Mining and Minerals Bill 2026: खनन कानून पास होते ही झारखंड और केरल ने जताया विरोध, राज्यों के अधिकार पर छिड़ी बहस

Mining and Minerals Bill 2026: संसद से खनन कानून पास होते ही झारखंड और केरल ने विरोध जताया है। राज्यों के अधिकार, खनिज संसाधनों पर नियंत्रण और केंद्र-राज्य

संसद ने गुरुवार को माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को मंजूरी दे दी। इस बिल का उद्देश्य खनिज अधिकारों और खनिज संपन्न जमीनों पर कर लगाने से जुड़े राज्यों के अधिकारों को सीमित करते हुए खनिज कर व्यवस्था में एकरूपता लाना है।

नई दिल्ली: संसद ने माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को मंजूरी दे दी है। खनन और खनिज क्षेत्र से जुड़े इस कानून को लेकर केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच राज्यों के अधिकार, खनिजों पर नियंत्रण और राजस्व हिस्सेदारी को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। बिल के पारित होने के बाद झारखंड और केरल की ओर से इसके खिलाफ विरोध और आंदोलन की चेतावनी दी गई है।

सरकार का कहना है कि संशोधित कानून का उद्देश्य राज्यों की स्वायत्तता कम करना नहीं, बल्कि खनिजों से जुड़े अधिकारों और कर व्यवस्था में अधिक स्पष्टता तथा एकरूपता लाना है। दूसरी ओर, कई विपक्षी दलों और कुछ राज्य सरकारों ने आशंका जताई है कि नए प्रावधानों से खनिज संपन्न राज्यों के राजस्व और भूमि पर उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

लोकसभा और राज्यसभा से मिला बिल को समर्थन

माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को लोकसभा ने बुधवार को मंजूरी दी, जबकि गुरुवार को राज्यसभा से भी इसे पारित कर दिया गया। इसके साथ ही खनन क्षेत्र में राज्यों और केंद्र की शक्तियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई। संसद में बिल पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने कई सवाल उठाए। DMK, BJD, RJD और वामपंथी दलों के सदस्यों ने पूछा कि क्या प्रस्तावित बदलावों का असर खनिज संसाधनों से मिलने वाले राज्यों के राजस्व पर पड़ेगा।

रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस का कोई सांसद इस विधेयक पर हुई चर्चा में शामिल नहीं हुआ। इसके बावजूद अन्य विपक्षी दलों ने बिल के कई प्रावधानों पर अपनी चिंताएं दर्ज कराईं और सरकार से स्पष्ट जवाब की मांग की।

राज्यों के राजस्व पर क्या पड़ेगा असर?

बिल को लेकर सबसे बड़ी चिंता खनिज संपन्न राज्यों की आय से जुड़ी है। खनन गतिविधियों से मिलने वाला राजस्व झारखंड, ओडिशा और अन्य खनिज संसाधन वाले राज्यों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विपक्षी दलों का सवाल है कि यदि खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर कराधान से संबंधित राज्यों की शक्तियों में बदलाव होता है, तो क्या इससे उनके राजस्व पर असर पड़ेगा। 

आलोचकों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों में राज्यों की भूमिका और वित्तीय अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा जरूरी है। केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी राज्य को राजस्व का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।

कोयला, लौह अयस्क और अन्य प्रमुख खनिजों पर केंद्र का फोकस

संसद में बहस का जवाब देते हुए केंद्रीय खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि केंद्र सरकार का उद्देश्य कोयला, चूना पत्थर, लौह अयस्क, तांबा और मैंगनीज जैसे प्रमुख खनिजों के नियमन में एकरूपता लाना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 49 गौण खनिजों यानी माइनर मिनरल्स पर राज्यों के अधिकार पहले की तरह बने रहेंगे। 

सरकार का तर्क है कि रणनीतिक और प्रमुख खनिजों के प्रभावी नियमन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित व्यवस्था आवश्यक है, जबकि स्थानीय और गौण खनिजों के मामलों में राज्यों की भूमिका कायम रहेगी। सरकार के इस आश्वासन के बावजूद विपक्षी दलों का कहना है कि कानून के वास्तविक प्रभाव को उसके लागू होने के बाद ही स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा।

'राज्यों को होगा ज्यादा राजस्व', सरकार का दावा

केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने संसद में कहा कि खनिज राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी पिछले वर्षों में बढ़ी है। उनके अनुसार, 2014-15 में राज्यों को खनिज राजस्व का करीब 65% हिस्सा मिलता था, जो अब बढ़कर लगभग 85% हो गया है। उन्होंने कोयला राजस्व का भी उल्लेख करते हुए दावा किया कि राज्यों की हिस्सेदारी 51% से बढ़कर करीब 96% तक पहुंच गई है। मंत्री ने कहा कि केंद्र को खनिज राजस्व का लगभग 11% मिलता है, जबकि करीब 88% हिस्सा राज्यों के पास जाता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि संशोधित कानून के कारण किसी भी राज्य को वित्तीय नुकसान नहीं होगा। सरकार के अनुसार, विधेयक का मकसद राज्यों की आय घटाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और संतुलित बनाना है।

UPA के कोयला आवंटन पर भी उठाया मुद्दा

बहस के दौरान जी. किशन रेड्डी ने पूर्व UPA सरकार के कार्यकाल में कोयला ब्लॉक आवंटन का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय कोयला ब्लॉकों के आवंटन को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे थे। मंत्री ने दावा किया कि पिछले 12 वर्षों के दौरान खनिज संसाधनों के आवंटन में अधिक पारदर्शी व्यवस्था अपनाई गई है। विपक्ष ने सरकार के इन राजनीतिक आरोपों पर अपनी अलग राय रखी और मौजूदा कानून के संभावित प्रभाव पर सवाल उठाना जारी रखा।

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