीदारी का दावा करते हुए ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से लोगों की राय लेने की बात कही है। इसके लिए 22 मई 2026 को एक वेब पोर्टल शुरू किए जाने की जानकारी दी गई। सरकार के अनुसार, इस प्रक्रिया के दौरान लाखों सुझाव ऑनलाइन प्राप्त हुए और जिला एवं राज्य स्तर पर कई जनपरामर्श बैठकें आयोजित की गईं। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों में बड़ी संख्या में लोगों के UCC के समर्थन का दावा किया गया है।
इन आंकड़ों के मुताबिक, 93 फीसदी से अधिक प्रतिभागियों ने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने का समर्थन किया। वहीं, 92 फीसदी से अधिक लोगों ने सभी समुदायों में महिला और पुरुषों के लिए समान कानून की जरूरत बताई। हालांकि, इन आंकड़ों और परामर्श प्रक्रिया की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
शादी, तलाक और संपत्ति पर क्या असर हो सकता है?
यदि प्रस्तावित UCC व्यवस्था लागू होती है, तो विवाह और तलाक से जुड़े नियमों में समानता लाने की कोशिश की जा सकती है। इसी तरह उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने की दिशा में प्रावधान हो सकते हैं। लिव-इन रिलेशनशिप भी इस प्रस्तावित व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इसके तहत ऐसे संबंधों के पंजीकरण, संबंधित पक्षों के अधिकार और बच्चों की सुरक्षा जैसे मुद्दों को कानूनी ढांचे में शामिल किए जाने की संभावना है।
हालांकि, इन सभी विषयों पर वास्तविक नियम तभी स्पष्ट होंगे, जब अंतिम कानून का पूरा पाठ सार्वजनिक होगा और उसे लागू करने की आधिकारिक प्रक्रिया पूरी होगी।







